बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 318, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें३१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
(शरीर) ही इसका कर्म है, क्योंकि आत्मासे ही यह कर्म करता है। वह यह यज्ञ पाङ्क्त है, पशु पाङ्क्त है, पुरुष पाङ्क्त है तथा यह जो कुछ है, सब पाङ्क्त है। जो ऐसा जानता है, वह इस सभीको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥
| आत्मैवेदमग्र आसीत् । आत्मैव स्वाभाविकोऽविद्वान्कार्यकरणसङ्घातलक्षणो वर्णी, अग्रे प्राग्दारसम्बन्धात्, आत्मेत्यभिधीयते; तस्मादात्मनः पृथग्भूतं काम्यमानं जायादिभेदरूपं नासीत्; स एवैक आसीत्—जायाद्येषणाबीजभूताविद्यावानेक एवासीत् । | आत्मैवेदमग्र आसीत् । आत्मा ही अर्थात् स्वाभाविक अविद्वान् देह और इन्द्रियका संघातस्वरूप वर्णी (ब्रह्मचारी) ही अग्रे—स्त्री-सम्बन्ध होनेसे पूर्व था। इस प्रकार यहाँ [देहेन्द्रियसंघात ही] आत्मा कहा गया है। उस आत्मासे पृथग्भूत उसकी कामनाका विषय स्त्री आदि भेदरूप नहीं था। वही एक था—स्त्री आदि एषणाकी बीजभूता अविद्यासे युक्त वह अकेला ही था। | | स्वाभाविक्या स्वात्मनि कर्त्रादिकारकक्रियाफलात्मकताध्यारोपलक्षणया अविद्यावासनया वासितः सोऽकामयत कामितवान् । कथम् ? जाया कर्माधिकारहेतुभूता मे मम कर्तुः स्यात् ; तया विनाहमनधिकृत एव कर्मणि; अतः कर्माधिकारसम्पत्तये भवेज्जाया; अथाहं प्रजायेय प्रजारूपेणाहमेवोत्पद्येय । | उसने अपनेमें कर्त्रादि-कारक, क्रिया एवं कर्मात्मकताकी अध्यारोपरूपा स्वाभाविकी अविद्याजनित वासनासे युक्त होकर कामना की। किस प्रकार कामना की ? मेरे अर्थात् मुझ कर्ताके कर्माधिकारकी हेतुभूता स्त्री हो, क्योंकि उसके बिना तो मैं कर्मका अनधिकारी ही हूँ; अतः कर्माधिकारकी प्राप्तिके लिये मुझे स्त्री प्राप्त हो; फिर मैं प्रजात होऊँ अर्थात् प्रजारूपसे मैं स्वयं ही उत्पन्न होऊँ। | | अथ वित्तं मे स्यात्कर्मसाधनं गवादिलक्षणम् अथाहमभ्युदयनिः- | तथा मेरे कर्मका साधनभूत गौ आदिरूप धन हो, फिर मैं अभ्युदय |