बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 336, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 336
| ३३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| ताम्। इष्यते हि तत्सृष्टत्वं तद्विनियुक्तत्वं च सर्वस्यान्नजातस्य। | में समस्त अन्न उसीने रचे हैं और उसीने उनका विनियोग किया है—यही सिद्धान्त यहाँ इष्ट है। |
| न च वैश्वदेवाख्यं शास्त्रोक्तं कर्म कुर्वतः पाप्मनोऽविनिवृत्तिर्युक्ता, न च तस्य प्रतिषेधोऽस्ति, न च मत्स्यबन्धनादिकर्मवत्स्वभावजुगुप्सितमेतत्, शिष्टनिर्वर्त्यत्वात्, अकरणे च प्रत्यवायश्रवणात्। इतरत्र च प्रत्यवायोपपत्तेः “अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि” (तै० उ० ३।१०।६) इति मन्त्रवर्णात्। | इसके सिवा वैश्वदेवसंज्ञक शास्त्रोक्त कर्म करनेवाले पुरुषका पापसे निवृत्त न होना युक्तिसङ्गत नहीं है। तथा [शास्त्रोंमें] बलि-वैश्वदेवका कहीं भी प्रतिषेध नहीं किया गया है। मछली पकड़ने आदि कर्मोंके समान यह स्वभावतः निन्दनीय भी नहीं है, क्योंकि यह शिष्ट पुरुषोंद्वारा निष्पन्न होनेवाला है और इसके न करनेपर प्रत्यवाय भी सुना गया है। तथा “मैं अन्न ही [अतिथि आदिको बिना दिये] अन्न भक्षण करनेवालेको भक्षण कर जाता हूँ” इस मन्त्रके अनुसार अन्यत्र (वैश्वदेवान्नसे भिन्न अन्न भक्षण करनेमें) ही प्रत्यवाय होना सम्भव है। |
| 'द्वे देवानभाजयत्' इति मन्त्रपदम्, (द्वे देवान्ने) ये द्वे अन्ने सृष्ट्वा देवानभाजयत्। के ते द्वे ? इत्युच्यते—हुतं च प्रहुतं च। हुतमित्यग्नौ हवनम्, प्रहुतं हुत्वा बलिहरणम्। यस्माद् द्वे एते अन्ने हुतप्रहुते | 'द्वे देवानभाजयत्' यह मन्त्रका पद है। पिताने जिन दो अन्नोंको रचकर देवताओंको बाँटा वे दो कौन-से हैं? सो बतलाया जाता है—हुत और प्रहुत। 'हुत' यह अग्निमें हवन करना है, और 'प्रहुत' हवन करके बलिहरण<sup>१</sup> करना है। क्योंकि पिताने ये दो अन्न हुत और प्रहुत |
१. देवताओंके लिये भाग निकालना 'बलिहरण' कहलाता है।