भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 323

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३१७


संस्कृतहिन्दी
तथा वाग्जाया, मनोऽनुवृत्तित्वसामान्याद्वाचः । वागिति शब्दश्चोदनादिलक्षणः, मनसा श्रोत्रद्वारेण गृह्यतेऽवधार्यते प्रयुज्यते च, इति मनसो जायेव वाक् । ताभ्यां च वाङ्मनसाभ्यां जायापतिस्थानीयाभ्यां प्रसूयते प्राणः कर्मार्थम्, इति प्राणः प्रजेव । तत्र प्राणचेष्टादिलक्षणं कर्म चक्षुर्दृष्टवित्तसाध्यं भवतीति चक्षुर्मानुषं वित्तम् । तद् द्विविधं वित्तं मानुषमितरच्च; अतो विशिनष्टीतरवित्तनिवृत्त्यर्थं मानुषमिति । गवादि हि मनुष्यसम्बन्धि वित्तं चक्षुर्ग्राह्यं कर्मसाधनम्; तस्मात्तत्स्थानीयम्, तेन सम्बन्धाच्चक्षुर्मानुषं वित्तम्; चक्षुषा हि यस्मात्तन्मानुषं वित्तं विन्दते गवाद्युपलभत इत्यर्थः ।तथा वाणी स्त्री है; क्योंकि मनका अनुवर्तन करना यह स्त्रीके साथ वाणीकी समानता है । 'वाक्' यह विधि-निषेधरूप शब्द है, यह श्रोत्रेन्द्रियद्वारा मनसे गृहीत, निश्चित और प्रयुक्त होता है, इसलिये वाक् मनकी स्त्रीके समान है । उन पति-पत्नीस्थानीय मन और वाणीसे कर्मसम्पादनके लिये प्राणका जन्म होता है, इसलिये प्राण उनकी संतानके समान है । वहाँ प्राणचेष्टादिरूप कर्म नेत्रसे दिखायी देनेवाले धनसे साध्य है, इसलिये नेत्र मानुष वित्त है । वित्त दो प्रकारका होता है—मानुष और अमानुष; अतः अमानुष वित्तकी निवृत्तिके लिये 'मानुषम्' यह विशेषण दिया गया है । गौ आदि मनुष्यसम्बन्धी वित्त नेत्रग्राह्य और कर्मका साधन है, इसलिये वह मानुष वित्तस्थानीय है । उससे सम्बन्ध रखनेके कारण नेत्र मानुष वित्त है, क्योंकि नेत्रसे ही पुरुष मानुष वित्तको यानी गौ आदिको देखता है ।
किं पुनरितरद्वित्तम् ? श्रोत्रं दैवंतो फिर दूसरा (अमानुष) वित्त क्या है ? 'श्रोत्र' यह दैव वित्त है,
देवविषयत्वाद्धिज्ञानस्य । विज्ञानं दैवं वित्तम्; तदिह श्रोत्रमेवक्योंकि विज्ञान देवविषयक होता है । विज्ञान दैव वित्त है, यहाँ उस (विज्ञान) की सम्पत्तिका विषय श्रोत्र ही वह