बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| ३१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
| ३१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| भोजनेऽभिहिते तृप्तिर्न हि पृथग्विधेया, तदर्थत्वाद्भोजनस्य। ते एते एषणे साध्यसाधनलक्षणे कामः, येन प्रयुक्तोऽविद्वान्वश एव कोशकारवदात्मानं वेष्टयति—कर्ममार्ग एवात्मानं प्रणिदधद्बहिर्मुखीभूतो न स्वं लोकं प्रतिजानाति। तथा च तैत्तिरीयके— | भोजनका वर्णन कर दिये जानेपर तज्जनित तृप्तिका अलग वर्णन करनेकी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि भोजन तो उसीके लिये होता है। वे ये साध्य-साधनरूपा एषणाएँ काम हैं, जिस (काम) से प्रेरित हुआ अज्ञानी पुरुष रेशमके कीड़ेके समान अपनेको विवश होकर लपेट लेता है तथा अपनेको कर्ममार्गमें ही अटकाये रखकर बहिर्मुख हो आत्मलोकको नहीं जान पाता। ऐसा ही तैत्तिरीयकमें भी कहा है— |
| “अग्निमुग्धो हैव धूमतान्तः स्वं लोकं न प्रतिजानाति” इति। | “जो पुरुष अग्निसम्बन्धी कर्मोंमें मुग्ध है, उसकी चरमगति धूममार्ग ही है, वह आत्मलोकको नहीं जान पाता” इत्यादि। |
| कथं पुनरेतावत्त्वमवधार्यते कामानाम्? अनन्तत्वात्। अनन्ता हि कामाः, इत्येतदाशङ्क्य हेतुमाह—यस्माद् न इच्छन् च न—इच्छन्नपि, अतोऽस्मात्फलसाधनलक्षणाद् भूयोऽधिकतरं न विन्देन्न लभेत। न हि लोके फलसाधनव्यतिरिक्तं दृष्टमदृष्टं वा लब्धव्यमस्ति। लब्धव्य- | किंतु कामनाओंकी एतावत्ता (इतनापन) कैसे निश्चय की जाती है, क्योंकि वे तो अनन्त हैं। कामनाओंका तो कोई अन्त नहीं है—ऐसी आशङ्का करके श्रुति उसका कारण बतलाती है; क्योंकि इच्छा करनेपर भी पुरुष इस फल और साधनभूत कामनासे अधिक कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता। लोकमें फल और साधनसे व्यतिरिक्त कोई भी दृष्ट या अदृष्ट प्राप्तव्य पदार्थ नहीं है। कामना तो किसी प्राप्तव्य विषयके लिये ही |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३१५
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३१५
| विषयो हि कामः, तस्य चैतद्व्यतिरेकेणाभावात् युक्तं वक्तुम् 'एतावान्वै कामः' इति । | होती है और वह इसके सिवा है नहीं; इसलिये यह कहना उचित ही है कि 'बस इतना ही काम है।' |
| एतदुक्तं भवति—दृष्टार्थमदृष्टार्थं वा साध्यसाधनलक्षणम् अविद्यावत्पुरुषाधिकारविषयमेषणाद्वयं कामः, अतोऽस्माद्विदुषा व्युत्थातव्यमिति । | यहाँ कहना यह है कि दृष्ट अथवा अदृष्ट फलवाला साध्य-साधनरूप तथा अज्ञानी पुरुषके अधिकारका विषयभूत जो एषणाद्वय है, वही काम है, अतः विद्वान्को इससे ऊपर उठना चाहिये। |
| यस्मादेवमविद्वानात्मा कामी पूर्वं कामयामास, तथा पूर्वतरोऽपि, एषा लोकस्थितिः प्रजापतेश्चैवमेष सर्ग आसीत् । सोऽबिभेदविद्यया, ततः कामप्रयुक्त एकाक्यरमणोऽरत्युपघाताय स्त्रियमैच्छत्, तां समभवत्, ततः सर्गोऽयमासीदिति ह्युक्तम् । तस्मात्तत्सृष्टौ एतर्ह्येतस्मिन्नपि काले एकाकी सन्प्राग्दारक्रियातः कामयते—जाया मे स्यात्, अथ प्रजायेय अथ वित्तं मे स्यात्, अथ कर्म कुर्वीय—इत्युक्तार्थं वाक्यम्। | क्योंकि वह अविद्वान् कामी आत्मा पहले इसी प्रकार कामना करता था, अतः उससे पूर्वंतरने भी ऐसे ही कामना की होगी, क्योंकि यह लोकस्थिति है; और प्रजापतिका यह सर्ग भी इसी प्रकार हुआ है। पहले अज्ञानवश उसे भय हुआ, फिर कामसे प्रेरित होकर अकेले रति न करनेके कारण उस अरतिकी निवृत्तिके लिये उसने स्त्रीकी इच्छा की, उससे वह संयुक्त हुआ और फिर यह सृष्टि हुई-इस प्रकार पहले कहा जा चुका है। इसलिये इस समय भी उसकी सृष्टिमें स्त्रीपरिग्रहसे पूर्व एकाकी पुरुष यह कामना करता है कि मेरे स्त्री हो, फिर मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ तथा मेरे धन हो और फिर मैं कर्म करूँ-इस प्रकार यह पूर्वोक्त अर्थवाला वाक्य है। |
३१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| स एवं कामयमानः सम्पादयंश्च जायादीन्यावत्स एतेषां यथोक्तानां जायादीनामेकैकमपि न प्राप्नोति, अकृत्स्नोऽसम्पूर्णोऽहमित्येवं तावदात्मानं मन्यते । पारिशेष्यात्समस्तानेवैतान्सम्पादयति यदा, तदा तस्य कृत्स्नता । | इस प्रकार कामना करके स्त्री आदिका सम्पादन करनेवाला यह पुरुष जबतक इन पूर्वोक्त स्त्री आदिमेंसे एकको भी प्राप्त नहीं कर लेता तबतक यह अपनेको 'मैं असम्पूर्ण हूँ' ऐसा मानता है । फलतः जब यह इन सभीका सम्पादन कर लेता है, तभी उसकी पूर्णता होती है । | | यदा तु न शक्नोति कृत्स्नतां सम्पादयितुं तदा अस्य कृत्स्नत्वसम्पादनायाह—तस्यो तस्याकृत्स्नत्वाभिमानिनः कृत्स्नता इयम् एवं भवति कथम् ? अयं कार्यकरणसङ्घातः प्रविभज्यते; तत्र मनोऽनुवृत्ति हि इतरत्सर्वं कार्यकरणजातमिति मनः प्रधानत्वादात्मैवात्मा। यथा जायादीनां कुटुम्बपतिरात्मैव तदनुकारित्वाज्जायादिचतुष्टयस्य; एवमिहापि मन आत्मा परिकल्पते कृत्स्नतायै। | किंतु जब यह उस पूर्णताका सम्पादन करनेमें समर्थ नहीं होता, उस समय उसके पूर्णत्वके सम्पादनके लिये श्रुति इस प्रकार कहती है—उस अपूर्णताके अभिमानीकी यह पूर्णता इस प्रकार होती है । किस प्रकार ?