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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

३७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

३७४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

सम्प्रत्तिकर्मकर्तामें वागादि प्राणोंके आवेशका प्रकार

| पाङ्क्तकर्मणो मोक्षार्थत्वनिरासः<br>कथमिति वक्ष्यति पृथिव्यै चैनमित्यादि । एवं पुत्रकर्मापरविद्यानां मनुष्यलोकपितृलोकदेवलोकसाध्यार्थता प्रदर्शिता श्रुत्या स्वयमेव । अत्र केचिद्भावदूकाः श्रुत्युक्तविशेषार्थानभिज्ञाः सन्तः पुत्रादिसाधनानां मोक्षार्थतां वदन्ति । तेषां मुखापिधानं श्रुत्येदं कृतम्—जाया मे स्यादित्यादि पाङ्क्तं काम्यं कर्मेत्युपक्रमेण, पुत्रादीनां च साध्यविशेषविनियोगोपसंहारेण च । तस्मादृणश्रुतिरविद्वद्विषया न परमात्मविद्विषयेति सिद्धम् । वक्ष्यति च—"किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः" ( ४ । ४ । २२) इति । | किस प्रकार आविष्ट होते हैं, सो 'पृथिव्यै चैनम्' इत्यादि श्रुति बतलावेगी । इस प्रकार श्रुतिने स्वयं ही पुत्र, कर्म और अपरा विद्याको मनुष्यलोक, पितृलोक एवं देवलोककी प्राप्तिके साधनरूपसे दिखलाया । यहाँ कुछ वाचाललोग श्रुतिप्रतिपादित विशेष अर्थको न समझकर पुत्रादि साधनोंकी मोक्षार्थता बतलाते हैं। परंतु श्रुतिने—'मेरे स्त्री हो' इत्यादि पाङ्क्त काम्य कर्म है—इस उपक्रमसे तथा पुत्रादिका [ मनुष्यलोकादि ] साध्यविशेषमें विनियोग करनारूप उपसंहारसे उनका मुख बंद कर दिया है। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि ऋणत्रयका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका अधिकारी अज्ञानी है, परमात्मवेत्ता नहीं। आगे श्रुति कहेगी भी कि "हम, जिनका यह आत्मा ही लोक है, प्रजासे क्या करेंगे ?" इत्यादि। | | समुच्चयवाद-निराकरणम्<br>केचित्तु पितृलोकदेवलोकजयोऽपि पितृलोकदेवलोकाभ्यां व्यावृतिरेव; तस्मात्पुत्रकर्मापरविद्याभिः समुच्चितानुष्ठिताभिस्त्रिभ्य एते- | किन्हीं-किन्हींका मत है कि पितृलोक और देवलोकको जीतना भी पितृलोक और देवलोकसे निवृत्त होना ही है। अतः समुच्चयपूर्वक [अर्थात् एक साथ ] अनुष्ठान किये हुए पुत्र, कर्म और अपराविद्याद्वारा |

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ३७५ |

ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थे३७५
संस्कृतहिन्दी
ख्यो लोकेभ्यो व्यावृत्तः परमात्मविज्ञानेन मोक्षमधिगच्छतीति परम्परया मोक्षार्थान्येव पुत्रादिसाधनानीच्छन्ति। तेषामपि मुखापिधानायेयमेव श्रुतिरुत्तरा कृतसम्प्रत्तिकस्य पुत्रिणः कर्मिणः त्र्यन्नात्मविद्याविदः फलप्रदर्शनाय प्रवृत्ता।इन तीनों लोकोंसे निवृत्त हुआ पुरुष परमात्मज्ञानके द्वारा मोक्ष प्राप्त कर लेता है; इस प्रकार उनका मत है कि पुत्रादि साधन भी परम्परासे मोक्षके ही लिये हैं। उनका भी मुख बंद करनेके लिये यह आगेकी श्रुति, जिसने सम्प्रत्ति-कर्म किया है, उस पुत्रवान्, कर्मठ एवं त्र्यन्नात्मविद्याके ज्ञाताको मिलनेवाला फल बतलानेके लिये प्रवृत्त होती है।
न चेदमेव फलं मोक्षफलमिति- <br><br> शक्यं वक्तुम्, त्र्यन्नसम्बन्धात्, मेधातपःकार्यत्वाच्चान्नानाम्, ‘पुनः पुनर्ज॑नयते’ इति दर्शनात्; ‘यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयेत ह’ इति च क्षयश्रवणात्। शरीरं ज्योतीरूपमिति च कार्यकरणत्वोपपत्तेः। ‘त्रयं वा इदम्’ इति च नामरूपकर्मात्मकत्वेनोपसंहारात्।और यह कहा नहीं जा सकता कि यह फल ही मोक्षफल है; क्योंकि इसका अन्नत्रयसे सम्बन्ध है और अन्न मेधा एवं तपके कार्य हैं, कारण 'वह इन्हें पुनः-पुनः उत्पन्न करता है' ऐसा श्रुतिका वचन देखा जाता है तथा 'यदि वह इन्हें उत्पन्न न करे तो ये क्षीण हो जायँ' इस प्रकार इनका क्षय भी सुना गया है। एवं शरीर और ज्योतीरूप बतलाकर इनके कार्यत्व और करणत्वकी भी उपपत्ति दिखायी गयी है और 'त्रयं वा इदम्' ऐसा कहकर नाम-रूप-कर्मात्मक रूपसे इनका उपसंहार किया है।
न चेदमेव साधनत्रयं संहतं सत्कस्यचिन्मोक्षार्थं कस्यचित्इस एक ही वाक्यसे ऐसा भी नहीं जाना जा सकता कि ये तीनों साधन मिलकर किसीके मोक्षके लिये

३७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

३७६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
त्र्यन्नात्मफलमित्यस्मादेव वाक्यादवगन्तुं शक्यम्, पुत्रादिसाधनानां त्र्यन्नात्मफलदर्शनेनैवोपक्षीणत्वाद् वाक्यस्य।होते हैं और किसीके लिये त्र्यन्नात्मरूप फलवाले होते हैं, क्योंकि पुत्रादि साधनोंका त्र्यन्नात्मफल दिखाते हुए ही यह वाक्य समाप्त होता है।

पृथिव्यै चैनमग्नेश्च दैवी वागाविशति सा वै दैवी वाग्यया यद्यदेव वदति तत्तद्भवति ॥ १८ ॥

पृथिवी और अग्निसे इसमें दैवी वाक्‌का आवेश होता है। दैवी वाक् वही है, जिससे पुरुष जो-जो भी बोलता है, वही-वही हो जाता है ॥ १८ ॥

