बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 390, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 390
| ३८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| णानि स्वव्यापारे प्रवृत्तान्याप्नोत्, श्रमरूपेणात्मानं दर्शितवान्। आप्त्वा च तान्यवारुन्ध अवरोधं कृतवान्मृत्युः—स्वकर्मभ्यः प्रच्यावितवानित्यर्थः। तस्मादद्यत्वेऽपि वदने स्वकर्मणि प्रवृत्ता वाक् श्राम्यत्येव श्रमरूपिणा मृत्युना संयुक्ता स्वकर्मतः प्रच्यवते। तथा श्राम्यति चक्षुः, श्राम्यति श्रोत्रम्। | अपने व्यापारमें लगी हुई उन इन्द्रियोंको व्याप्त किया; अर्थात् श्रम (थकावट) रूपसे अपनेको दिखलाया। तथा उन्हें व्याप्त करके मृत्युने उनका अवरोध किया—अपने-अपने कर्मोंसे च्युत कर दिया। इसलिये आजकल भी अपने व्यापार—भाषणमें प्रवृत्त हुई वाक् श्रमित होती ही है—श्रमरूप मृत्युसे संयुक्त होनेके कारण वह अपने कर्मसे च्युत हो जाती है। इसी प्रकार नेत्रेन्द्रिय भी श्रमित होती है तथा श्रोत्रेन्द्रिय भी श्रमित होती है। |
| अथेममेव मुख्यं प्राणं नाप्नोन्न प्राप्तवान्मृत्युः श्रमरुपी, योऽयं मध्यमः प्राणस्तम्। तेनाद्यत्वेऽप्यश्रान्त एव स्वकर्मणि प्रवर्तते। तानीतराणि करणानि तं ज्ञातुं दधिरे धृतवन्ति मनः। | किंतु इस मुख्य प्राणको—जो यह मध्यम प्राण है, उसको ही श्रमरूपी मृत्युने व्याप्त नहीं किया, वह उसके पासतक नहीं पहुँचा। इसलिये इस समय भी वह श्रमरहित होकर ही अपने कर्ममें प्रवृत्त रहता है। उन अन्य इन्द्रियोंने उसे जाननेके लिये मनमें निश्चय किया। |
| अयं वै नोऽस्माकं मध्ये श्रेष्ठः प्रशस्यतमोऽभ्यधिकः, यस्माद्यः सञ्चरंश्चासञ्चरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति—हन्तेदानीमस्यैव प्राणस्य सर्वे वयं रूपमसाम प्राणमात्मत्वेन प्रतिपद्येमहि—एवं | 'निश्चय हम सबमें यही श्रेष्ठ अर्थात् सबसे अधिक प्रशंसनीय है, क्योंकि यह सञ्चार करते हुए और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न हिंसित ही होता है। अच्छा, अब हम सब भी इस प्राणके ही रूप हो जायँ अर्थात् प्राणको आत्मभावसे प्राप्त हो जायँ'—ऐसा |