—[उसके] इस देहेन्द्रियसंधातका विभाग किया जाता है, उसमें अन्य सारा कार्यकारणसमुदाय मनका अनुसरण करनेवाला है, इसलिये प्रधान होनेके कारण उसमें मन ही आत्माके समान आत्मा है । जिस प्रकार परिवारका स्वामी स्त्री आदिका आत्मा होता है, क्योंकि [स्त्री, पुत्र, धन और कर्म—ये] चारों उसका अनुसरण करनेवाले होते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी पूर्णताके लिये मन आत्मा है—ऐसी कल्पना की गयी है । |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३१७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ३१७
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| तथा वाग्जाया, मनोऽनुवृत्तित्वसामान्याद्वाचः । वागिति शब्दश्चोदनादिलक्षणः, मनसा श्रोत्रद्वारेण गृह्यतेऽवधार्यते प्रयुज्यते च, इति मनसो जायेव वाक् । ताभ्यां च वाङ्मनसाभ्यां जायापतिस्थानीयाभ्यां प्रसूयते प्राणः कर्मार्थम्, इति प्राणः प्रजेव । तत्र प्राणचेष्टादिलक्षणं कर्म चक्षुर्दृष्टवित्तसाध्यं भवतीति चक्षुर्मानुषं वित्तम् । तद् द्विविधं वित्तं मानुषमितरच्च; अतो विशिनष्टीतरवित्तनिवृत्त्यर्थं मानुषमिति । गवादि हि मनुष्यसम्बन्धि वित्तं चक्षुर्ग्राह्यं कर्मसाधनम्; तस्मात्तत्स्थानीयम्, तेन सम्बन्धाच्चक्षुर्मानुषं वित्तम्; चक्षुषा हि यस्मात्तन्मानुषं वित्तं विन्दते गवाद्युपलभत इत्यर्थः । | तथा वाणी स्त्री है; क्योंकि मनका अनुवर्तन करना यह स्त्रीके साथ वाणीकी समानता है । 'वाक्' यह विधि-निषेधरूप शब्द है, यह श्रोत्रेन्द्रियद्वारा मनसे गृहीत, निश्चित और प्रयुक्त होता है, इसलिये वाक् मनकी स्त्रीके समान है । उन पति-पत्नीस्थानीय मन और वाणीसे कर्मसम्पादनके लिये प्राणका जन्म होता है, इसलिये प्राण उनकी संतानके समान है । वहाँ प्राणचेष्टादिरूप कर्म नेत्रसे दिखायी देनेवाले धनसे साध्य है, इसलिये नेत्र मानुष वित्त है । वित्त दो प्रकारका होता है—मानुष और अमानुष; अतः अमानुष वित्तकी निवृत्तिके लिये 'मानुषम्' यह विशेषण दिया गया है । गौ आदि मनुष्यसम्बन्धी वित्त नेत्रग्राह्य और कर्मका साधन है, इसलिये वह मानुष वित्तस्थानीय है । उससे सम्बन्ध रखनेके कारण नेत्र मानुष वित्त है, क्योंकि नेत्रसे ही पुरुष मानुष वित्तको यानी गौ आदिको देखता है । |
| किं पुनरितरद्वित्तम् ? श्रोत्रं दैवं | तो फिर दूसरा (अमानुष) वित्त क्या है ? 'श्रोत्र' यह दैव वित्त है, |
| देवविषयत्वाद्धिज्ञानस्य । विज्ञानं दैवं वित्तम्; तदिह श्रोत्रमेव | क्योंकि विज्ञान देवविषयक होता है । विज्ञान दैव वित्त है, यहाँ उस (विज्ञान) की सम्पत्तिका विषय श्रोत्र ही वह |
३१८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
३१८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| सम्पत्तिविषयम् । कस्मात् ? श्रोत्रेण हि यस्मात्तद्दैवं वित्तं विज्ञानं शृणोति; अतः श्रोत्राधीनत्वाद्विज्ञानस्य श्रोत्रमेव तदिति । | (दैव वित्त) है। क्यों? क्योंकि पुरुष श्रोत्रसे ही उस दैव वित्त विज्ञानको सुनता है; अतः विज्ञान श्रोत्रके अधीन होनेके कारण श्रोत्र ही वह (दैव वित्त) है। |
| किं पुनरेतैरात्मादिवित्तान्तैरिह निर्वर्त्यं कर्म ? इत्युच्यते— | किंतु इन आत्मासे लेकर वित्तपर्यन्त पदार्थोंसे निष्पन्न होनेवाला यहाँ कौन-सा कर्म है? सो बतलाया जाता है— |
| आत्मैव—आत्मेति शरीरमुच्यते । | आत्मा ही [इसका कर्म है]। 'आत्मा' शब्दसे यहाँ शरीरका कथन होता है। |
| कथं पुनरात्मा कर्मस्थानीयः? अस्य कर्महेतुत्वात् । कथं कर्महेतुत्वम् ? आत्मना हि शरीरेण यतः कर्म करोति। तस्याकृत्स्नत्वाभिमानिन एवं कृत्स्नता सम्पन्ना—यथा बाह्या जायादिलक्षणा एवम् । | किंतु यह आत्मा कर्मस्थानीय कैसे है? क्योंकि यह कर्मका हेतु है। यह कर्मका हेतु किस प्रकार है? क्योंकि इस आत्मा यानी शरीरसे ही जीव कर्म करता है। किस प्रकार जायादिरूपा बाह्य अपूर्णता है, उसी प्रकार उस शरीरकी अपूर्णताका अभिमान करनेवालेकी इस प्रकार (यानी ऐसा जाननेसे) पूर्णता निष्पन्न हो जाती है। |
| तस्मात्स एष पाङ्क्तः पञ्चभिर्निर्वृत्तः पाङ्क्तो यज्ञो दर्शनमात्रनिर्वृत्तोऽकर्मिणोऽपि । | इसलिये वह यह (आत्म-दर्शन) पाङ्क्त है; पाङ्क्त यानी पाँचके द्वारा निष्पन्न हुआ यज्ञ है। अर्थात् कर्म न करनेवालेके द्वारा भी यह केवल दृष्टिमात्रसे निष्पन्न होता है। |
| कथं पुनरस्य पञ्चत्वसम्पत्तिमात्रेण यज्ञत्वम्? उच्यते—यस्मा- | किंतु पञ्चत्वके सम्पादनमात्रसे इसका यज्ञत्व कैसे सिद्ध होता है? सो बतलाया जाता है; क्योंकि बाह्ययज्ञ |
ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१९
ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१९
| द्वाह्योऽपि यज्ञः पशुपुरुषसाध्यः, स च पशुः पुरुषश्च पाङ्क्त एव यथोक्तमनआदिपञ्चत्वयोगात् । तदाह—पाङ्क्तः पशुर्गवादिः, पाङ्क्तः पुरुषः—पशुत्वेऽप्यधिकृतत्वेनास्य विशेषः पुरुषस्येति पृथक्पुरुषग्रहणम् । किं बहुना ? पाङ्क्तमिदं सर्वं कर्मसाधनं फलं च, यदिदं किञ्च यत्किञ्चिदिदं सर्वम् । एवं पाङ्क्तं यज्ञमात्मानं यः सम्पादयति स तदिदं सर्वं जगदात्मत्वेनाप्नोति य एवं वेद ॥ १७ ॥ | भी पुरुष और पशुसे साध्य है और वह पुरुष एवं पशु भी उपर्युक्त मन आदि पञ्चत्वके सम्बन्धसे पाङ्क्त ही हैं। यही बात श्रुति कहती है—पशु यानी गौ आदि पाङ्क्त हैं, पुरुष पाङ्क्त है। पुरुष भी यद्यपि पशु ही है, तथापि अधिकारी होनेसे इसकी विशेषता है; इसलिये इसे अलग ग्रहण किया है। अधिक क्या ? यह कर्मका साधन और फल सभी पाङ्क्त है। तथा यह जो कुछ भी है सभी पाङ्क्त है। इस प्रकार जो अपनेको पाङ्क्तयज्ञरूपसे भावना करता है, अथवा जो इस प्रकार जानता¹ है, वह इस सम्पूर्ण जगत्को आत्मस्वरूपसे प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये चतुर्थ-
सृष्ट्यादिसर्वात्मताब्राह्मणम् ॥ ४ ॥
पञ्चम ब्राह्मण
सप्तान्नसृष्टि, उसका विभाग और व्याख्या
| उपक्रमः<br>यत्सप्तान्नानि मेधया । अविद्या प्रस्तुता, तत्राविद्वानन्यां देवतामुपास्ते ‘अन्यो- | ‘यत्सप्तान्नानि मेधया’ इत्यादि मन्त्रसे पञ्चम ब्राह्मणका आरम्भ होता है। यहाँ अविद्याका प्रकरण है। तहाँ अविद्वान् ‘यह ( देवता ) अन्य |
१. यानी साध्य और साधनरूप पाङ्क्तको जानकर उसे आत्मस्वरूपसे अनुसंधान करता है।
३२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
३२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ऽसावन्योऽहमस्मि' इति। स वर्णाश्रमाभिमानः कर्मकर्तव्यतया नियतो जुहोत्यादिकर्मभिः कामप्रयुक्तो देवादीनामुपकुर्वन्सर्वेषां भूतानां लोक इत्युक्तम्। यथा च स्वकर्मभिरेकैकैन सर्वैर्भूतैरसौ लोको भोज्यत्वेन सृष्टः, एवमसावपि जुहोत्यादिपाङ्क्तकर्मभिः सर्वाणि भूतानि सर्वं च जगदात्मभोज्यत्वेनासृजत्। | है और मैं अन्य हूँ' इस भावनासे अन्य देवताकी उपासना करता है। वह वर्णाश्रमका अभिमान रखनेवाला पुरुष कर्मकी कर्तव्यतासे नियन्त्रित होकर कामनासे प्रेरित हो होम-यागादि कर्मोंद्वारा देवता आदिका उपकार करनेके कारण समस्त भूतोंका लोक (भोग्य) है— ऐसा पहले कहा गया। जिस प्रकार एक-एक करके सभी प्राणियोंने अपने कर्मोंद्वारा उस लोकको भोज्यरूपसे उत्पन्न किया है, उसी प्रकार उस (कर्माधिकारी) ने भी याग-होमादि पाङ्क्तकर्मोंद्वारा सम्पूर्ण भूतोंको तथा सारे संसारको अपने भोग्यरूपसे रचा। | | एवमेकैकः स्वकर्मविद्यानुरूप्येण सर्वस्य जगतो भोक्ता भोज्यं च, सर्वस्य सर्वः कर्ता कार्यं चेत्यर्थः। | इस प्रकार प्रत्येक जीव अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार सारे जगत्का भोक्ता और भोग्य है, तात्पर्य यह है कि सभी सबके कर्ता और कार्य हैं। | | एतदेव च विद्याप्रकरणे मधुविद्यायां वक्ष्यामः—'सर्वं सर्वस्य कार्यं मधु' इत्यात्मैकत्वविज्ञाना-र्थम्। | ज्ञानके प्रकरणमें आत्मैकत्वके ज्ञानके लिये यही बात हम मधुविद्याके प्रसंगमें कहेंगे कि 'सभी सबके कार्य यानी मधु हैं।' | | यदसौ जुहोतीत्यादिना पाङ्क्तेन काम्येन कर्मणा आत्मभोज्यत्वेन जगदसृजत विज्ञानेन च, तज्जग- | उस कर्ताने जो होम-यागादि पाङ्क्त और काम्यकर्मसे तथा अपने विज्ञानके द्वारा अपने भोज्यरूपसे इस जगत्की रचना की, वह सारा जगत् कार्य- |
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ [३२१
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ [३२१
| त्सर्वं सप्तधा प्रविभज्यमानं कार्य-कारणत्वेन सप्तान्नान्युच्यन्ते, भोज्यत्वात्; तेनासौ पिता तेषामन्नानाम् । एतेषामन्नानां सविनियोगानां सूत्रभूताः सङ्क्षेपतः प्रकाशकत्वादिमे मन्त्राः । | कारणरूपसे सात प्रकारसे विभक्त किये जानेपर भोज्य होनेके कारण सप्तान्न कहा जाता है; इसलिये वह उन अन्नोंका पिता है । विनियोगके सहित इन अन्नोंके संक्षेपतः प्रकाशक होनेके कारण ये मन्त्र इनके सूत्रभूत हैं । |
यत्तत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता । एकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत् । त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य एकं प्रायच्छत् । तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न । कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदा । यो वैतामक्षितिं वेद सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन । स देवानपिगच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति श्लोकाः ॥ १ ॥
