बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 340, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| र्थत्वेन व्याख्यायते ? कर्मसाधन- | चतुर्थरूपसे व्याख्या क्यों की गयी है ? [उत्तर--] क्योंकि यह कर्मका | | त्वात् । कर्म हि पयःसाधनाश्रयं | साधन है। अग्निहोत्रादि कर्म दुग्ध- | | अग्निहोत्रा दि । तच्च कर्म साधनं | रूप साधनके ही आश्रित हैं। और वह कर्म आगे कहे जानेवाले साध्य- | | वित्तसाध्यं वक्ष्यमाणस्यान्नत्रयस्य | भूत तीन अन्नोंका वित्तसाध्य साधन है जैसे कि पहले बतलाये | | साध्यस्य, यथा दर्शपूर्णमासौ | हुए दर्श और पूर्णमास नामक अन्न । अतः कर्मके पक्षमें होनेके कारण | | पूर्वोक्तावन्ने । अतः कर्मपक्षत्वात् | इसका कर्मके साथ मिलकर उपदेश किया गया है । [ दर्श-पूर्णमासके | | कर्मणा सह पिण्डीकृत्योपदेशः। | साथ ] साधनत्वमें समानता होनेके कारण इसका उनके साथ अर्थमें | | साधनत्वाविशेषादर्थसम्बन्धादा- | भी सम्बन्ध है, इसलिये केवल पाठ- | | नन्तर्यमकारणमिति च । व्याख्याने | का आनन्तर्य इनके अर्थक्रममें अन्तर डालनेका कारण नहीं हो सकता । | | प्रतिपत्तिसौकर्याच्च । सुखं हि | इस प्रकार व्याख्या करनेसे समझने- में भी सुगमता होती है । साधनभूत | | नैरन्तर्येण व्याख्यातुं शक्यन्ते- | अन्नोंकी व्याख्या एक साथ सुगमता- से की जा सकती है और इस प्रकार | | ऽन्नानि व्याख्यातानि च सुखं | व्याख्या करनेपर अनायास ही उनकी प्रतीति हो जाती है ।¹ | | प्रतीयन्ते । | | | तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च | जो कोई प्राणनक्रिया करता है और जो नहीं करता वह सब उसीमें |
१. चार अन्न साधन हैं और तीन साध्य हैं; अतः उन साधन और साध्य-भूत अन्नोंका विभाग करके व्याख्या करनेसे वक्ता, श्रोता दोनोंके समझनेमें सुविधा होगी, इसीसे यहाँ पाठक्रमका अतिक्रमण करके पश्वन्नकी व्याख्या की गयी है ।