भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 319
ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्यार्थ३१३
संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्)हिन्दी (भाष्यार्थ)
श्रेयस्साधनं कर्म कुर्वीय; येनाहमन्नृणी भूत्वा देवादीनां लोकान् प्राप्नुयाम्, तत्कर्म कुर्वीय; काम्यानि च पुत्रवित्तस्वर्गादिसाधनानि। एतावान्वै काम एतावद्विषयपरिच्छिन्न इत्यर्थः।और निःश्रेयसका साधनरूप कर्म करूँ; अर्थात् वह कर्म करूँ, जिससे मैं अनृण होकर देवादिके लोकोंको प्राप्त कर सकूँ तथा पुत्र, धन और स्वर्गादिके साधन काम्य कर्म भी करूँ। इतना ही अर्थात् इतने विषयसे परिच्छिन्न ही काम है।
एतावानेव हि कामयितव्यो विषयो यदुत जायापुत्रवित्तकर्माणि साधनलक्षणाैषणा; लोकाश्च त्रयो मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति फलभूताः साधनैषणायाश्चास्याः। तदर्था हि जायापुत्रवित्तकर्मलक्षणा साधनैषणा, तस्मात्सा एकैवैषणा या लोकैषणा। सैकैव सत्येषणा साधनापेक्षेति द्विधा; अतोऽवधारयिष्यति "उभे ह्येते एषणे एव" (३।५।१) इति।ये जो स्त्री, पुत्र, वित्त और कर्म हैं—बस, इतना ही कामना करनेयोग्य विषय है, यह साधनरूपा एषणा है; मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक-ये तीनों लोक इस साधनैषणाके फलस्वरूप हैं। इन्हीं तीनों लोकोंके लिये जाया, पुत्र, वित्त एवं कर्मरूपा साधन-एषणा होती है; अतः यह एक ही एषणा है, जो लोकैषणा कहलाती है। वह एषणा एक होनेपर भी साधनकी अपेक्षावाली है, इसलिये दो प्रकारकी है। इसीसे श्रुति यह निश्चय करेगी कि "ये दोनों एषणाएँ ही हैं।"
फलार्थत्वात्सर्व्वारम्भस्य लोकैषणार्थप्राप्ता उक्तैवेति। एतावान्वा एतावानेव काम इत्यवध्रियते।सारे आरम्भ फलके ही लिये होते हैं, अतः अर्थतः प्राप्त लोकैषणाका वर्णन कर ही दिया गया। एतावान् वै—इतना ही काम है, इस प्रकार उसीका निश्चय किया जाता है।
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