पृथिव्यै पृथिव्याः च एनम् अग्नेश्च <br><br> दैवी अधिदैवात्मिका वागेनं कृतसम्प्रत्तिकमाविशति। सर्वेषां हि वाच उपादानभूता दैवी वाक्पृथिव्यग्निलक्षणा, सा ह्याध्यात्मिकासङ्गादिदोषैर्निरुद्धा। विदुषस्तदोषापगमे आवरणभङ्ग इवोदकप्रदीपप्रकाशवच्च व्याप्नोति। तदेतदुच्यते—पृथिव्या अग्नेश्चैनं दैवी वागाविशतीति। <br><br> सा च दैवी वागनृतादिदोषरहिता शुद्धा, यया वाचा दैव्या यद्यदेव आत्मने परस्मै वा वदतिपृथिवी और अग्निसे इस सम्प्रत्तिकर्म करनेवालेमें दैवी—आधिदैविक वाक्‌का आवेश होता है। पृथिवी और अग्निरूपा दैवी वाक् सभीकी वाणीकी उपादानभूता है, निश्चय ही वह आध्यात्मिक (दैहिक) आसक्ति आदि दोषोंसे आवृत्त है, किंतु आवरण (व्यवधान) के निवृत्त होनेपर जैसे जल और प्रकाश फैल जाते हैं उसी प्रकार विद्वान्‌के उस (आध्यात्मिक आसक्तिरूप) दोषके निवृत्त हो जानेपर वह उसमें आविष्ट हो जाती है। इसीसे यह कहा है कि उसमें पृथिवी और अग्निसे दैवी वाक्‌का आवेश होता है। <br><br> वह दैवी वाक् अनृतादि दोषसे रहित और शुद्ध होती है, जिस दैवी वाणीसे वह अपने या दूसरेके लिये जो-

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७७

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७७


| तत्तद् भवति, अमोघा अप्रतिबद्धा अस्य वाग्भवतीत्यर्थः ॥ १८ ॥ | जो कहता है वही-वही हो जाता है। अर्थात् इसकी वाणी अमोघ—प्रतिबन्धरहित हो जाती है ॥ १८ ॥ |

| तथा— | तथा— |

दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति तद्वै दैवं मनो येनानन्द्येव भवत्यथो न शोचति ॥ १६ ॥

द्युलोक और आदित्यसे इसमें दैव मनका आवेश हो जाता है। दैव मन वही है, जिससे यह आनन्दी ही होता है, कभी शोक नहीं करता ॥ १६ ॥

| दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति—तच्च दैवं मनः; स्वभावनिर्मलत्वात्; येन मनसा असौ आनन्द्येव भवति सुख्येव भवति; अथो अपि न शोचति, शोकादिनिमित्तासंयोगात् ॥ १९ ॥ | द्युलोक और आदित्यसे इसमें दैव मन आविष्ट हो जाता है। स्वभावसे ही निर्मल होनेके कारण दैव मन वही है, जिस मनसे यह आनन्दी—सुखी ही होता है और शोकादिके कारणोंका संयोग न होनेसे कभी शोक नहीं करता ॥ १६ ॥ |


| तथा— | तथा— |

अद्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति स वै देवः प्राणो यः सञ्चरँश्चासञ्चरँश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति। स एवंवित्सर्वेषां भूतानामात्मा भवति, यथैषा देवतैवँ स यथैतां देवताँ सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवँ हैवंविदँ सर्वाणि भूतान्यवन्ति। यदु किञ्चेमाः प्रजाः

३७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३७८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

शोचन्त्यमेवासां तद्भवति पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान्पापं गच्छति ॥ २० ॥

जल और चन्द्रमासे इसमें दैव प्राणका आवेश हो जाता है। दैव प्राण वही है जो सञ्चार करते और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न नष्ट ही होता है। वह इस प्रकार जानने-वाला समस्त भूतोंका आत्मा हो जाता है जैसा यह देवता (हिरण्यगर्भ) है, वैसा ही वह हो जाता है। जिस प्रकार समस्त प्राणी इस देवताका पालन करते हैं, उसी प्रकार ऐसी उपासना करनेवालेका समस्त भूत पालन करते हैं। जो कुछ ये प्रजाएँ शोक करती हैं, वह (शोकादिजनित दुःख) उन्हींके साथ रहता है। इसे तो पुण्य ही प्राप्त होता है, क्योंकि देवताओंके पास पाप नहीं जाता ॥ २० ॥

| अद्भ्यश्चैनं चन्द्रममश्च दैवः प्राण आविशति। स वै दैवः प्राणः किंलक्षणः? इत्युच्यते—यः सञ्चरन् प्राणिभेदेषु सञ्चरन्समष्टिव्यष्टि-रूपेण—अथवा सञ्चरन् जङ्गमेषु असञ्चरन्स्थावरेषु, न व्यथते न दुःखनिमित्तेन भयेन युज्यते। अथो अपि न रिष्यति न विनश्यति न हिंसामापद्यते।<br><br>सः—यो यथोक्तमेवं वेत्ति त्र्यन्नात्मदर्शनं सः—सर्वेषां भूतानामात्मा भवति, सर्वेषां भूतानां प्राणो भवति, सर्वेषां भूतानां मनो | जल और चन्द्रमासे इसमें दैव प्राण आविष्ट हो जाता है। वह दैव प्राण किन लक्षणोंवाला है? सो बतलाया जाता है—जो समष्टि और व्यष्टिरूपसे प्राणियोंमें सञ्चार करता हुआ और सञ्चार न करता हुआ अथवा जङ्गमोमें सञ्चार करता हुआ और स्थावरोंमें सञ्चार न करता हुआ, व्यथित यानी दुःख-निमित्तक भयसे युक्त नहीं होता और न रिष—विनाश अर्थात् हिंसाको ही प्राप्त होता है।<br><br>जो इस उपर्युक्त त्र्यन्नात्मदर्शनको जानता है, वह समस्त भूतोंका आत्मा हो जाता है, समस्त भूतोंका प्राण हो जाता है, समस्त भूतोंका मन हो |

