बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 341, कुल 1402 में से
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| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३३५ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| [पयोद्रव्यस्य सर्वप्रतिष्ठात्वनिरूपणम्]<br>प्राणिति यच्च नेत्यस्य कोऽर्थः ? इत्युच्यते—तस्मिन्नपशन्ने पयसि सर्वमध्यात्मधिभूताधिदैवलक्षणं कृत्स्नं जगत्प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति प्राणचेष्टावद्यच्च न स्थावरं शैलादि । तत्र हिशब्देनैव प्रसिद्धावद्योतकेन व्याख्यातम् । कथं पयोद्रव्यस्य सर्वप्रतिष्ठात्वम् ? कारणत्वोपपत्तेः । कारणत्वं चाग्निहोत्रादिकर्मसमवायित्वम् । अग्निहोत्राद्याहुतिविपरिणामात्मकं च जगत्कृत्स्नमिति श्रुतिस्मृतिवादाः शतशो व्यवस्थिताः । अतो युक्तमेव हिशब्देन व्याख्यानम् । | प्रतिष्ठित है—इस वाक्यका क्या तात्पर्य है ? सो बतलाया जाता है । उस दुग्धरूप पश्वन्नमें, जो प्राणन करता है अर्थात् प्राणचेष्टासे युक्त है और जो स्थावर पर्वतादि वैसे नहीं हैं, वे सब यानी अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवरूप सारा ही जगत् प्रतिष्ठित है । यहाँ प्रसिद्धिके द्योतक ‘हि’ शब्दसे ही इसकी व्याख्या की गयी है । किंतु दुग्ध द्रव्य सबकी प्रतिष्ठा किस प्रकार है ? क्योंकि उसमें कारणत्वकी उपपत्ति है । अग्निहोत्रादि कर्मसे सम्बन्ध होना ही उसका कारणत्व है । अग्निहोत्रादिकी आहुतियोंका विपरिणाम रूप ही सारा जगत् है—इस विषयमें सैकड़ों श्रुति-स्मृतिवाद व्यवस्थित हैं । अतः ‘हि’ शब्दसे इसकी व्याख्या करना उचित ही है । |
| यत्तद्ब्राह्मणान्तरेष्विदमाहुः—<br>[कथं संवत्सरं पयसा जुह्वदपमृत्युं जयति]<br>संवत्सरं पयसा जुह्वदप पुनर्मृत्युं जयतीति, संवत्सरेण किल त्रीणि षष्टिशतान्याहुतीनां सप्त च शतानि विंशतिश्चेति | ब्राह्मणान्तरोंमें जो ऐसा कहा है कि एक संवत्सरपर्यन्त दुग्धसे हवन करनेवाला पुरुष अपमृत्युको जीत लेता है, सो यहाँ संवत्सरसे तीन सौ साठ अथवा सात सौ बीस आहुतियाँ अभिप्रेत हैं।¹ वे संवत्सरके दिन-रात |
१ संवत्सरमें तीन सौ साठ दिन होते हैं, प्रत्येक दिनके दोनों समयके होमकी आहुतियोंको एक मानकर समस्त आहुतियाँ भी तीन सौ साठ होंगी और प्रत्येक समयकी एक-एक आहुति माननेसे उनकी संख्या सात सौ बीस होगी ।