बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 335, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३२९
| गृहिणा वैश्वदेवाख्यमन्नं यदहन्यहनि निरूप्यत इति केचित्, तन्न, सर्वभोक्तृसाधारणत्वं वैश्वदेवाख्यस्यान्नस्य न सर्वप्राणभृद्भुज्यमानान्नवत्प्रत्यक्षम्, नापि 'यदिदमद्यते' इति तद्विषयं वचनमनुकूलम्। सर्वप्राणभृद्भुज्यमानान्नान्तःपातित्वाच्च वैश्वदेवाख्यस्य युक्तं श्वचाण्डालाद्याद्यस्यान्नस्य ग्रहणम्, वैश्वदेवव्यतिरेकेणापि श्वचाण्डालाद्याद्यान्नदर्शनात्, तत्र युक्तम्, 'यदिदमद्यते' इति वचनम्। यदि हि तन्न गृह्येत, साधारणशब्देन पित्रासृष्टत्वाविनियुक्तत्वे तस्य प्रसज्येया- | किन्हीं-किन्हीं (भर्तृप्रपञ्च आदि) का कथन है कि गृहस्थद्वारा नित्यप्रति जो वैश्वदेवनामक अन्न निकाला जाता है, वही साधारण अन्न है। यह मत ठीक नहीं, क्योंकि समस्त प्राणियोंद्वारा खाये जानेवाले अन्नके समान वैश्वदेवसंज्ञक अन्नका समस्त भोक्ताओंके लिये साधारण होना प्रत्यक्ष नहीं है और न उसके विषयमें 'यदिदमद्यते' (जो यह खाया जाता है) यह वचन ही अनुकूल है। इसके सिवा वैश्वदेवसंज्ञक अन्न तो समस्त प्राणियोंद्वारा खाये जानेवाले अन्नके अन्तर्गत ही है, अतः वहाँ कुत्ते और चाण्डालादिद्वारा खाये जानेवाले अन्नको ही ग्रहण करना उचित है, क्योंकि वैश्वदेवसे अतिरिक्त भी कुत्ते और चाण्डालादिके खानेयोग्य अन्न देखा जाता है, अतः वहाँ 'जो यह अन्न खाया जाता है' यह वचन उचित होगा और यदि साधारणशब्दसे उस अन्नको ग्रहण नहीं किया जायगा तो 'पिताने उसकी सृष्टि नहीं की और उसका विनियोग भी नहीं किया' ऐसे कथनका प्रसङ्ग उपस्थित होगा। पर वास्तव- |