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७९

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७९

संस्कृत भाष्यार्थहिन्दी अनुवाद
भवति, सर्वेषां भूतानां वाग्भवति—इत्येवं सर्वभूतात्मतया सर्वज्ञो भवतीत्यर्थः; सर्वकृच्च। यथैषा पूर्वसिद्धा हिरण्यगर्भदेवता एवमेव नास्य सर्वज्ञत्वे सर्वकृत्त्वे वा क्वचित्प्रतिघातः। स इति दाष्ट्रान्तिकनिर्देशः। किञ्च यथैतां हिरण्यगर्भदेवतामिज्यादिभिः सर्वाणि भूतान्यवन्ति पालयन्ति पूजयन्ति, एवं ह एवंविदं सर्वाणि भूतान्यवन्ति—इज्यादिलक्षणां पूजां सततं प्रयुञ्जत इत्यर्थः।जाता है और समस्त भूतोंकी वाक् हो जाता है। तात्पर्य यह है कि इस प्रकार सर्वभूतात्मरूपसे वह सर्वज्ञ हो जाता है तथा सर्वकर्ता भी हो जाता है। जैसा कि यह पूर्वसिद्ध हिरण्यगर्भ देवता है, उसी प्रकार इसके सर्वज्ञत्व और सर्वकर्तृत्त्वमें भी कभी प्रतिघात नहीं होता। ‘सः’ इस शब्दसे दाष्ट्रान्तिकका निर्देश किया गया है। तथा जिस प्रकार इस हिरण्यगर्भ-देवताका समस्त प्राणी यज्ञादिसे पालन—पूजन करते हैं, उसी प्रकार ऐसी उपासना करने वालेका समस्त प्राणी पालन करते हैं अर्थात् उसके लिये निरन्तर यज्ञादि पूजाका प्रयोग करते हैं।
अथेद्माशङ्क्यते—सर्वप्राणिनामात्मा भवतीत्युक्तम्, तस्य च सर्वप्राणिकार्यकरणात्मत्वे सर्वप्राणिसुखदुःखैः सम्बन्ध्येतेति।यहाँ यह शङ्का की जाती है—ऊपर यह बतलाया गया है कि वह समस्त प्राणियोंका आत्मा हो जाता है। इस प्रकार समस्त प्राणियोंके देह और इन्द्रियरूप हो जानेसे तो उसका सब प्राणियोंके सुख-दुःखसे भी सम्बन्ध होगा ही।
तन्न, अपरिच्छिन्नबुद्धित्वात्किन्तु ऐसी बात नहीं है, क्यों-
परिच्छिन्नात्मबुद्धीनां ह्याक्रोशादौ दुःखसम्बन्धो दृष्टः—अनेनाहमा-कि वह अपरिच्छिन्न बुद्धिवाला हो जाता है। जिनकी परिच्छिन्नात्मबुद्धि होती है, उन्हींको गाली आदि देनेपर यह सोचकर कि इसने मुझे गाली दी है, दुःखका सम्बन्ध होता देखा गया है।

३८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

३८०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
क्रुष्ट इति। अस्य तु सर्वात्मनो य आक्रुश्यते यश्चाक्रोशति तयोरात्मत्वबुद्धिविशेषाभावान्न तन्निमित्तं दुःखमुपपद्यते। मरणदुःखवच्च निमित्ताभावात् यथा हि कस्मिंश्चिन्मृते कस्यचिद् दुःखमुत्पद्यते—ममासौ पुत्रो भ्राता चेति, पुत्रादिनिमित्तम्; तन्निमित्ताभावे तन्मरणदर्शिनोऽपि नैव दुःखमुपजायते, तथेश्वरस्याप्यपरिच्छिन्नात्मनो ममत्वतादिदुःखनिमित्तमिथ्याज्ञानादिदोषाभावान्नैव दुःखमुपजायते।इस सर्वात्माको तो, जिसे गाली दी जाती है और जो गाली देता है, उन दोनोंके प्रति आत्मत्वबुद्धिमें कोई भेद न होनेके कारण उसे तज्जनित दुःख होना सम्भव ही नहीं है। जिस प्रकार कि कोई निमित्त न होनेसे मरण-दुःख भी नहीं होता। जैसे [लोकमें] किसीके मर जानेसे किसीको 'यह मेरा पुत्र है, यह मेरा भाई है' ऐसा सोचकर पुत्रादिके कारण दुःख उत्पन्न होता है तथा वैसा निमित्त न होनेपर उसकी मृत्युको देखनेवालेको भी दुःख नहीं होता उसी प्रकार मेरे-तेरेपन आदि दुःखके निमित्त और मिथ्या ज्ञानादि दोषका अभाव होनेके कारण अपरिच्छिन्नरूप ईश्वरको भी दुःख नहीं होता।
तदेतदुच्यते—यदु किञ्च यत् किञ्च इमाः प्रजाः शोचन्त्यमैव सहैव प्रजाभिस्तच्छोकादिनिमित्तं दुःखं संयुक्तं भवत्यासां प्रजानां परिच्छिन्नबुद्धिजनितत्वात्। सर्वात्मनस्तु केन सह किं संयुक्तं भवेद्वियुक्तं वा? अमुं तु प्राजापत्ये पदे वर्तमानं पुण्यमेव शुभमेव—इसीसे यह कहा जाता है—जो कुछ भी ये प्रजाएँ शोक करती हैं, वह शोकादिजनित दुःख उन प्रजाओंके साथ ही संयुक्त रहता है, क्योंकि वह इन प्रजाओंकी परिच्छिन्न बुद्धिसे पैदा होता है। किंतु जो सर्वात्मा है, उसके लिये वह किसके साथ संयुक्त या वियुक्त होगा? इस प्राजापत्यपदपर वर्तमान विद्वान्‌को तो पुण्य ही प्राप्त होता है। यहाँ शुभ

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८१

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८१

फलमभिप्रेतं पुण्यमिति—निरतिशयं हि तेन पुण्यं कृतम्; तेन तत्फलमेव गच्छति । न ह वै देवान्पापं गच्छति, पापफलस्यावसस्राभावात्—पापफलं दुःखं न गच्छतीत्यर्थः ॥ २० ॥कर्मका फल ही पुण्यरूपसे अभिप्रेत है । उसने अत्यन्त पुण्य किया होता है, इसलिये उसे उसीका फल प्राप्त होता है । पापफलका अवसर न होनेके कारण देवताओंके पास पाप नहीं जाता अर्थात् उन्हें पापका फल-रूप दुःख प्राप्त नहीं होता ॥ २० ॥

व्रतमीमांसा ॰ ॰ ॰ अध्यात्मप्राणदर्शन

‘त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः’ इत्यविशेषेण वाङ्मनःप्राणानामुपासनमुक्तम्, नान्यतमगतो विशेष उक्तः । किमेवमेव प्रतिपत्तव्यम् ? किं वा विचार्यमाणे कश्चिद्विशेषो व्रतमुपासनं प्रति प्रतिपत्तुं शक्यते? इत्युच्यते—‘वे ये सभी समान हैं और सभी अनन्त हैं’ इस मन्त्रमें वाक्, मन और प्राणकी उपासना सामान्यरूपसे बतायी गयी है । उनमेंसे एक-एककी कोई विशेषता नहीं बतलायी गयी । सो क्या ऐसा ही समझना चाहिये ? अथवा विचार करनेपर व्रत—उपासनाके विषयमें उनमें परस्पर कोई विशेषता जानी जा सकती है ? यही अब बतलाया जाता है—

