भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 321

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३१५

विषयो हि कामः, तस्य चैतद्व्यतिरेकेणाभावात् युक्तं वक्तुम् 'एतावान्वै कामः' इति ।होती है और वह इसके सिवा है नहीं; इसलिये यह कहना उचित ही है कि 'बस इतना ही काम है।'
एतदुक्तं भवति—दृष्टार्थमदृष्टार्थं वा साध्यसाधनलक्षणम् अविद्यावत्पुरुषाधिकारविषयमेषणाद्वयं कामः, अतोऽस्माद्विदुषा व्युत्थातव्यमिति ।यहाँ कहना यह है कि दृष्ट अथवा अदृष्ट फलवाला साध्य-साधनरूप तथा अज्ञानी पुरुषके अधिकारका विषयभूत जो एषणाद्वय है, वही काम है, अतः विद्वान्‌को इससे ऊपर उठना चाहिये।
यस्मादेवमविद्वानात्मा कामी पूर्वं कामयामास, तथा पूर्वतरोऽपि, एषा लोकस्थितिः प्रजापतेश्चैवमेष सर्ग आसीत् । सोऽबिभेदविद्यया, ततः कामप्रयुक्त एकाक्यरमणोऽरत्युपघाताय स्त्रियमैच्छत्, तां समभवत्, ततः सर्गोऽयमासीदिति ह्युक्तम् । तस्मात्तत्सृष्टौ एतर्ह्येतस्मिन्नपि काले एकाकी सन्प्राग्दारक्रियातः कामयते—जाया मे स्यात्, अथ प्रजायेय अथ वित्तं मे स्यात्, अथ कर्म कुर्वीय—इत्युक्तार्थं वाक्यम्।क्योंकि वह अविद्वान् कामी आत्मा पहले इसी प्रकार कामना करता था, अतः उससे पूर्वंतरने भी ऐसे ही कामना की होगी, क्योंकि यह लोकस्थिति है; और प्रजापतिका यह सर्ग भी इसी प्रकार हुआ है। पहले अज्ञानवश उसे भय हुआ, फिर कामसे प्रेरित होकर अकेले रति न करनेके कारण उस अरतिकी निवृत्तिके लिये उसने स्त्रीकी इच्छा की, उससे वह संयुक्त हुआ और फिर यह सृष्टि हुई-इस प्रकार पहले कहा जा चुका है। इसलिये इस समय भी उसकी सृष्टिमें स्त्रीपरिग्रहसे पूर्व एकाकी पुरुष यह कामना करता है कि मेरे स्त्री हो, फिर मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ तथा मेरे धन हो और फिर मैं कर्म करूँ-इस प्रकार यह पूर्वोक्त अर्थवाला वाक्य है।