भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 320
३१४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृतहिन्दी
भोजनेऽभिहिते तृप्तिर्न हि पृथग्विधेया, तदर्थत्वाद्भोजनस्य। ते एते एषणे साध्यसाधनलक्षणे कामः, येन प्रयुक्तोऽविद्वान्वश एव कोशकारवदात्मानं वेष्टयति—कर्ममार्ग एवात्मानं प्रणिदधद्बहिर्मुखीभूतो न स्वं लोकं प्रतिजानाति। तथा च तैत्तिरीयके—भोजनका वर्णन कर दिये जानेपर तज्जनित तृप्तिका अलग वर्णन करनेकी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि भोजन तो उसीके लिये होता है। वे ये साध्य-साधनरूपा एषणाएँ काम हैं, जिस (काम) से प्रेरित हुआ अज्ञानी पुरुष रेशमके कीड़ेके समान अपनेको विवश होकर लपेट लेता है तथा अपनेको कर्ममार्गमें ही अटकाये रखकर बहिर्मुख हो आत्मलोकको नहीं जान पाता। ऐसा ही तैत्तिरीयकमें भी कहा है—
“अग्निमुग्धो हैव धूमतान्तः स्वं लोकं न प्रतिजानाति” इति।“जो पुरुष अग्निसम्बन्धी कर्मोंमें मुग्ध है, उसकी चरमगति धूममार्ग ही है, वह आत्मलोकको नहीं जान पाता” इत्यादि।
कथं पुनरेतावत्त्वमवधार्यते कामानाम्? अनन्तत्वात्। अनन्ता हि कामाः, इत्येतदाशङ्क्य हेतुमाह—यस्माद् न इच्छन् च न—इच्छन्नपि, अतोऽस्मात्फलसाधनलक्षणाद् भूयोऽधिकतरं न विन्देन्न लभेत। न हि लोके फलसाधनव्यतिरिक्तं दृष्टमदृष्टं वा लब्धव्यमस्ति। लब्धव्य-किंतु कामनाओंकी एतावत्ता (इतनापन) कैसे निश्चय की जाती है, क्योंकि वे तो अनन्त हैं। कामनाओंका तो कोई अन्त नहीं है—ऐसी आशङ्का करके श्रुति उसका कारण बतलाती है; क्योंकि इच्छा करनेपर भी पुरुष इस फल और साधनभूत कामनासे अधिक कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता। लोकमें फल और साधनसे व्यतिरिक्त कोई भी दृष्ट या अदृष्ट प्राप्तव्य पदार्थ नहीं है। कामना तो किसी प्राप्तव्य विषयके लिये ही