अथातो व्रतमीमाꣳसा प्रजापतिर्ह कर्माणि ससृजे तानि सृष्टान्यन्योन्येनास्पर्धन्त वदिष्याम्येवाहमिति वाग्दध्रे द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रमेवमन्यानि कर्माणि यथाकर्म तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे तान्याप्नोत्तान्याप्त्वा मृत्युरवारुन्ध तस्माच्छ्राम्यत्येव वाक्छ्राम्यति चक्षुः श्राम्यति श्रोत्रमथेममेव नाप्नो-

३८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

द्योऽयं मध्यमः प्राणस्तानि ज्ञातुं दधिरे । अयं वै नःश्रेष्ठो यः सञ्चरँश्चासञ्चरँश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति हन्तास्यैव सर्वे रूपमसामेति त एतस्यैव सर्वे रूपमभवँस्तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा इति तेन ह वाव तत्कुलमाचक्षते यस्मिन्कुले भवति य एवं वेद य उ हैवंविदा स्पर्धतेऽनुशुष्यत्यनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम् ॥ २१ ॥

अब यहाँसे व्रतका विचार किया जाता है। प्रजापतिने कर्मों (कर्मके साधनभूत वागादि करणों) की रचना की। रचे जानेपर वे एक दूसरेसे स्पर्धा करने लगे। वाक्ने व्रत किया कि 'मैं बोलती ही रहूँगी' तथा 'मैं देखता ही रहूँगा' ऐसा नेत्रने और 'मैं सुनता ही रहूँगा' ऐसा श्रोत्रने व्रत किया। इसी प्रकार अपने-अपने कर्मके अनुसार अन्य इन्द्रियोंने भी व्रत किया तब मृत्युने श्रम होकर उनसे सम्बन्ध किया और उनमें व्याप्त हो गया। उनमें व्याप्त होकर मृत्युने उनका अवरोध किया, इसीसे वाक् श्रमित होती ही है, नेत्र श्रमित होता ही है, श्रोत्र श्रमित होता ही है। किंतु यह जो मध्यम प्राण है, इसीमें वह व्याप्त न हो सका। तब उन इन्द्रियोंने उसे जाननेका निश्चय किया। निश्चय यही हममें श्रेष्ठ है, जो सञ्चार करते और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न क्षीण ही होता है। अच्छा, हम सब भी इसीके रूप हो जायँ—ऐसा निश्चय कर वे सब इसीके रूप हो गयीं। अतः वे इसीके नामसे 'प्राण' इस प्रकार कही जाती हैं, इसीसे जो ऐसा जानता है, वह जिस कुलमें होता है, वह कुल उसीके नामसे बोला जाता है तथा जो ऐसे विद्वान्से स्पर्धा करता है, वह सूख जाता है और सूखकर अन्तमें मर जाता है। यह अध्यात्मप्राणदर्शन है ॥ २१ ॥

अथातोऽनन्तरं व्रतमीमांसा उपासनकर्मविचारणेत्यर्थः। एषां प्राणानां कस्य कर्म व्रतत्वेनअब यहाँसे आगे व्रतमीमांसा अर्थात् उपासना-कर्मका विचार किया जाता है। यानी इन प्राणोंमेंसे किस

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३८३

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३८३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
धारयितव्यमिति मीमांसा प्रवर्तते। तत्र प्रजापतिर्ह–हशब्दः किलार्थे–प्रजापतिः किल प्रजाः सृष्ट्वा कर्माणि करणानि वागादीनि–कर्मार्थानि हि तानीति कर्माणीत्युच्यन्ते–ससृजे सृष्टवान्वागादीनि करणानीत्यर्थः।प्राणके कर्मको व्रतरूपसे धारण करना चाहिये? इस बातका विचार आरम्भ होता है। वहाँ प्रजापतिने प्रजाकी रचना कर कर्मोंकी अर्थात् वागादि करणोंकी रचना की—यह प्रसिद्ध है। यहाँ ‘ह’ शब्द ‘किल’ यानी प्रसिद्धिके अर्थमें है। कर्मके साधन होनेके कारण उन्हें (वागादि-करणोंको) ‘कर्म’ कहा गया है।
तानि पुनः सृष्टान्यन्योन्येन इतरेतरमस्पर्धन्त स्पर्धां संघर्षं चक्रुः। कथम्? वदिष्याम्येव स्वव्यापाराद्वदनादनुपरतैवाहं स्यामिति वाग्व्रतं दध्रे धृतवती–यद्यन्योऽपि मत्समोऽस्ति स्वव्यापारादनुपरन्तुं शक्तः, सोऽपि दर्शयत्वात्मनो वीर्यमिति। तथा द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः, श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रम्; एवमन्यानि कर्माणि करणानि यथाकर्म–यद्यस्य कर्म यथाकर्म।उन रची हुई इन्द्रियोंने एक दूसरीसे स्पर्धा की—परस्पर संघर्ष किया। किस प्रकार स्पर्धा की? ‘मैं बोलती ही रहूँगी अर्थात् अपने भाषणरूप व्यापारसे निवृत्त होऊँगी ही नहीं’ ऐसा व्रत वाक्ने धारण किया; इससे उसका यह अभिप्राय था कि यदि मेरे समान कोई और भी अपने व्यापारसे अलग न रहनेमें समर्थ हो तो वह भी अपना पुरुषार्थ दिखलावे। तथा ‘मैं देखता ही रहूँगा’ ऐसा चक्षुने और ‘मैं सुनता ही रहूँगा’ ऐसा श्रोत्रने निश्चय किया। इसी प्रकार अन्य इन्द्रियोंने भी यथाकर्म—जिनका जो कर्म था उसके अनुसार व्रत धारण किया।
तानि करणानि मृत्युर्मारकः श्रमः श्रमरूपी भूत्वा उपयेमे सञ्जग्राह। कथम्? तानि कर-उन इन्द्रियोंको मृत्यु यानी मारकने श्रम—श्रमरूपी होकर पकड़ा। किस प्रकार पकड़ा? उसने अपने-

