भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 391

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३८५


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
विनिश्चित्य ते एतस्यैव रूपमभवन्; प्राणरूपमेवात्मत्वेन प्रतिपन्नाः, प्राणव्रतमेव दधिरे—अस्मद्व्रतानि न मृत्योर्वारणाय पर्याप्तानीति ।निश्चय कर वे सब इस प्राणका ही स्वरूप हो गयीं—आत्मभावसे प्राणरूपको ही प्राप्त हो गयीं अर्थात् यह सोचकर कि हमारे व्रत मृत्युको हटानेमें समर्थ नहीं हैं, उन्होंने प्राणका ही व्रत धारण कर लिया ।
यस्मात्प्राणेन रूपेण रूपवन्तीतराणि करणानि चलनात्मना स्वेन च प्रकाशात्मना; न हि प्राणादन्यत्र चलनात्मकत्वोपपत्तिः; चलनव्यापारपूर्वकाण्येव हि सर्वदा स्वव्यापारेषु लक्ष्यन्ते; तस्मादेते वागादय एतेन प्राणाभिधानेन आख्यायन्तेऽभिधीयन्ते प्राणा इत्येवम् ।क्योंकि अन्य इन्द्रियाँ प्राणके चलनात्मक रूपसे और अपने प्रकाशात्मक रूपसे ही रूपवती हैं; कारण प्राणके सिवा किसी अन्य इन्द्रियमें चलनात्मकत्वकी उपपत्ति नहीं हो सकती और ये सर्वदा चलनव्यापारपूर्वक ही अपने व्यापारोंमें प्रवृत्त होती दिखायी देती हैं; इसलिये ये वागादि इन्द्रियाँ इस प्राणके नामसे ही ‘प्राण’ इस प्रकार कहकर पुकारी जाती हैं।
य एवं प्राणात्मतां सर्वकरणानां वेत्ति प्राणशब्दाभिधेयत्वं च, तेन ह वाव तेनैव विदुषा तत्कुलमाचक्षते लौकिकाः। यस्मिन्कुले स विद्वाञ्जातो भवति तत्कुलं विद्वन्नाम्नैव प्रथितं भवत्यमुष्येदं कुलमिति, यथा ताप्त्य इति ।जो इस प्रकार समस्त इन्द्रियोंकी प्राणरूपता और ‘प्राण’ शब्दद्वारा पुकारा जाना जानता है, उसीसे अर्थात् उस विद्वान्‌के द्वारा ही लौकिक पुरुष उसके कुलको पुकारते हैं। अर्थात् वह विद्वान् जिस कुलमें उत्पन्न होता है वह कुल उस विद्वान्‌के नामसे ही प्रसिद्ध होता है कि यह कुल अमुकका है, जैसे तांप्त्य । जो इस प्रकार

१. तपती सूर्यदेवकी कन्या थी; वह चन्द्रवंशी राजा संवरणको विवाही गयी थी । उसका वंश उसके नामानुसार ‘ताप्त्य’ कहलाया ।

बृ० उ० २५—