भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 324

३१८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
सम्पत्तिविषयम् । कस्मात् ? श्रोत्रेण हि यस्मात्तद्दैवं वित्तं विज्ञानं शृणोति; अतः श्रोत्राधीनत्वाद्विज्ञानस्य श्रोत्रमेव तदिति ।(दैव वित्त) है। क्यों? क्योंकि पुरुष श्रोत्रसे ही उस दैव वित्त विज्ञानको सुनता है; अतः विज्ञान श्रोत्रके अधीन होनेके कारण श्रोत्र ही वह (दैव वित्त) है।
किं पुनरेतैरात्मादिवित्तान्तैरिह निर्वर्त्यं कर्म ? इत्युच्यते—किंतु इन आत्मासे लेकर वित्तपर्यन्त पदार्थोंसे निष्पन्न होनेवाला यहाँ कौन-सा कर्म है? सो बतलाया जाता है—
आत्मैव—आत्मेति शरीरमुच्यते ।आत्मा ही [इसका कर्म है]। 'आत्मा' शब्दसे यहाँ शरीरका कथन होता है।
कथं पुनरात्मा कर्मस्थानीयः? अस्य कर्महेतुत्वात् । कथं कर्महेतुत्वम् ? आत्मना हि शरीरेण यतः कर्म करोति। तस्याकृत्स्नत्वाभिमानिन एवं कृत्स्नता सम्पन्ना—यथा बाह्या जायादिलक्षणा एवम् ।किंतु यह आत्मा कर्मस्थानीय कैसे है? क्योंकि यह कर्मका हेतु है। यह कर्मका हेतु किस प्रकार है? क्योंकि इस आत्मा यानी शरीरसे ही जीव कर्म करता है। किस प्रकार जायादिरूपा बाह्य अपूर्णता है, उसी प्रकार उस शरीरकी अपूर्णताका अभिमान करनेवालेकी इस प्रकार (यानी ऐसा जाननेसे) पूर्णता निष्पन्न हो जाती है।
तस्मात्स एष पाङ्क्तः पञ्चभिर्निर्वृत्तः पाङ्क्तो यज्ञो दर्शनमात्रनिर्वृत्तोऽकर्मिणोऽपि ।इसलिये वह यह (आत्म-दर्शन) पाङ्क्त है; पाङ्क्त यानी पाँचके द्वारा निष्पन्न हुआ यज्ञ है। अर्थात् कर्म न करनेवालेके द्वारा भी यह केवल दृष्टिमात्रसे निष्पन्न होता है।
कथं पुनरस्य पञ्चत्वसम्पत्तिमात्रेण यज्ञत्वम्? उच्यते—यस्मा-किंतु पञ्चत्वके सम्पादनमात्रसे इसका यज्ञत्व कैसे सिद्ध होता है? सो बतलाया जाता है; क्योंकि बाह्ययज्ञ
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