३८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३८४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
णानि स्वव्यापारे प्रवृत्तान्याप्नोत्, श्रमरूपेणात्मानं दर्शितवान्। आप्त्वा च तान्यवारुन्ध अवरोधं कृतवान्मृत्युः—स्वकर्मभ्यः प्रच्यावितवानित्यर्थः। तस्मादद्यत्वेऽपि वदने स्वकर्मणि प्रवृत्ता वाक् श्राम्यत्येव श्रमरूपिणा मृत्युना संयुक्ता स्वकर्मतः प्रच्यवते। तथा श्राम्यति चक्षुः, श्राम्यति श्रोत्रम्।अपने व्यापारमें लगी हुई उन इन्द्रियोंको व्याप्त किया; अर्थात् श्रम (थकावट) रूपसे अपनेको दिखलाया। तथा उन्हें व्याप्त करके मृत्युने उनका अवरोध किया—अपने-अपने कर्मोंसे च्युत कर दिया। इसलिये आजकल भी अपने व्यापार—भाषणमें प्रवृत्त हुई वाक् श्रमित होती ही है—श्रमरूप मृत्युसे संयुक्त होनेके कारण वह अपने कर्मसे च्युत हो जाती है। इसी प्रकार नेत्रेन्द्रिय भी श्रमित होती है तथा श्रोत्रेन्द्रिय भी श्रमित होती है।
अथेममेव मुख्यं प्राणं नाप्नोन्न प्राप्तवान्मृत्युः श्रमरुपी, योऽयं मध्यमः प्राणस्तम्। तेनाद्यत्वेऽप्यश्रान्त एव स्वकर्मणि प्रवर्तते। तानीतराणि करणानि तं ज्ञातुं दधिरे धृतवन्ति मनः।किंतु इस मुख्य प्राणको—जो यह मध्यम प्राण है, उसको ही श्रमरूपी मृत्युने व्याप्त नहीं किया, वह उसके पासतक नहीं पहुँचा। इसलिये इस समय भी वह श्रमरहित होकर ही अपने कर्ममें प्रवृत्त रहता है। उन अन्य इन्द्रियोंने उसे जाननेके लिये मनमें निश्चय किया।
अयं वै नोऽस्माकं मध्ये श्रेष्ठः प्रशस्यतमोऽभ्यधिकः, यस्माद्यः सञ्चरंश्चासञ्चरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति—हन्तेदानीमस्यैव प्राणस्य सर्वे वयं रूपमसाम प्राणमात्मत्वेन प्रतिपद्येमहि—एवं'निश्चय हम सबमें यही श्रेष्ठ अर्थात् सबसे अधिक प्रशंसनीय है, क्योंकि यह सञ्चार करते हुए और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न हिंसित ही होता है। अच्छा, अब हम सब भी इस प्राणके ही रूप हो जायँ अर्थात् प्राणको आत्मभावसे प्राप्त हो जायँ'—ऐसा

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३८५

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३८५


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
विनिश्चित्य ते एतस्यैव रूपमभवन्; प्राणरूपमेवात्मत्वेन प्रतिपन्नाः, प्राणव्रतमेव दधिरे—अस्मद्व्रतानि न मृत्योर्वारणाय पर्याप्तानीति ।निश्चय कर वे सब इस प्राणका ही स्वरूप हो गयीं—आत्मभावसे प्राणरूपको ही प्राप्त हो गयीं अर्थात् यह सोचकर कि हमारे व्रत मृत्युको हटानेमें समर्थ नहीं हैं, उन्होंने प्राणका ही व्रत धारण कर लिया ।
यस्मात्प्राणेन रूपेण रूपवन्तीतराणि करणानि चलनात्मना स्वेन च प्रकाशात्मना; न हि प्राणादन्यत्र चलनात्मकत्वोपपत्तिः; चलनव्यापारपूर्वकाण्येव हि सर्वदा स्वव्यापारेषु लक्ष्यन्ते; तस्मादेते वागादय एतेन प्राणाभिधानेन आख्यायन्तेऽभिधीयन्ते प्राणा इत्येवम् ।क्योंकि अन्य इन्द्रियाँ प्राणके चलनात्मक रूपसे और अपने प्रकाशात्मक रूपसे ही रूपवती हैं; कारण प्राणके सिवा किसी अन्य इन्द्रियमें चलनात्मकत्वकी उपपत्ति नहीं हो सकती और ये सर्वदा चलनव्यापारपूर्वक ही अपने व्यापारोंमें प्रवृत्त होती दिखायी देती हैं; इसलिये ये वागादि इन्द्रियाँ इस प्राणके नामसे ही ‘प्राण’ इस प्रकार कहकर पुकारी जाती हैं।
य एवं प्राणात्मतां सर्वकरणानां वेत्ति प्राणशब्दाभिधेयत्वं च, तेन ह वाव तेनैव विदुषा तत्कुलमाचक्षते लौकिकाः। यस्मिन्कुले स विद्वाञ्जातो भवति तत्कुलं विद्वन्नाम्नैव प्रथितं भवत्यमुष्येदं कुलमिति, यथा ताप्त्य इति ।जो इस प्रकार समस्त इन्द्रियोंकी प्राणरूपता और ‘प्राण’ शब्दद्वारा पुकारा जाना जानता है, उसीसे अर्थात् उस विद्वान्‌के द्वारा ही लौकिक पुरुष उसके कुलको पुकारते हैं। अर्थात् वह विद्वान् जिस कुलमें उत्पन्न होता है वह कुल उस विद्वान्‌के नामसे ही प्रसिद्ध होता है कि यह कुल अमुकका है, जैसे तांप्त्य । जो इस प्रकार

१. तपती सूर्यदेवकी कन्या थी; वह चन्द्रवंशी राजा संवरणको विवाही गयी थी । उसका वंश उसके नामानुसार ‘ताप्त्य’ कहलाया ।

बृ० उ० २५—

३८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

३८६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| य एवं यथोक्तं वेद वागादीनां प्राणरूपतां प्राणाख्यत्वं च तस्यैतत्फलम् ।<br><br>किञ्च यः कश्चिदु हैवंविदा प्राणात्मदर्शिना स्पर्धते तत्प्रतिपक्षी सन्, सोऽस्मिन्नेव शरीरेऽनुशुष्यति शोषमुपगच्छति । अनुशुष्य हैव शोषं गत्वैव अन्ततोऽन्ते म्रियते न सहसानुपद्रुतो म्रियते इत्येवमुक्तमध्यात्मं प्राणात्मदर्शनमित्युक्तोपसंहारोऽधिदैवतप्रदर्शनार्थः । | उपर्युक्त वागादिकी प्राणरूपता और प्राणसंज्ञकताको जानता है, उसे यह फल प्राप्त होता है।<br><br>तथा जो कोई भी इस प्रकार जाननेवाले प्राणात्मदर्शीसे उसका प्रतिपक्षी होकर स्पर्धा करता है वह इसी शरीरमें 'अनुशुष्यति'—सूख जाता है। और सूखकर—शोषको प्राप्त होकर ही अन्तमें मर जाता है। वह बिना किसी उपद्रवके सहसा नहीं मरता। इस प्रकार यह अध्यात्मप्राणात्मदर्शन कहा—यह श्रुत्युक्त उपसंहार आगे आधिदैविक दर्शनको प्रदर्शित करनेके लिये है ॥ २१ ॥ |