पिता (प्रजापति) ने विज्ञान और कर्मके द्वारा जिन सात अन्नोंकी रचना की, उनमेंसे इसका एक अन्न साधारण है [अर्थात् वह सभी प्राणियोंका भोग्य है]; दो अन्न उसने देवताओंको बाँट दिये; तीन अपने लिये रखे, एक पशुओंको दिया । उस (पशुओंको दिये हुए अन्न) में, जो प्राणनक्रिया करते हैं और जो नहीं करते, वे सभी प्रतिष्ठित हैं । ये अन्न सर्वदा खाये जानेपर भी क्षीण क्यों नहीं होते ? जो इस [अन्नके] अक्षय-भावको जानता है, वह मुखरूप प्रतीकके द्वारा अन्न भक्षण करता है । वह देवताओंको प्राप्त होता है तथा अमृतका उपजीवी होता है, इस विषयमें ये श्लोक (मन्त्र) हैं ॥ १ ॥^१
| यत्तत्सप्तान्नानि, यद् अजनय- <br><br> दिति क्रियाविशेषणम्; मेधया | ‘यत्तत्सप्तान्नानि’ इसमें ‘यत्’ शब्द ‘यद् अजनयत्’ इस प्रकार [ ‘अजन-यत्’ क्रियासे सम्बन्ध रखनेके कारण ] क्रियाविशेषण है। मेधा—प्रज्ञा (बुद्धि) |
१. द्वितीय मन्त्र इसीकी व्याख्या करता है ।
बृ० उ० २१—
३२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
३२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| Sanskrit | Hindi |
|---|---|
| प्रज्ञया विज्ञानेन तपसा च कर्मणा;<br>ज्ञानकर्मणी एव हि मेधातपः-<br>शब्दवाच्ये, तयोः प्रकृतत्वात्;<br>नेतरे मेधातपसी, अप्रकरणात्;<br>पाङ्क्तं हि कर्म जायादिसाधनम्;<br>'य एवं वेद' इति चानन्तरमेव<br>ज्ञानं प्रकृतम्; तस्मान्न प्रसिद्धयो<br>मेधातपसोराशङ्का कार्या; अतो<br>यानि सप्तान्नानि ज्ञानकर्मभ्यां<br>जनितवान्पिता तानि प्रकाशयि-<br>ष्याम इति वाक्यशेषः ॥ १ ॥ | अर्थात् विज्ञानसे तथा 'तप' यानी कर्मसे; मेधा और तप शब्दोंके वाच्य ज्ञान और कर्म ही हैं, क्योंकि इन्हींका प्रकरण है, इनसे भिन्न मेधा (धारणा-शक्ति) और कृच्छ्र-चान्द्रायणादि तप इनके वाच्य नहीं हैं; क्योंकि यहाँ उनका प्रसङ्ग नहीं है; यहाँ तो स्त्री आदि जिसके साधन हैं, उस पाङ्क्तकर्मका और इसके अनन्तर ही 'य¹ एवं वेद' इस वाक्यसे ज्ञानका प्रसङ्ग है; इसलिये इन शब्दोंसे प्रसिद्ध मेधा और तप-की आशङ्का नहीं करनी चाहिये; अतः पिताने ज्ञान और कर्मके द्वारा जिन सात अन्नोंको उत्पन्न किया, उन्हें हम प्रकाशित करेंगे। इस वाक्यमें 'तानि प्रकाशयिष्यामः' (उन्हें हम प्रकाशित करेंगे) यह अंश वाक्यशेष है ॥ १ ॥² |
| तत्र मन्त्राणामर्थस्तिरोहितत्वा-<br>त्प्रायेण दुर्विज्ञेयो भवतीति तदर्थ-<br>व्याख्यानाय ब्राह्मणं प्रवर्तते— | तहाँ (मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदमें) मन्त्रोंका अर्थ गूढ़ होनेके कारण प्रायः दुर्बोध होता है, अतः उसके अर्थकी व्याख्या करनेके लिये ब्राह्मण प्रवृत्त होता है— |
१. जो इस प्रकार जानता है।
२. अर्थात् मूल मन्त्रमें इनका वाचक शब्द न होनेपर भी वाक्यको स्पष्ट तथा पूर्ण करनेके लिये वाक्यके शेष (अन्त) में इसे जोड़ लेना चाहिये। इसी प्रकार अन्यत्र भी वाक्यशेषका तात्पर्य समझना चाहिये।
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३२३
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३२३
यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पितेति मेधया हि तपसाजनयत्पिता । एकमस्य साधारणमितीदमेवास्य तत्साधारणमन्नं यदिदमद्यते । स य एतदुपास्ते न स पाप्मनो व्यावर्तते मिश्रꣳ ह्येतत् । द्वे देवानभाजयदिति हुतं च प्रहुतं च तस्माद्देवेभ्यो जुह्वति च प्र च जुह्वत्यथो आहुर्दर्शपूर्णमासाविति । तस्मान्नेष्टियाजुकः स्यात् । पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति तत्पयः । पयो ह्येवाग्रे मनुष्याश्च पशवश्चोपजीवन्ति तस्मात्कुमारं जातं घृतं वै- वाग्रे प्रतिलेहयन्ति स्तनं वानुधापयन्त्यथ वत्सं जात- माहुरतृणाद इति । तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च नेति पयसि हीदꣳ सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न । तद्यदिदमाहुः संवत्सरं पयसा जुह्वदप पुनर्मृत्युं जयतीति न तथा विद्याद्यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्यु- मपजयत्येवं विद्वान्सर्वꣳ हि देवेभ्योऽन्नाद्यं प्रयच्छति । कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदेति पुरुषो वा अक्षितिः स हीदमन्नं पुनः पुनर्जनयते । यो वैतामक्षितिं वेदेति पुरुषो वा अक्षितिः स हीदमन्नं धिया धिया जनयते कर्मभिर्यद्धैतन्न कुर्यात्क्षीयेत ह सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेति मुखं प्रतीकं मुखेनेत्येतत् । स देवानपि- गच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति प्रशꣳसा ॥ २ ॥
'यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता' इसका यह अर्थ प्रसिद्ध है कि पिताने ज्ञान और कर्मके द्वारा ही अन्नोंकी उत्पत्ति की । उसका एक
