भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 325

ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१९


| द्वाह्योऽपि यज्ञः पशुपुरुषसाध्यः, स च पशुः पुरुषश्च पाङ्क्त एव यथोक्तमनआदिपञ्चत्वयोगात् । तदाह—पाङ्क्तः पशुर्गवादिः, पाङ्क्तः पुरुषः—पशुत्वेऽप्यधिकृतत्वेनास्य विशेषः पुरुषस्येति पृथक्पुरुषग्रहणम् । किं बहुना ? पाङ्क्तमिदं सर्वं कर्मसाधनं फलं च, यदिदं किञ्च यत्किञ्चिदिदं सर्वम् । एवं पाङ्क्तं यज्ञमात्मानं यः सम्पादयति स तदिदं सर्वं जगदात्मत्वेनाप्नोति य एवं वेद ॥ १७ ॥ | भी पुरुष और पशुसे साध्य है और वह पुरुष एवं पशु भी उपर्युक्त मन आदि पञ्चत्वके सम्बन्धसे पाङ्क्त ही हैं। यही बात श्रुति कहती है—पशु यानी गौ आदि पाङ्क्त हैं, पुरुष पाङ्क्त है। पुरुष भी यद्यपि पशु ही है, तथापि अधिकारी होनेसे इसकी विशेषता है; इसलिये इसे अलग ग्रहण किया है। अधिक क्या ? यह कर्मका साधन और फल सभी पाङ्क्त है। तथा यह जो कुछ भी है सभी पाङ्क्त है। इस प्रकार जो अपनेको पाङ्क्तयज्ञरूपसे भावना करता है, अथवा जो इस प्रकार जानता¹ है, वह इस सम्पूर्ण जगत्को आत्मस्वरूपसे प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये चतुर्थ-
सृष्ट्यादिसर्वात्मताब्राह्मणम् ॥ ४ ॥


पञ्चम ब्राह्मण

सप्तान्नसृष्टि, उसका विभाग और व्याख्या

| उपक्रमः<br>यत्सप्तान्नानि मेधया । अविद्या प्रस्तुता, तत्राविद्वानन्यां देवतामुपास्ते ‘अन्यो- | ‘यत्सप्तान्नानि मेधया’ इत्यादि मन्त्रसे पञ्चम ब्राह्मणका आरम्भ होता है। यहाँ अविद्याका प्रकरण है। तहाँ अविद्वान् ‘यह ( देवता ) अन्य |


१. यानी साध्य और साधनरूप पाङ्क्तको जानकर उसे आत्मस्वरूपसे अनुसंधान करता है।