अधिदैवदर्शन

अथाधिदैवतं ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दध्रे तप्स्याम्यहमित्यादित्यो भास्याम्यहमिति चन्द्रमा एवमन्या देवता यथा दैवतँ स यथैषां प्राणानां मध्यमः प्राण एवमेतासां देवतानां वायुम्लोंचन्ति ह्यन्या देवता न वायुः सैषानस्तमिता देवता यद्वायुः ॥ २२ ॥

अब अधिदैवदर्शन कहा जाता है—अग्निने व्रत किया कि 'मैं जलता ही रहूँगा', सूर्यने नियम किया, 'मैं तपता ही रहूँगा' तथा चन्द्रमाने निश्चय किया, 'मैं प्रकाशित ही होता रहूँगा।' इसी प्रकार अन्य देवताओंने भी यथादैवत (जिस देवताका जो व्यापार था, उसीके अनुसार) व्रत किया। जिस प्रकार इन वागादि प्राणोंमें मध्यम प्राण है, उसी प्रकार इन देवताओंमें वायु है, क्योंकि अन्य देवगण तो अस्त हो जाते हैं; किंतु वायु अस्त नहीं होता। यह जो वायु है, अस्त न होनेवाला देवता है ॥२२॥

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ३८७ |

ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थे३८७
संस्कृत भाष्यहिन्दी भाष्यार्थ
अथानन्तरं अधिदैवतं देवताविषयं दर्शनमुच्यते। कस्य देवताविशेषस्य व्रतधारणं श्रेयः? इति मीमांस्यते। अध्यात्मवत्सर्वम्। ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दध्रे। तप्स्याम्यहमित्यादित्यः; भास्याम्यहमिति चन्द्रमाः; एवमन्या देवता यथादैवतम्।अब आगे अधिदैवत—देवताविषयक दर्शन कहा जाता है। अर्थात् इस बातका विचार किया जाता है कि किस देवताविशेषका व्रत धारण करना श्रेष्ठ है। अध्यात्मदर्शनके समान यहाँ भी सब प्रसङ्ग समझना चाहिये। 'मैं जलता ही रहूँगा' ऐसा अग्निने व्रत धारण किया। 'मैं तपता ही रहूँगा' ऐसा आदित्यने और 'मैं प्रकाशित ही होता रहूँगा' ऐसा चन्द्रमाने नियम कर लिया। इसी प्रकार यथादैवत अन्य देवताओोंने भी व्रत धारण किया।
सोऽध्यात्मं वागादीनामेषां प्राणानां मध्ये मध्यमः प्राणो मृत्युना अनाप्तः स्वकर्मणो न प्रच्युतः स्वेन प्राणव्रतेनाभग्नव्रतो यथा; एवमेतासामग्न्यादीनां देवतानां वायुरपि। म्लोचन्त्यस्तं यन्ति स्वकर्मभ्य उपरमन्ते—यथाध्यात्मं वागादयोऽन्या देवता अग्न्याद्याः, न वायुरस्तं याति-यथा मध्यमः प्राणः; अतः सैषा अनस्तमिता देवता यद्वायुर्योऽयं वायुः। एवमध्यात्ममधिदैवं च मीमांसित्वा निर्धारितम्—उन वागादि अध्यात्म प्राणोंमें जैसे मध्यम प्राण मृत्युसे ग्रस्त नहीं हुआ, अपने कर्मसे च्युत नहीं किया गया, अपने प्राणव्रत [के पालन] से उसका व्रत भंग नहीं हुआ; उसी प्रकार इन अग्नि आदि देवताओंमें वायु रहा, क्योंकि वागादि अध्यात्म प्राणोंके समान अग्नि आदि अन्य देवगण अस्त होते अर्थात् अपने कर्मोंसे निवृत्त होते हैं, किंतु वायु अस्त नहीं होता, जैसे मध्यम प्राण; अतः यह जो वायु है वह अनस्तमित (कभी अस्त न होनेवाला) देवता है। इस प्रकार अध्यात्म और अधिदैवसम्बन्धी विचार करके यह निश्चय किया गया है कि

३८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३८८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| प्राणवाग्वात्मनोव्रतमभग्नमिति २२ | प्राणरूप और वायुरूप हुए उपासकोंका व्रत अभग्न रहता है ॥ २२ ॥ |

प्राणव्रतकी स्तुतिमें मन्त्र

अथैष श्लोको भवति यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छतीति प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति तं देवाश्चक्रिरे धर्मँ॒ स एवाद्य स उ श्व इति यद्वा एतेऽमुर्ह्यध्रियन्त तदेवाप्यद्य कुर्वन्ति । तस्मादेकमेव व्रतं चरेत्प्राण्याच्चैवापान्याच्च नेन्मा पाप्मा मृत्युराप्नुवदिति यद्यु॑ चरेत्समापिपयिषेत्तेनो एतस्यै देवतायै सायुज्यँ॒ सलोकतां जयति ॥ २३ ॥

इसी अर्थका प्रतिपादक यह मन्त्र है—'जिस ( वायुदेवता ) से सूर्य उदय होता है और जिसमें वह अस्त होता है' इत्यादि । यह प्राणसे ही उदित होता है और प्राणमें ही अस्त हो जाता है । उस धर्मको देवताओंने किया है । वही आज है और वही कल भी रहेगा । देवताओंने जो व्रत उस समय धारण किया था वही आज भी करते हैं । अतः एक ही व्रतका आचरण करे । प्राण और अपानव्यापार करे । मुझे कहीं पापी मृत्यु व्याप्त न कर ले—इस भयसे [ इस व्रतका आचरण करे ] । और यदि इसका आचरण करे तो इसे समाप्त करनेकी भी इच्छा रखे । इससे वह इस देवतासे सायुज्य और सालोक्य प्राप्त करता है ॥ २३ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अथैतस्यैवार्थस्य प्रकाशक एष श्लोको मन्त्रो भवति । यतश्च यस्माद्वायोरुदेत्युद्गच्छति सूर्यः, अध्यात्मं च चक्षुरात्मना प्राणाद् अस्तं च यत्र वायौ प्राणे च गच्छत्यपरसंध्यासमये स्वापसमये चइसी अर्थका प्रकाशक यह श्लोक यानी मन्त्र है—जहाँसे अर्थात् जिस वायुसे सूर्य उदित होता है तथा अध्यात्मपक्षमें जिस प्राणसे वह चक्षुरूपसे उदित होता है और जहाँ—वायु और प्राणमें सायंकाल एवं पुरुषकी सुषुप्तिके समय वह अस्त हो

