भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 338
३३२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
यस्माद्देवार्थमेते पित्रा प्रक्लृप्ते दर्शपूर्णमासाख्ये अन्ने, तस्मात्तयोर्देवार्थत्वाविघाताय नेष्टियाजुक इष्टियजनशीलः; इष्टिशब्देन किल काम्या इष्टयः, शातपथीयं प्रसिद्धिः; ताच्छील्यप्रत्ययप्रयोगात्काम्येष्टियजनप्रधानो न स्यादित्यर्थः ।क्योंकि ये दर्श और पूर्णमाससंज्ञक अन्न पिताने देवताओंके लिये बनाये हैं, इसलिये उनकी देवार्थताका विघात न करनेके लिये इष्टियाजुक--इष्टियजनशील नहीं होना चाहिये। 'इष्टि' शब्दसे यहाँ काम्य इष्टियाँ (यज्ञ) समझनी चाहिये, यह शतपथ ब्राह्मणकी प्रसिद्धि है। 'इष्टियाजुकः' इस पदमें 'उकञ्' प्रत्यय ताच्छील्य (तत्स्वभावता) अर्थमें प्रयुक्त है, अतः इसका तात्पर्य यही है कि प्रधानतया कामनायुक्त यज्ञोंका यजन नहीं करना चाहिये।
पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति—<br>(पश्वन्नमेकम्) यत्पशुभ्य एकं प्रायच्छत्पिता किं पुनस्तदन्नम्? तत्पयः। कथं पुनरवगम्यते पशवोऽस्यान्नस्य स्वामिनः? इत्यत आह—पयो ह्यग्रे प्रथमं यस्मान्मनुष्याश्च पशवश्च पयः एवोपजीवन्तीति । उचितं हि 'तेषां तदन्नम्' अन्यथा कथं तदेवाग्रे नियमेनोपजीवेयुः ?'पशुभ्य एकं प्रायच्छत्' इति—<br>पिताने पशुओंको जो एक अन्न दिया था, वह कौन-सा है? वह दुग्ध है। किंतु यह कैसे जाना जाता है कि इस अन्नके स्वामी पशु हैं—ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—क्योंकि मनुष्य और पशु पहले यानी आरम्भमें दुग्धके आश्रय ही जीवन धारण करते हैं। अतः 'यह उनका अन्न है' ऐसा कहना उचित ही है। नहीं तो वे आरम्भमें नियमसे उसीके आश्रय जीवन-धारण क्यों करते ?
कथमग्रे तदेवोपजीवन्ति ? इत्यु-वे पहले उसीके आश्रय किस प्रकार जीवन धारण करते हैं? सो