३२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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अन्न साधारण है अर्थात् यह जो खाया जाता है, वही इसका साधारण अन्न है। जो इसकी उपासना करता है, वह पापसे दूर नहीं होता; क्योंकि यह अन्न मिश्र ( समस्त प्राणियोंका सम्मिलित रूप ) है। दो अन्न उसने देवताओंको बाँटे—वे हुत और प्रहुत हैं इसलिये गृहस्थ पुरुष देवताओंके लिये हवन और बलि-हरण करता है। कोई ऐसा भी कहते हैं कि ये दो अन्न दर्श और पूर्णमास हैं; इसलिये काम्य इष्टियोंके यजनमें प्रवृत्त न हो। एक अन्न पशुओंको दिया, वह दुग्ध है। मनुष्य और पशु पहले दुग्धके ही आश्रय जीवन धारण करते हैं, इसलिये उत्पन्न हुए बालकको पहले घृत चटाते हैं या स्तनपान कराते हैं; तथा उत्पन्न हुए बछड़ेको भी अतृणाद ( तृण भक्षण न करनेवाला ) कहते हैं। जो प्राणनक्रिया करते हैं और जो नहीं करते, वे सब इस ( पश्वन्न ) में ही प्रतिष्ठित हैं। अर्थात् जो प्राणन करते हैं और जो नहीं करते, वे सब दुग्धमें ही प्रतिष्ठित हैं। अतः ऐसा जो कहते हैं कि एक सालतक दुग्धसे हवन करनेवाला पुरुष अपमृत्युको जीत लेता है, सो ऐसा नहीं समझना चाहिये; क्योंकि वह जिस दिन हवन करता है, उसी दिन अपमृत्युको जीत लेता है [ एक सालकी अपेक्षा नहीं करता ]। इस प्रकार जाननेवाला ( उपासना करनेवाला ) पुरुष देवताओंको सम्पूर्ण अन्नाद्य प्रदान करता है। किंतु सर्वदा खाये जानेपर भी वे अन्न क्षीण क्यों नहीं होते ? इसका कारण यह है कि पुरुष अविनाशी है, वही पुनः-पुनः इस अन्नको उत्पन्न कर देता है। जो भी इस अक्षयभावको जानता है अर्थात् पुरुष ही क्षयरहित है, वही इस अन्नको ज्ञान और कर्मद्वारा उत्पन्न कर देता है, यदि वह इसे उत्पन्न न करता तो यह क्षीण हो जाता—[ ऐसा जो जानता है ] वह प्रतीकके द्वारा—मुख प्रतीक है अर्थात् मुखके द्वारा अन्न भक्षण करता है। वह देवताओंको प्राप्त होता है और अमृतका उपजीवी होता है। यह ( फलश्रुति ) प्रशंसा है॥ २॥
| तत्र ‘यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता’ इत्यस्य कोऽर्थ उच्यते ? इति हि शब्देनैव व्याचष्टे | उपर्युक्त ‘यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता’ इत्यादि प्रथम मन्त्रका क्या अर्थ बताया जाता है ? इस प्रश्नके उत्तरमें यह द्वितीय |
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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२५
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२५
| [संस्कृत-भाष्य] | [हिन्दी-भाष्यार्थ] |
|---|---|
| प्रसिद्धार्थावद्योतकेन । प्रसिद्धो ह्यस्य मन्त्रस्यार्थ इत्यर्थः । यदजनयदिति चानुवादस्वरूपेण मन्त्रेण प्रसिद्धार्थतैव प्रकाशिता । अतो ब्राह्मणमविशङ्क्यैवाह—'मेधया हि तपसाजनयत्पिता' इति । | मन्त्ररूप ब्राह्मण प्रसिद्ध अर्थके द्योतक 'हि' शब्दसे ही उक्त मन्त्रकी व्याख्या करता है । इसका तात्पर्य यह है कि इस मन्त्रका अर्थ प्रसिद्ध ही है । 'यदजनयत्' ( जो उत्पन्न किया ) इस अनुवादस्वरूप मन्त्रसे भी इसकी प्रसिद्धार्थता ही प्रकाशित होती है । अतः ब्राह्मण निःशङ्कभावसे ही कहता है—'पिताने विज्ञान और कर्मसे ही उत्पन्न किया ।' |
| ननु कथं प्रसिद्धतास्यार्थस्य ? इत्युच्यते—जायादिकर्मान्तानां लोकफलसाधनानां पितृत्वं तावत्प्रत्यक्षमेव, अभिहितं च 'जाया मे स्यात्' इत्यादिना । तत्र च दैवं वित्तं विद्या कर्म पुत्रश्च फलभूतानां लोकानां साधनं स्रष्टृत्वं प्रतीत्यभिहितम्, वक्ष्यमाणं च प्रसिद्धमेव; तस्माद्युक्तं वक्तुं मेधयेत्यादि । | इस अर्थकी प्रसिद्धार्थता कैसे है ? सो बतलायी जाती है—स्त्रीसे लेकर कर्मपर्यन्त लोक, फल और साधनोंका पितृत्व तो प्रत्यक्ष ही है, यह बात 'मेरे स्त्री हो' इत्यादि वाक्यसे कही ही गयी है । पूर्वग्रन्थमें यह बतलाया गया है कि दैव वित्त, ज्ञान, कर्म और पुत्र अपने फलभूत लोकोंके स्रष्टृत्वमें साधन हैं; तथा आगे¹ जो कहा जायगा वह भी प्रसिद्ध ही है । अतः 'मेधया' इत्यादि कथन उचित ही है । |
| एषणा हि फलविषया प्रसिद्धैव च लोके । एषणा च जायादीत्युक्तम् 'एतावान्वै कामः' इत्य- | एषणा भी किसी फलको ही लेकर होती है—यह बात भी लोकमें प्रसिद्ध ही है । 'एतावान्वै कामः' इस वाक्यसे यह बतलाया गया है कि स्त्री आदि ही एषणा है । ब्रह्मविद्याका |
१. 'पुत्रेणैवायं लोको जय्यः' इस वाक्यसे ।
३२६, बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १
३२६, बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| नेन। ब्रह्मविद्याविषये च सर्वैकत्वात्कामानुपपत्तेः। | जो विषय है, उसमें तो सबकी एकता हो जानेके कारण कामनाका होना सम्भव ही नहीं है।¹ |
| एतेनाशास्त्रीयप्रज्ञातपोभ्यां स्वाभाविकाभ्यां जगत्स्रष्टृत्वमुक्तमेव भवति; स्थावरान्तस्य चानिष्टफलस्य कर्मविज्ञाननिमित्तत्वात्। | इस² उपर्युक्त कथनसे यानी अविद्याजनित काम ही संसार-बन्धनका कारण है—ऐसा दिखलाये जानेसे अशास्त्रीय एवं स्वाभाविक ज्ञान-कर्मोंके द्वारा संसारकी सृष्टि होती है—यह भी प्रतिपादित ही हो जाता है; क्योंकि स्थावर-पर्यन्त सारा अनिष्ट फल कर्म और विज्ञानसे ही होनेवाला है। |