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३८९

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३८९


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पुरुषस्य, तं देवा॑स्तं धर्मं देवाश्च-जाता है, उस धर्मको देवताओंने किया—धारण किया; अर्थात्
क्रिरे धृतवन्तो वागादयोऽग्न्या-वागादि इन्द्रियोंने और अग्न्यादि
दयश्च प्राणव्रतं वायुव्रतं च पुरादेवताओंने पूर्वकालमें विचार कर क्रमशः प्राणव्रत और वायुव्रत धारण
विचार्य । स एवाद्येदानीं श्वोऽपिकिया। वही आज इस समय अनु-
भविष्यत्यपि कालेऽनुवर्त्यतेऽनु-वर्तित होता है और कल-भविष्य-कालमें भी देवताओंद्वारा उसीका
वर्तिष्यते च देवैरित्यभिप्रायः ।अनुवर्तन किया जायगा—ऐसा इसका अभिप्राय है।
तत्रैमं मन्त्रं संक्षेपतो व्याचष्टयहाँ ब्राह्मण संक्षेपसे इस मन्त्र-की व्याख्या करता है—प्राणसे ही
ब्राह्मणम्—प्राणाद्वा एष सूर्ययह सूर्य उदित होता है—और
उदेति प्राणेऽस्तमेति । तं देवाश्च-प्राणमें ही अस्त हो जाता है। 'तं देवाश्चक्रिरे धर्मं स एवाद्य स उ श्वः'
क्रिरे धर्मं स एवाद्य स उ श्वइस उत्तरार्धका क्या अर्थ है ? सो
इत्यस्य कोऽर्थः ? इत्युच्यते-यद्वैबतलाया जाता है—इन वागादि
एते व्रतमकुर्हि अमुष्मिन्कालेऔर अग्न्यादिने उस समय क्रमशः जिन प्राणव्रत और वायुव्रतको धारण
वागादयोऽग्न्यादयश्च प्राणव्रतंकिया था उन्हींको वे आज भी करते
वायुव्रतं वाध्रियन्त, तदेवाद्यापिहैं, उसीका अनुवर्तन वे करते हैं और उसीका अनुवर्तन करेंगे। उनके
कुर्वन्त्यनुवर्तन्तेऽनुवर्तिष्यन्ते च।द्वारा यह व्रत अखण्डित ही है। किन्तु
व्रतं तैरभग्नमेव । यत्तु वागादि-जो वागादि और अग्न्यादिका व्रत
व्रतमग्न्यादिव्रतं च तद्भग्नमेव,है वह तो खण्डित ही है, क्योंकि सायंकाल और सुषुप्तिके समय
तेषामस्तमनकाले स्वापकाले चउनका क्रमशः वायु और प्राणमें
वायौ प्राणे च निम्लुक्तिदर्शनात् ।अस्त होना देखा जाता है।

३९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३९०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| अथैतदन्यत्रोक्तम्—“यदा वै पुरुषः स्वपिति प्राणं तर्हि वागप्येति प्राणं मनः प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं यदा प्रबुध्यते प्राणादेवाधि पुनर्जायन्त इत्यध्यात्ममथाधिदैवतं यदा वा अग्निरनुगच्छति वायुं तर्ह्यन्वेति तस्मादेनमुदवासीदित्याहुर्वायुं ह्यन्वेति यदादित्योऽस्तमेति वायुं तर्हि प्रविशति वायुं चन्द्रमा वायौ दिशः प्रतिष्ठिता वायोरेवाधि पुनर्जायन्ते” इति। | यही बात एक अन्य स्थानपर भी कही है—“जिस समय पुरुष सोता है, उस समय वाक् प्राणमें लीन हो जाती है तथा प्राणमें ही मन, प्राणमें ही चक्षु और प्राणमें ही श्रोत्र लीन हो जाते हैं जिस समय वह उठता है उस समय प्राणसे ही ये पुनः उत्पन्न हो जाते हैं। यह अध्यात्मदृष्टि है, अब अधिदैवदृष्टि बतलायी जाती है—जब अग्नि अनुगमन करने (शान्त होने) लगता है, उस समय वह वायुके अधीन ही शान्त होता है, इसीसे ‘यह इसमें अनुगत (अस्त) हो गया’ ऐसा कहते हैं। जिस समय सूर्य अस्त होता है तो वह वायुमें ही अनुगमन—प्रवेश कर जाता है; तथा वायुमें ही चन्द्रमा और वायुमें ही दिशाएँ प्रतिष्ठित होती हैं एवं वायुसे ही वे पुनः उत्पन्न होती हैं” इत्यादि। | | यस्माद् एतदेव व्रतं वागादिष्वग्न्यादिषु चानुगतं यदेतद्वायोश्च प्राणस्य च परिस्पन्दात्मकत्वं सर्वैर्देवैरनुवर्त्यमानं व्रतम्-तस्मादन्योऽप्येकमेव व्रतं चरेत्। किं तत्? प्राण्यात्प्राणनव्यापारं कुर्यादपान्यादपाननव्यापारं च; | क्योंकि वागादि और अग्न्यादिमें यही व्रत अनुगत है, अर्थात् वायु और प्राणका जो परिस्पन्दरूप धर्म है, वही समस्त देवताओंद्वारा अनुवर्तित होनेवाला व्रत है, इसलिये अन्य किसीको भी एक ही व्रतका आचरण करना चाहिये। वह एक व्रत क्या है? ‘प्राण्यात्’—प्राणनव्यापार करे और ‘अपान्यात्’—अपानन व्यापार |

