भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 322
३१६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| स एवं कामयमानः सम्पादयंश्च जायादीन्यावत्स एतेषां यथोक्तानां जायादीनामेकैकमपि न प्राप्नोति, अकृत्स्नोऽसम्पूर्णोऽहमित्येवं तावदात्मानं मन्यते । पारिशेष्यात्समस्तानेवैतान्सम्पादयति यदा, तदा तस्य कृत्स्नता । | इस प्रकार कामना करके स्त्री आदिका सम्पादन करनेवाला यह पुरुष जबतक इन पूर्वोक्त स्त्री आदिमेंसे एकको भी प्राप्त नहीं कर लेता तबतक यह अपनेको 'मैं असम्पूर्ण हूँ' ऐसा मानता है । फलतः जब यह इन सभीका सम्पादन कर लेता है, तभी उसकी पूर्णता होती है । | | यदा तु न शक्नोति कृत्स्नतां सम्पादयितुं तदा अस्य कृत्स्नत्वसम्पादनायाह—तस्यो तस्याकृत्स्नत्वाभिमानिनः कृत्स्नता इयम् एवं भवति कथम् ? अयं कार्यकरणसङ्घातः प्रविभज्यते; तत्र मनोऽनुवृत्ति हि इतरत्सर्वं कार्यकरणजातमिति मनः प्रधानत्वादात्मैवात्मा। यथा जायादीनां कुटुम्बपतिरात्मैव तदनुकारित्वाज्जायादिचतुष्टयस्य; एवमिहापि मन आत्मा परिकल्पते कृत्स्नतायै। | किंतु जब यह उस पूर्णताका सम्पादन करनेमें समर्थ नहीं होता, उस समय उसके पूर्णत्वके सम्पादनके लिये श्रुति इस प्रकार कहती है—उस अपूर्णताके अभिमानीकी यह पूर्णता इस प्रकार होती है । किस प्रकार ?—[उसके] इस देहेन्द्रियसंधातका विभाग किया जाता है, उसमें अन्य सारा कार्यकारणसमुदाय मनका अनुसरण करनेवाला है, इसलिये प्रधान होनेके कारण उसमें मन ही आत्माके समान आत्मा है । जिस प्रकार परिवारका स्वामी स्त्री आदिका आत्मा होता है, क्योंकि [स्त्री, पुत्र, धन और कर्म—ये] चारों उसका अनुसरण करनेवाले होते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी पूर्णताके लिये मन आत्मा है—ऐसी कल्पना की गयी है । |