बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 334, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 334
| ३२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| र्तते—न विमुच्यत इत्येतत्। तथा च मन्त्रवर्णः—‘‘मोघमन्नं विन्दते’’ इत्यादिः। स्मृतिरपि—‘‘नात्मार्थं पाचयेदन्नम्’’ ‘‘अप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः’’ (गीता ३।१२) ‘‘अन्नादे भ्रूणहा मार्ष्टि’’ (मनु० ८।३१७) इत्यादिः।<br><br>कस्मात्पुनः पाप्मनो न व्यावर्तते? मिश्रं ह्येतत्सर्वेषां हि स्वं तदप्रविभक्तं यत्प्राणिभिर्भुज्यते। सर्वभोज्यत्वादेव यो मुखे प्रक्षिप्यमाणोऽपि ग्रासः परस्य पीडाकरो दृश्यते, ‘ममेदं स्यात्’ इति हि सर्वेषां तत्राशा प्रतिबद्धा। तस्मान्न परमपीडयित्वा ग्रसितुमपि शक्यते। ‘‘दुष्कृतं हि मनुष्याणाम्’’ इत्यादिस्मरणाच्च। | उससे उसका छुटकारा नहीं होता। ऐसा ही ‘‘वह व्यर्थ अन्नका भोग करता है’’ इत्यादि मन्त्रवर्ण कहता है। तथा ‘‘अपने लिये अन्नपाक न करे’’, ‘‘जो इन्हें बिना दिये भोजन करता है वह चोर ही है’’ ‘‘अपना अन्न खानेवालेको गर्भकी हत्या करनेवाला पापी [अपना पाप देकर] उसका मार्जन करता है’’ इत्यादि स्मृतिवाक्य भी ऐसा ही कहते हैं।<br><br>वह पापसे मुक्त क्यों नहीं होता? क्योंकि जो प्राणियोंद्वारा बिना बाँटे खाया जाता है, वह अन्न मिश्र यानी सभीका स्व-धन है। सबका भोज्य होनेके कारण ही उस अन्नका मुखमें दिया जानेवाला ग्रास भी दूसरेको पीडा देनेवाला देखा जाता है, क्योंकि उसपर ‘यह मेरा हो’ इस प्रकार सभीकी आशा बँधी रहती है। अतः दूसरोंको कष्ट दिये बिना उसे खाया भी नहीं जा सकता; जैसा कि ‘‘दुष्कृतं हि मनुष्याणाम्’’ इत्यादि स्मृति^१ भी कहती है। |
१. यह स्मृतिवाक्य इस प्रकार है—
दुष्कृतं हि मनुष्याणामन्नमाश्रित्य तिष्ठते।
यो हि यस्यान्नमश्नाति स तस्याश्नाति किल्बिषम्॥
अर्थात् मनुष्योंका पाप उनके अन्नके आश्रित रहता है। अतः जो जिसका अन्न खाता है, वह मानो उसका पाप खाता है।