भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 326

३२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १


| ऽसावन्योऽहमस्मि' इति। स वर्णाश्रमाभिमानः कर्मकर्तव्यतया नियतो जुहोत्यादिकर्मभिः कामप्रयुक्तो देवादीनामुपकुर्वन्सर्वेषां भूतानां लोक इत्युक्तम्। यथा च स्वकर्मभिरेकैकैन सर्वैर्भूतैरसौ लोको भोज्यत्वेन सृष्टः, एवमसावपि जुहोत्यादिपाङ्क्तकर्मभिः सर्वाणि भूतानि सर्वं च जगदात्मभोज्यत्वेनासृजत्। | है और मैं अन्य हूँ' इस भावनासे अन्य देवताकी उपासना करता है। वह वर्णाश्रमका अभिमान रखनेवाला पुरुष कर्मकी कर्तव्यतासे नियन्त्रित होकर कामनासे प्रेरित हो होम-यागादि कर्मोंद्वारा देवता आदिका उपकार करनेके कारण समस्त भूतोंका लोक (भोग्य) है— ऐसा पहले कहा गया। जिस प्रकार एक-एक करके सभी प्राणियोंने अपने कर्मोंद्वारा उस लोकको भोज्यरूपसे उत्पन्न किया है, उसी प्रकार उस (कर्माधिकारी) ने भी याग-होमादि पाङ्क्तकर्मोंद्वारा सम्पूर्ण भूतोंको तथा सारे संसारको अपने भोग्यरूपसे रचा। | | एवमेकैकः स्वकर्मविद्यानुरूप्येण सर्वस्य जगतो भोक्ता भोज्यं च, सर्वस्य सर्वः कर्ता कार्यं चेत्यर्थः। | इस प्रकार प्रत्येक जीव अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार सारे जगत्‌का भोक्ता और भोग्य है, तात्पर्य यह है कि सभी सबके कर्ता और कार्य हैं। | | एतदेव च विद्याप्रकरणे मधुविद्यायां वक्ष्यामः—'सर्वं सर्वस्य कार्यं मधु' इत्यात्मैकत्वविज्ञाना-र्थम्। | ज्ञानके प्रकरणमें आत्मैकत्वके ज्ञानके लिये यही बात हम मधुविद्याके प्रसंगमें कहेंगे कि 'सभी सबके कार्य यानी मधु हैं।' | | यदसौ जुहोतीत्यादिना पाङ्क्तेन काम्येन कर्मणा आत्मभोज्यत्वेन जगदसृजत विज्ञानेन च, तज्जग- | उस कर्ताने जो होम-यागादि पाङ्क्त और काम्यकर्मसे तथा अपने विज्ञानके द्वारा अपने भोज्यरूपसे इस जगत्‌की रचना की, वह सारा जगत् कार्य- |