भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 339

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३३


संस्कृतहिन्दी
च्यते—मनुष्याश्च पशवश्च यस्मात्तेनैवान्नेन वर्तन्तेऽद्यत्वेऽपि, यथा पित्रा आदौ विनियोगः कृतस्तथा।बतलाया जाता है—पिताने आरम्भमें जैसा विनियोग किया था, उसीके अनुसार आज भी मनुष्य और पशुगण उसी अन्नके आश्रय रहते हैं।
तस्मात्कुमारं बालं जातं घृतं वा त्रैवर्णिका जातकर्मणि जातरूपसंयुक्तं प्रतिलेहयन्ति प्राशयन्ति। स्तनं वानुधापयन्ति पश्चात् पाययन्ति । यथासम्भवमन्येषाम् स्तनमेवाग्रे धापयन्ति मनुष्येभ्योऽन्येषां पशूनाम्।इसीसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-इन तीन वर्णोंके लोग नवजात कुमारको जातकर्मसंस्कारके समय सुवर्णसंयुक्त (सुवर्णकी शलाकादिसे) घृत चटाते हैं, अथवा स्तनपान कराते हैं, अर्थात् उसके पीछे दुग्धपान कराते हैं। तथा जातकर्मके अनधिकारी दूसरे मनुष्योंके उत्पन्न हुए बालकको एवं मनुष्योंसे भिन्न पशुओंके बछड़ोंको भी यथासम्भव पहले स्तन ही चुसाते हैं।
अथ वत्सं जातमाहुः 'कियत्प्रमाणो वत्सः?' इत्येवं पृष्टाः सन्तोऽतृणाद इति । नाद्यापि तृणमत्ति, अतीव बालः, पयसैवाद्यापि वर्तत इत्यर्थः ।जब बछड़ा उत्पन्न होता है, तो उसके विषयमें यह पूछे जानेपर कि 'बछड़ा कितना बड़ा है ?' यही कहते हैं कि 'अभी घास खानेवाला नहीं हुआ'। तात्पर्य यह है कि अभीतक घास नहीं खाता, बहुत ही छोटा है, केवल दूध पीकर ही रहता है।
यच्चाग्रे जातकर्मादौ घृतमुपजीवन्ति, यच्चेतरे पय एव, तत्सर्वथापि पय एवोपजीवन्ति; घृतस्यापि पयोविकारत्वात्पयस्त्वमेव।इस प्रकार जो पहले जातकर्म आदिमें घृतके आश्रय जीवन धारण करते हैं और जो दूसरे जीव दुग्धके ही आश्रय रहते हैं वे सब सर्वथा दुग्धके ही उपजीवी हैं; क्योंकि दुग्धका विकार होनेके कारण घृत भी दुग्धरूप ही है।
कस्मात्पुनः सप्तमं सत्पश्वन्नं चतु-किंतु [मन्त्रमें] पश्वन्न सातवाँ होनेपर भी यहाँ (ब्राह्मणमें) इसकी