| विवक्षितस्तु शास्त्रीय एव साध्यसाधनभावो ब्रह्मविद्याविधित्सया तद्वैराग्यस्य विवक्षितत्वात्। | किंतु यहाँ शास्त्रीय साध्य-साधनभाव ही बताना इष्ट है, क्योंकि ब्रह्म-विद्याका विधान करनेकी इच्छासे उस (साध्य-साधन) में वैराग्य बतलाना आवश्यक है। |
| सर्वो ह्ययं व्यक्ताव्यक्तलक्षणः संसारोऽशुद्धोऽनित्यः साध्यसाधनरूपो दुःखोऽविद्या- | यह व्यक्त और अव्यक्तरूप सारा ही संसार अशुद्ध, अनित्य, साध्य-साधनरूप, दुःखमय और |
१. यहाँ यह शङ्का होती है कि जिस प्रकार जाया आदि विषयक कामना संसारबन्धनमें डालनेवाली है, उसी प्रकार मोक्षविषयक कामना भी हो सकती है; क्योंकि कामनामात्र बन्धनकी हेतु है, इसके उत्तरमें कहते हैं--ब्रह्मविद्याके विषयमें कामना नहीं होती। कामना रागके कारण होती है और राग अन्यमें होता है। ब्रह्मविद्याके विषयभूत मोक्षमें द्वैतका सर्वथा अभाव है; अतः कामना नहीं होती।
२. यदि कोई कहे, 'जाया मे स्यात्' इत्यादि शास्त्रवचनोंके द्वारा जायादि-विषयक कामनाका उल्लेख होनेसे वह शास्त्रीय है; अतः शास्त्रीय कामना संसारोत्पत्तिमें हेतु हो, किंतु अशास्त्रीय कर्म आदि क्योंकर कारण हो सकते हैं? तो इसके उत्तरमें कहते हैं--इस उपर्युक्त कथनसे इत्यादि।
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२७
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| विषय इत्येतस्माद्विरक्तस्य ब्रह्मविद्या आरब्धव्येति । | अविद्याका विषय है, अतः इससे विरक्त हुए पुरुषके लिये ही ब्रह्मविद्याका आरम्भ करना उचित है। |
| साधारणान्नविवेचनम् —<br>तत्रान्नानां विभागेन विनियोग उच्यते—‘एकमस्य साधारणम्’ इति मन्त्रपदम्, तस्य व्याख्यानम् ‘इदमेवास्य तत्साधारणमन्नम्’ इत्युक्तम् । अस्य भोक्तृसमुदायस्य, किं तत् ? यदिदमद्यते भुज्यते सर्वैः प्राणिभिरहन्यहनि, तत्साधारणं सर्वभोक्त्रर्थमकल्पयत्पिता सृष्ट्वान्नम् । | तहाँ अन्नोंका विभागपूर्वक विनियोग बतलाया जाता है। ‘एकमस्य साधारणम्’ यह मन्त्रका पद है, उसका ‘इदमेवास्य तत्साधारणमन्नम्’ यह व्याख्यान कहा गया है। ‘अस्य’ अर्थात् इस भोक्तृ समुदायका, वह साधारण अन्न है, वह कौन-सा ? यह जो प्रतिदिन समस्त प्राणियोंद्वारा अदन—भोजन किया जाता अर्थात् खाया जाता है। भाव यह कि पिताने अन्नकी रचना करके, उसे समस्त भोक्ताओंके लिये साधारण अन्न नियत कर दिया। |
| स य एतत्साधारणं सर्वप्राणभृत्स्थितिकरं भुज्यमानमन्नमुपास्ते तत्परो भवतीत्यर्थः—उपासनं हि नाम तात्पर्यं दृष्टं लोके ‘गुरुमुपास्ते’ ‘राजानमुपास्ते’ इत्यादौ—तस्माच्छरीरस्थित्यर्थान्नोपभोगप्रधानो नाहदृष्टार्थकर्मप्रधान इत्यर्थः; स एवंभूतो न पाप्मनोऽधर्माद्व्याव- | वह जो समस्त प्राणियोंका भरण-पोषण और स्थिति करनेवाले एवं उनसे भोगे जाते हुए इस साधारण अन्नकी उपासना करता है, अर्थात् तत्पर होता है—लोकमें ‘गुरुकी उपासना करता है,’ ‘राजाकी उपासना करता है’ इत्यादि प्रसङ्गोंमें तत्परता ही उपासनारूपसे देखी गयी है—अतः जो प्रधानतया शरीरकी स्थिति करनेवाले अन्नका ही उपभोग करनेवाला है, अर्थात् अदृष्टोत्पादककर्मप्रधान नहीं है, वह इस प्रकारका पुरुष पाप यानी अधर्मसे नहीं बचता अर्थात् |
३२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| र्तते—न विमुच्यत इत्येतत्। तथा च मन्त्रवर्णः—‘‘मोघमन्नं विन्दते’’ इत्यादिः। स्मृतिरपि—‘‘नात्मार्थं पाचयेदन्नम्’’ ‘‘अप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः’’ (गीता ३।१२) ‘‘अन्नादे भ्रूणहा मार्ष्टि’’ (मनु० ८।३१७) इत्यादिः।<br><br>कस्मात्पुनः पाप्मनो न व्यावर्तते? मिश्रं ह्येतत्सर्वेषां हि स्वं तदप्रविभक्तं यत्प्राणिभिर्भुज्यते। सर्वभोज्यत्वादेव यो मुखे प्रक्षिप्यमाणोऽपि ग्रासः परस्य पीडाकरो दृश्यते, ‘ममेदं स्यात्’ इति हि सर्वेषां तत्राशा प्रतिबद्धा। तस्मान्न परमपीडयित्वा ग्रसितुमपि शक्यते। ‘‘दुष्कृतं हि मनुष्याणाम्’’ इत्यादिस्मरणाच्च। | उससे उसका छुटकारा नहीं होता। ऐसा ही ‘‘वह व्यर्थ अन्नका भोग करता है’’ इत्यादि मन्त्रवर्ण कहता है। तथा ‘‘अपने लिये अन्नपाक न करे’’, ‘‘जो इन्हें बिना दिये भोजन करता है वह चोर ही है’’ ‘‘अपना अन्न खानेवालेको गर्भकी हत्या करनेवाला पापी [अपना पाप देकर] उसका मार्जन करता है’’ इत्यादि स्मृतिवाक्य भी ऐसा ही कहते हैं।<br><br>वह पापसे मुक्त क्यों नहीं होता? क्योंकि जो प्राणियोंद्वारा बिना बाँटे खाया जाता है, वह अन्न मिश्र यानी सभीका स्व-धन है। सबका भोज्य होनेके कारण ही उस अन्नका मुखमें दिया जानेवाला ग्रास भी दूसरेको पीडा देनेवाला देखा जाता है, क्योंकि उसपर ‘यह मेरा हो’ इस प्रकार सभीकी आशा बँधी रहती है। अतः दूसरोंको कष्ट दिये बिना उसे खाया भी नहीं जा सकता; जैसा कि ‘‘दुष्कृतं हि मनुष्याणाम्’’ इत्यादि स्मृति^१ भी कहती है। |
१. यह स्मृतिवाक्य इस प्रकार है—
दुष्कृतं हि मनुष्याणामन्नमाश्रित्य तिष्ठते।
