बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 327, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ [३२१
| त्सर्वं सप्तधा प्रविभज्यमानं कार्य-कारणत्वेन सप्तान्नान्युच्यन्ते, भोज्यत्वात्; तेनासौ पिता तेषामन्नानाम् । एतेषामन्नानां सविनियोगानां सूत्रभूताः सङ्क्षेपतः प्रकाशकत्वादिमे मन्त्राः । | कारणरूपसे सात प्रकारसे विभक्त किये जानेपर भोज्य होनेके कारण सप्तान्न कहा जाता है; इसलिये वह उन अन्नोंका पिता है । विनियोगके सहित इन अन्नोंके संक्षेपतः प्रकाशक होनेके कारण ये मन्त्र इनके सूत्रभूत हैं । |
यत्तत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता । एकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत् । त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य एकं प्रायच्छत् । तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न । कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदा । यो वैतामक्षितिं वेद सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन । स देवानपिगच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति श्लोकाः ॥ १ ॥
पिता (प्रजापति) ने विज्ञान और कर्मके द्वारा जिन सात अन्नोंकी रचना की, उनमेंसे इसका एक अन्न साधारण है [अर्थात् वह सभी प्राणियोंका भोग्य है]; दो अन्न उसने देवताओंको बाँट दिये; तीन अपने लिये रखे, एक पशुओंको दिया । उस (पशुओंको दिये हुए अन्न) में, जो प्राणनक्रिया करते हैं और जो नहीं करते, वे सभी प्रतिष्ठित हैं । ये अन्न सर्वदा खाये जानेपर भी क्षीण क्यों नहीं होते ? जो इस [अन्नके] अक्षय-भावको जानता है, वह मुखरूप प्रतीकके द्वारा अन्न भक्षण करता है । वह देवताओंको प्राप्त होता है तथा अमृतका उपजीवी होता है, इस विषयमें ये श्लोक (मन्त्र) हैं ॥ १ ॥^१
| यत्तत्सप्तान्नानि, यद् अजनय- <br><br> दिति क्रियाविशेषणम्; मेधया | ‘यत्तत्सप्तान्नानि’ इसमें ‘यत्’ शब्द ‘यद् अजनयत्’ इस प्रकार [ ‘अजन-यत्’ क्रियासे सम्बन्ध रखनेके कारण ] क्रियाविशेषण है। मेधा—प्रज्ञा (बुद्धि) |
१. द्वितीय मन्त्र इसीकी व्याख्या करता है ।
बृ० उ० २१—