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९१

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९१


संस्कृतहिन्दी
न हि प्राणापानव्यापारस्य प्राणनापाननलक्षणस्योपरमोऽस्ति । तस्मात्तदेवैकं व्रतं चरेद्धित्वेन्द्रियान्तरव्यापारं नेन्मा मां पाप्मा मृत्युः श्रमरूप्याप्नुवदाप्नुयात् । नेच्छब्दः परिभये--'यद्यहमस्माद् व्रतात्प्रच्युतः स्याम्, ग्रस्त एवाहं मृत्युना' इत्येवं त्रस्तो धारयेत्प्राणव्रतमित्यभिप्रायः ।करे, क्योंकि प्राण और अपानके व्यापार प्राणन और अपाननकी कभी निवृत्ति नहीं होती । अतः इस भयसे कि मुझे कहीं श्रमरूपी पापात्मा मृत्यु व्याप्त न कर ले, अन्य इन्द्रियोंके व्यापारको छोड़कर एक इसी व्रतका आचरण करे । यहाँ 'नेत्' शब्द परिभयके अर्थमें है । अभिप्राय यह है कि 'यदि मैं इस व्रतसे च्युत हो जाऊँगा तो अवश्य मृत्युसे ग्रस्त हो जाऊँगा' इस प्रकार डरता हुआ प्राणव्रतको धारण करे ।
यदि कदाचिद् उ चरेत्प्रारभेत प्राणव्रतम्, समापिपयिषेत्समापयितुमिच्छेत्;यदि ह्यस्माद् व्रतादुपरमेत्प्राणः परिभूतः स्याद्देवाश्च; तस्मात्समापयेदेव । तेन उ तेनानेन व्रतेन प्राणात्मप्रतिपत्त्या सर्वभूतेषु—वागादयोऽग्न्यादयश्च मदात्मका एव, अहं प्राण आत्मा सर्वपरिस्पन्दकृत्—एवं तेनानेन व्रतधारणेन एतस्या एव प्राणदेवतायाः सायुज्यं सयुग्भावमेकात्मत्वं सलोकतां समानलोकतां वा एकस्थानत्वम्—विज्ञान-यदि कभी प्राणव्रतका आचरण-आरम्भ करे तो उसे समाप्त करनेकी इच्छा रखे, क्योंकि यदि इस व्रतसे [ बीचमें ही ] हट जायगा तो प्राण और देवताओंका पराभव होगा; इसलिये इसे समाप्त करना ही चाहिये । 'तेन उ' अर्थात् उस इस प्राणात्मत्वकी प्राप्तिरूप व्रतसे समस्त भूतोंमें वागादि और अग्न्यादि मेरे ही स्वरूप हैं, मैं प्राणरूप आत्मा सबका परिस्पन्दन करनेवाला हूँ' इस प्रकार उस इस व्रतको धारण करनेसे इस प्राणदेवताके ही सायुज्य—संयोग अर्थात् एकरूपताको तथा विज्ञानकी मन्दताकी अपेक्षासे सलोकता—समानलोकता अर्थात् समानस्थानत्वको

३९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३९२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| मान्द्यापेक्षमेतत्—जयति प्राप्नोतीति ॥ २३ ॥ | जीतता अर्थात् उसे प्राप्त कर लेता है ॥ २३ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये पञ्चमं सप्तान्नब्राह्मणम्॥५॥


षष्ठ ब्राह्मण

पूर्वोक्त अविद्याकार्यका उपसंहार—नामसामान्यभूता वाक्

| यदेतदविद्याविषयत्वेन प्रस्तुतं साध्यसाधनलक्षणं व्याकृतं जगत् प्राणात्मप्राप्त्यन्तोत्कर्षवदपि फलम्, या चैतस्य व्याकरणात्प्रागवस्थाऽव्याकृतशब्दवाच्या वृक्षबीजवत्सर्वमेतत्। | यह जो साध्य-साधनरूप व्याकृत जगत् और प्राणात्मप्राप्तिपर्यन्त उत्कर्षवाला उसका फल भी अविद्याके विषयरूपसे आरम्भ किया गया है तथा वृक्षके बीजके समान जो 'अव्याकृत' शब्दसे कही जानेवाली इसके व्याकरण (व्याप्त होने) से पूर्वकी अवस्था है, यह सब— |

त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म तेषां नाम्नां वागित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्ति । एतदेषाꣳ सामैतद्धि सर्वैर्नामभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि नामानि बिभर्ति ॥ १ ॥

यह नाम, रूप और कर्म तीनका समुदाय है। उन नामोंकी 'वाक्' यह उक्थ (कारण) है, क्योंकि सारे नाम इसीसे उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है। यही सब नामोंमें समान है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यह समस्त नामोंको धारण करती है ॥ १ ॥

| त्रयम्; किं तत्त्रयम्? इत्युच्यते। | त्रय है। वह त्रय क्या है? सो बतलाया जाता है—नाम, रूप और | | नाम रूपं कर्म चेत्यनात्मैव। नात्मा | कर्म-यह अनात्मा ही वह त्रय है। |

ब्राह्मण ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३९३

ब्राह्मण ६ ]शाङ्करभाष्यार्थ३९३

| यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म। तस्मादस्माद्विरज्येतेत्येवमर्थस्त्रयं वा इत्याद्यारम्भः। न ह्यस्मादनात्मनोऽव्यावृत्तचित्तस्य आत्मानमेव लोकमहं ब्रह्मास्मीत्युपासितुं बुद्धिः प्रवर्तते। बाह्यप्रत्यगात्मप्रवृत्त्योर्विरोधात्। तथा च काठके—<br>“पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्।<br>कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्” (क० उ० २।१।१) इत्यादि। | जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है वह आत्मा नहीं। अतः [मुमुक्षु] इससे विरक्त हो जाय—इसलिये 'त्रयं वा' इत्यादि मन्त्रका आरम्भ किया गया है। क्योंकि इस अनात्मासे जिसका चित्त नहीं हटा है, उसकी बुद्धि 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार आत्मलोककी ही उपासना करनेके लिये प्रवृत्त नहीं होती। कारण बाह्य प्रवृत्ति और प्रत्यगात्मविषयिणी वृत्तिमें परस्पर विरोध है। ऐसा ही कठोपनिषद्में भी कहा है—“स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है, इसलिये पुरुष बाह्य विषयोंको ही देखता है, अन्तरात्माको नहीं। अमृतत्वकी इच्छा करनेवाले किसी-किसी धीर पुरुषने ही इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर अन्तरात्माको देखा है” इत्यादि। | | कथं पुनरस्य व्याकृताव्याकृतस्य क्रियाकारकफलात्मनः संसारस्य नामरूपकर्मात्मकतैव? न पुनरात्मत्वम्? इत्येतत्सम्भावयितुं शक्यत इति; अत्रोच्यते—<br>तेषां नाम्नां यथोपन्यस्तानां वागिति शब्दसामान्यमुच्यते। | किंतु इस व्याकृत और अव्याकृत क्रिया-कारक-फलरूप संसारकी नाम-रूप-कर्मात्मकता ही क्यों है? आत्मस्वरूपता क्यों नहीं है? ऐसी सम्भावना की जा सकती है, अतः इस विषयमें कहते हैं—ऊपर जिनका उल्लेख किया गया है, उन नामोंका वाक् यह शब्दसामान्य कहा जाता |