यो हि यस्यान्नमश्नाति स तस्याश्नाति किल्बिषम्॥
अर्थात् मनुष्योंका पाप उनके अन्नके आश्रित रहता है। अतः जो जिसका अन्न खाता है, वह मानो उसका पाप खाता है।
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३२९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३२९
| गृहिणा वैश्वदेवाख्यमन्नं यदहन्यहनि निरूप्यत इति केचित्, तन्न, सर्वभोक्तृसाधारणत्वं वैश्वदेवाख्यस्यान्नस्य न सर्वप्राणभृद्भुज्यमानान्नवत्प्रत्यक्षम्, नापि 'यदिदमद्यते' इति तद्विषयं वचनमनुकूलम्। सर्वप्राणभृद्भुज्यमानान्नान्तःपातित्वाच्च वैश्वदेवाख्यस्य युक्तं श्वचाण्डालाद्याद्यस्यान्नस्य ग्रहणम्, वैश्वदेवव्यतिरेकेणापि श्वचाण्डालाद्याद्यान्नदर्शनात्, तत्र युक्तम्, 'यदिदमद्यते' इति वचनम्। यदि हि तन्न गृह्येत, साधारणशब्देन पित्रासृष्टत्वाविनियुक्तत्वे तस्य प्रसज्येया- | किन्हीं-किन्हीं (भर्तृप्रपञ्च आदि) का कथन है कि गृहस्थद्वारा नित्यप्रति जो वैश्वदेवनामक अन्न निकाला जाता है, वही साधारण अन्न है। यह मत ठीक नहीं, क्योंकि समस्त प्राणियोंद्वारा खाये जानेवाले अन्नके समान वैश्वदेवसंज्ञक अन्नका समस्त भोक्ताओंके लिये साधारण होना प्रत्यक्ष नहीं है और न उसके विषयमें 'यदिदमद्यते' (जो यह खाया जाता है) यह वचन ही अनुकूल है। इसके सिवा वैश्वदेवसंज्ञक अन्न तो समस्त प्राणियोंद्वारा खाये जानेवाले अन्नके अन्तर्गत ही है, अतः वहाँ कुत्ते और चाण्डालादिद्वारा खाये जानेवाले अन्नको ही ग्रहण करना उचित है, क्योंकि वैश्वदेवसे अतिरिक्त भी कुत्ते और चाण्डालादिके खानेयोग्य अन्न देखा जाता है, अतः वहाँ 'जो यह अन्न खाया जाता है' यह वचन उचित होगा और यदि साधारणशब्दसे उस अन्नको ग्रहण नहीं किया जायगा तो 'पिताने उसकी सृष्टि नहीं की और उसका विनियोग भी नहीं किया' ऐसे कथनका प्रसङ्ग उपस्थित होगा। पर वास्तव- |
३३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ३३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| ताम्। इष्यते हि तत्सृष्टत्वं तद्विनियुक्तत्वं च सर्वस्यान्नजातस्य। | में समस्त अन्न उसीने रचे हैं और उसीने उनका विनियोग किया है—यही सिद्धान्त यहाँ इष्ट है। |
| न च वैश्वदेवाख्यं शास्त्रोक्तं कर्म कुर्वतः पाप्मनोऽविनिवृत्तिर्युक्ता, न च तस्य प्रतिषेधोऽस्ति, न च मत्स्यबन्धनादिकर्मवत्स्वभावजुगुप्सितमेतत्, शिष्टनिर्वर्त्यत्वात्, अकरणे च प्रत्यवायश्रवणात्। इतरत्र च प्रत्यवायोपपत्तेः “अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि” (तै० उ० ३।१०।६) इति मन्त्रवर्णात्। | इसके सिवा वैश्वदेवसंज्ञक शास्त्रोक्त कर्म करनेवाले पुरुषका पापसे निवृत्त न होना युक्तिसङ्गत नहीं है। तथा [शास्त्रोंमें] बलि-वैश्वदेवका कहीं भी प्रतिषेध नहीं किया गया है। मछली पकड़ने आदि कर्मोंके समान यह स्वभावतः निन्दनीय भी नहीं है, क्योंकि यह शिष्ट पुरुषोंद्वारा निष्पन्न होनेवाला है और इसके न करनेपर प्रत्यवाय भी सुना गया है। तथा “मैं अन्न ही [अतिथि आदिको बिना दिये] अन्न भक्षण करनेवालेको भक्षण कर जाता हूँ” इस मन्त्रके अनुसार अन्यत्र (वैश्वदेवान्नसे भिन्न अन्न भक्षण करनेमें) ही प्रत्यवाय होना सम्भव है। |
| 'द्वे देवानभाजयत्' इति मन्त्रपदम्, (द्वे देवान्ने) ये द्वे अन्ने सृष्ट्वा देवानभाजयत्। के ते द्वे ? इत्युच्यते—हुतं च प्रहुतं च। हुतमित्यग्नौ हवनम्, प्रहुतं हुत्वा बलिहरणम्। यस्माद् द्वे एते अन्ने हुतप्रहुते | 'द्वे देवानभाजयत्' यह मन्त्रका पद है। पिताने जिन दो अन्नोंको रचकर देवताओंको बाँटा वे दो कौन-से हैं? सो बतलाया जाता है—हुत और प्रहुत। 'हुत' यह अग्निमें हवन करना है, और 'प्रहुत' हवन करके बलिहरण<sup>१</sup> करना है। क्योंकि पिताने ये दो अन्न हुत और प्रहुत |
१. देवताओंके लिये भाग निकालना 'बलिहरण' कहलाता है।
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३३१
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३३१
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| देवानभाजयत्पिता। तस्मादेतद्यर्ह्यपि गृहिणः काले देवेभ्यो जुह्वति देवेभ्य इदमन्नमस्माभिर्दीयमानमिति मन्वाना जुह्वति, प्रजुह्वति च हुत्वा बलिहरणं च कुर्वत इत्यर्थः । | देवताओंको दिये थे, इसलिये इस समय भी गृहस्थलोग समयपर देवताओंके लिये होम करते हैं; अर्थात् 'यह अन्न हमारे द्वारा देवताओंको दिया जाता है'—ऐसा मानते हुए हवन करते हैं तथा 'प्रजुह्वति च' अर्थात् हवन करके बलिहरण भी करते हैं। |
