बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 337, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३३१
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| देवानभाजयत्पिता। तस्मादेतद्यर्ह्यपि गृहिणः काले देवेभ्यो जुह्वति देवेभ्य इदमन्नमस्माभिर्दीयमानमिति मन्वाना जुह्वति, प्रजुह्वति च हुत्वा बलिहरणं च कुर्वत इत्यर्थः । | देवताओंको दिये थे, इसलिये इस समय भी गृहस्थलोग समयपर देवताओंके लिये होम करते हैं; अर्थात् 'यह अन्न हमारे द्वारा देवताओंको दिया जाता है'—ऐसा मानते हुए हवन करते हैं तथा 'प्रजुह्वति च' अर्थात् हवन करके बलिहरण भी करते हैं। |
| अथो अप्यन्य आहुर्द्वे अन्ने पित्रा देवेभ्यः प्रत्ते न हुतप्रहुते, किं तर्हि ? दर्शपूर्णमासाविति । द्वित्वश्रवणाविशेषादत्यन्तप्रसिद्धत्वाच्च हुतप्रहुते इति प्रथमः पक्षः। यद्यपि द्वित्वं हुतप्रहुतयोः सम्भवति, तथापि श्रौतयोरेव तु दर्शपूर्णमासयोर्देवान्नत्वं प्रसिद्धतरम्, मन्त्रप्रकाशितत्वात् । गुणप्रधानप्राप्तौ च प्रधाने प्रथमतरा अवगतिः, दर्शपूर्णमासयोश्च प्राधान्यं हुतप्रहुतापेक्षया । तस्मात्तयोरेव ग्रहणं युक्तम् 'द्वे देवानभाजयत्' इति । | तथा किन्हीं दूसरोंका ऐसा भी कहना है कि पिताके द्वारा देवताओंको दिये हुए दो अन्न हुत और प्रहुत नहीं हैं; तो कौन-से हैं ? दर्श और पूर्णमास । द्विवचन-श्रवणमें समानता होनेसे और अत्यन्त प्रसिद्ध होनेसे हुत और प्रहुत ही वे अन्न हैं—यह तो पहला पक्ष है। यद्यपि हुत और प्रहुतका द्वित्व सम्भव है, तो भी उनकी अपेक्षा श्रुतिप्रतिपादित दर्श और पूर्णमासका ही देवान्न होना अधिक प्रसिद्ध है, क्योंकि वे मन्त्रोक्त हैं। इसके सिवा जब गौण और प्रधान अर्थकी प्राप्ति हो तो पहले प्रधान अर्थका ही ज्ञान होगा, और हुत-प्रहुतकी अपेक्षा दर्शपूर्णमासकी ही प्रधानता है। अतः 'द्वे देवानभाजयत्' इस वाक्यसे उन्हींको ग्रहण करना उचित है [—यह दूसरा पक्ष है]। |