बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 392, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| य एवं यथोक्तं वेद वागादीनां प्राणरूपतां प्राणाख्यत्वं च तस्यैतत्फलम् ।<br><br>किञ्च यः कश्चिदु हैवंविदा प्राणात्मदर्शिना स्पर्धते तत्प्रतिपक्षी सन्, सोऽस्मिन्नेव शरीरेऽनुशुष्यति शोषमुपगच्छति । अनुशुष्य हैव शोषं गत्वैव अन्ततोऽन्ते म्रियते न सहसानुपद्रुतो म्रियते इत्येवमुक्तमध्यात्मं प्राणात्मदर्शनमित्युक्तोपसंहारोऽधिदैवतप्रदर्शनार्थः । | उपर्युक्त वागादिकी प्राणरूपता और प्राणसंज्ञकताको जानता है, उसे यह फल प्राप्त होता है।<br><br>तथा जो कोई भी इस प्रकार जाननेवाले प्राणात्मदर्शीसे उसका प्रतिपक्षी होकर स्पर्धा करता है वह इसी शरीरमें 'अनुशुष्यति'—सूख जाता है। और सूखकर—शोषको प्राप्त होकर ही अन्तमें मर जाता है। वह बिना किसी उपद्रवके सहसा नहीं मरता। इस प्रकार यह अध्यात्मप्राणात्मदर्शन कहा—यह श्रुत्युक्त उपसंहार आगे आधिदैविक दर्शनको प्रदर्शित करनेके लिये है ॥ २१ ॥ |
अधिदैवदर्शन
अथाधिदैवतं ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दध्रे तप्स्याम्यहमित्यादित्यो भास्याम्यहमिति चन्द्रमा एवमन्या देवता यथा दैवतँ स यथैषां प्राणानां मध्यमः प्राण एवमेतासां देवतानां वायुम्लोंचन्ति ह्यन्या देवता न वायुः सैषानस्तमिता देवता यद्वायुः ॥ २२ ॥
अब अधिदैवदर्शन कहा जाता है—अग्निने व्रत किया कि 'मैं जलता ही रहूँगा', सूर्यने नियम किया, 'मैं तपता ही रहूँगा' तथा चन्द्रमाने निश्चय किया, 'मैं प्रकाशित ही होता रहूँगा।' इसी प्रकार अन्य देवताओंने भी यथादैवत (जिस देवताका जो व्यापार था, उसीके अनुसार) व्रत किया। जिस प्रकार इन वागादि प्राणोंमें मध्यम प्राण है, उसी प्रकार इन देवताओंमें वायु है, क्योंकि अन्य देवगण तो अस्त हो जाते हैं; किंतु वायु अस्त नहीं होता। यह जो वायु है, अस्त न होनेवाला देवता है ॥२२॥