बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 389, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 389
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३८३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| धारयितव्यमिति मीमांसा प्रवर्तते। तत्र प्रजापतिर्ह–हशब्दः किलार्थे–प्रजापतिः किल प्रजाः सृष्ट्वा कर्माणि करणानि वागादीनि–कर्मार्थानि हि तानीति कर्माणीत्युच्यन्ते–ससृजे सृष्टवान्वागादीनि करणानीत्यर्थः। | प्राणके कर्मको व्रतरूपसे धारण करना चाहिये? इस बातका विचार आरम्भ होता है। वहाँ प्रजापतिने प्रजाकी रचना कर कर्मोंकी अर्थात् वागादि करणोंकी रचना की—यह प्रसिद्ध है। यहाँ ‘ह’ शब्द ‘किल’ यानी प्रसिद्धिके अर्थमें है। कर्मके साधन होनेके कारण उन्हें (वागादि-करणोंको) ‘कर्म’ कहा गया है। |
| तानि पुनः सृष्टान्यन्योन्येन इतरेतरमस्पर्धन्त स्पर्धां संघर्षं चक्रुः। कथम्? वदिष्याम्येव स्वव्यापाराद्वदनादनुपरतैवाहं स्यामिति वाग्व्रतं दध्रे धृतवती–यद्यन्योऽपि मत्समोऽस्ति स्वव्यापारादनुपरन्तुं शक्तः, सोऽपि दर्शयत्वात्मनो वीर्यमिति। तथा द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः, श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रम्; एवमन्यानि कर्माणि करणानि यथाकर्म–यद्यस्य कर्म यथाकर्म। | उन रची हुई इन्द्रियोंने एक दूसरीसे स्पर्धा की—परस्पर संघर्ष किया। किस प्रकार स्पर्धा की? ‘मैं बोलती ही रहूँगी अर्थात् अपने भाषणरूप व्यापारसे निवृत्त होऊँगी ही नहीं’ ऐसा व्रत वाक्ने धारण किया; इससे उसका यह अभिप्राय था कि यदि मेरे समान कोई और भी अपने व्यापारसे अलग न रहनेमें समर्थ हो तो वह भी अपना पुरुषार्थ दिखलावे। तथा ‘मैं देखता ही रहूँगा’ ऐसा चक्षुने और ‘मैं सुनता ही रहूँगा’ ऐसा श्रोत्रने निश्चय किया। इसी प्रकार अन्य इन्द्रियोंने भी यथाकर्म—जिनका जो कर्म था उसके अनुसार व्रत धारण किया। |
| तानि करणानि मृत्युर्मारकः श्रमः श्रमरूपी भूत्वा उपयेमे सञ्जग्राह। कथम्? तानि कर- | उन इन्द्रियोंको मृत्यु यानी मारकने श्रम—श्रमरूपी होकर पकड़ा। किस प्रकार पकड़ा? उसने अपने- |