| अथो अप्यन्य आहुर्द्वे अन्ने पित्रा देवेभ्यः प्रत्ते न हुतप्रहुते, किं तर्हि ? दर्शपूर्णमासाविति । द्वित्वश्रवणाविशेषादत्यन्तप्रसिद्धत्वाच्च हुतप्रहुते इति प्रथमः पक्षः। यद्यपि द्वित्वं हुतप्रहुतयोः सम्भवति, तथापि श्रौतयोरेव तु दर्शपूर्णमासयोर्देवान्नत्वं प्रसिद्धतरम्, मन्त्रप्रकाशितत्वात् । गुणप्रधानप्राप्तौ च प्रधाने प्रथमतरा अवगतिः, दर्शपूर्णमासयोश्च प्राधान्यं हुतप्रहुतापेक्षया । तस्मात्तयोरेव ग्रहणं युक्तम् 'द्वे देवानभाजयत्' इति । | तथा किन्हीं दूसरोंका ऐसा भी कहना है कि पिताके द्वारा देवताओंको दिये हुए दो अन्न हुत और प्रहुत नहीं हैं; तो कौन-से हैं ? दर्श और पूर्णमास । द्विवचन-श्रवणमें समानता होनेसे और अत्यन्त प्रसिद्ध होनेसे हुत और प्रहुत ही वे अन्न हैं—यह तो पहला पक्ष है। यद्यपि हुत और प्रहुतका द्वित्व सम्भव है, तो भी उनकी अपेक्षा श्रुतिप्रतिपादित दर्श और पूर्णमासका ही देवान्न होना अधिक प्रसिद्ध है, क्योंकि वे मन्त्रोक्त हैं। इसके सिवा जब गौण और प्रधान अर्थकी प्राप्ति हो तो पहले प्रधान अर्थका ही ज्ञान होगा, और हुत-प्रहुतकी अपेक्षा दर्शपूर्णमासकी ही प्रधानता है। अतः 'द्वे देवानभाजयत्' इस वाक्यसे उन्हींको ग्रहण करना उचित है [—यह दूसरा पक्ष है]। |
३३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| ३३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| यस्माद्देवार्थमेते पित्रा प्रक्लृप्ते दर्शपूर्णमासाख्ये अन्ने, तस्मात्तयोर्देवार्थत्वाविघाताय नेष्टियाजुक इष्टियजनशीलः; इष्टिशब्देन किल काम्या इष्टयः, शातपथीयं प्रसिद्धिः; ताच्छील्यप्रत्ययप्रयोगात्काम्येष्टियजनप्रधानो न स्यादित्यर्थः । | क्योंकि ये दर्श और पूर्णमाससंज्ञक अन्न पिताने देवताओंके लिये बनाये हैं, इसलिये उनकी देवार्थताका विघात न करनेके लिये इष्टियाजुक--इष्टियजनशील नहीं होना चाहिये। 'इष्टि' शब्दसे यहाँ काम्य इष्टियाँ (यज्ञ) समझनी चाहिये, यह शतपथ ब्राह्मणकी प्रसिद्धि है। 'इष्टियाजुकः' इस पदमें 'उकञ्' प्रत्यय ताच्छील्य (तत्स्वभावता) अर्थमें प्रयुक्त है, अतः इसका तात्पर्य यही है कि प्रधानतया कामनायुक्त यज्ञोंका यजन नहीं करना चाहिये। |
| पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति—<br>(पश्वन्नमेकम्) यत्पशुभ्य एकं प्रायच्छत्पिता किं पुनस्तदन्नम्? तत्पयः। कथं पुनरवगम्यते पशवोऽस्यान्नस्य स्वामिनः? इत्यत आह—पयो ह्यग्रे प्रथमं यस्मान्मनुष्याश्च पशवश्च पयः एवोपजीवन्तीति । उचितं हि 'तेषां तदन्नम्' अन्यथा कथं तदेवाग्रे नियमेनोपजीवेयुः ? | 'पशुभ्य एकं प्रायच्छत्' इति—<br>पिताने पशुओंको जो एक अन्न दिया था, वह कौन-सा है? वह दुग्ध है। किंतु यह कैसे जाना जाता है कि इस अन्नके स्वामी पशु हैं—ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—क्योंकि मनुष्य और पशु पहले यानी आरम्भमें दुग्धके आश्रय ही जीवन धारण करते हैं। अतः 'यह उनका अन्न है' ऐसा कहना उचित ही है। नहीं तो वे आरम्भमें नियमसे उसीके आश्रय जीवन-धारण क्यों करते ? |
| कथमग्रे तदेवोपजीवन्ति ? इत्यु- | वे पहले उसीके आश्रय किस प्रकार जीवन धारण करते हैं? सो |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३३
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३३
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| च्यते—मनुष्याश्च पशवश्च यस्मात्तेनैवान्नेन वर्तन्तेऽद्यत्वेऽपि, यथा पित्रा आदौ विनियोगः कृतस्तथा। | बतलाया जाता है—पिताने आरम्भमें जैसा विनियोग किया था, उसीके अनुसार आज भी मनुष्य और पशुगण उसी अन्नके आश्रय रहते हैं। |
| तस्मात्कुमारं बालं जातं घृतं वा त्रैवर्णिका जातकर्मणि जातरूपसंयुक्तं प्रतिलेहयन्ति प्राशयन्ति। स्तनं वानुधापयन्ति पश्चात् पाययन्ति । यथासम्भवमन्येषाम् स्तनमेवाग्रे धापयन्ति मनुष्येभ्योऽन्येषां पशूनाम्। | इसीसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-इन तीन वर्णोंके लोग नवजात कुमारको जातकर्मसंस्कारके समय सुवर्णसंयुक्त (सुवर्णकी शलाकादिसे) घृत चटाते हैं, अथवा स्तनपान कराते हैं, अर्थात् उसके पीछे दुग्धपान कराते हैं। तथा जातकर्मके अनधिकारी दूसरे मनुष्योंके उत्पन्न हुए बालकको एवं मनुष्योंसे भिन्न पशुओंके बछड़ोंको भी यथासम्भव पहले स्तन ही चुसाते हैं। |
| अथ वत्सं जातमाहुः 'कियत्प्रमाणो वत्सः?' इत्येवं पृष्टाः सन्तोऽतृणाद इति । नाद्यापि तृणमत्ति, अतीव बालः, पयसैवाद्यापि वर्तत इत्यर्थः । | जब बछड़ा उत्पन्न होता है, तो उसके विषयमें यह पूछे जानेपर कि 'बछड़ा कितना बड़ा है ?' यही कहते हैं कि 'अभी घास खानेवाला नहीं हुआ'। तात्पर्य यह है कि अभीतक घास नहीं खाता, बहुत ही छोटा है, केवल दूध पीकर ही रहता है। |
| यच्चाग्रे जातकर्मादौ घृतमुपजीवन्ति, यच्चेतरे पय एव, तत्सर्वथापि पय एवोपजीवन्ति; घृतस्यापि पयोविकारत्वात्पयस्त्वमेव। | इस प्रकार जो पहले जातकर्म आदिमें घृतके आश्रय जीवन धारण करते हैं और जो दूसरे जीव दुग्धके ही आश्रय रहते हैं वे सब सर्वथा दुग्धके ही उपजीवी हैं; क्योंकि दुग्धका विकार होनेके कारण घृत भी दुग्धरूप ही है। |
| कस्मात्पुनः सप्तमं सत्पश्वन्नं चतु- | किंतु [मन्त्रमें] पश्वन्न सातवाँ होनेपर भी यहाँ (ब्राह्मणमें) इसकी |