भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 393
ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थे३८७
संस्कृत भाष्यहिन्दी भाष्यार्थ
अथानन्तरं अधिदैवतं देवताविषयं दर्शनमुच्यते। कस्य देवताविशेषस्य व्रतधारणं श्रेयः? इति मीमांस्यते। अध्यात्मवत्सर्वम्। ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दध्रे। तप्स्याम्यहमित्यादित्यः; भास्याम्यहमिति चन्द्रमाः; एवमन्या देवता यथादैवतम्।अब आगे अधिदैवत—देवताविषयक दर्शन कहा जाता है। अर्थात् इस बातका विचार किया जाता है कि किस देवताविशेषका व्रत धारण करना श्रेष्ठ है। अध्यात्मदर्शनके समान यहाँ भी सब प्रसङ्ग समझना चाहिये। 'मैं जलता ही रहूँगा' ऐसा अग्निने व्रत धारण किया। 'मैं तपता ही रहूँगा' ऐसा आदित्यने और 'मैं प्रकाशित ही होता रहूँगा' ऐसा चन्द्रमाने नियम कर लिया। इसी प्रकार यथादैवत अन्य देवताओोंने भी व्रत धारण किया।
सोऽध्यात्मं वागादीनामेषां प्राणानां मध्ये मध्यमः प्राणो मृत्युना अनाप्तः स्वकर्मणो न प्रच्युतः स्वेन प्राणव्रतेनाभग्नव्रतो यथा; एवमेतासामग्न्यादीनां देवतानां वायुरपि। म्लोचन्त्यस्तं यन्ति स्वकर्मभ्य उपरमन्ते—यथाध्यात्मं वागादयोऽन्या देवता अग्न्याद्याः, न वायुरस्तं याति-यथा मध्यमः प्राणः; अतः सैषा अनस्तमिता देवता यद्वायुर्योऽयं वायुः। एवमध्यात्ममधिदैवं च मीमांसित्वा निर्धारितम्—उन वागादि अध्यात्म प्राणोंमें जैसे मध्यम प्राण मृत्युसे ग्रस्त नहीं हुआ, अपने कर्मसे च्युत नहीं किया गया, अपने प्राणव्रत [के पालन] से उसका व्रत भंग नहीं हुआ; उसी प्रकार इन अग्नि आदि देवताओंमें वायु रहा, क्योंकि वागादि अध्यात्म प्राणोंके समान अग्नि आदि अन्य देवगण अस्त होते अर्थात् अपने कर्मोंसे निवृत्त होते हैं, किंतु वायु अस्त नहीं होता, जैसे मध्यम प्राण; अतः यह जो वायु है वह अनस्तमित (कभी अस्त न होनेवाला) देवता है। इस प्रकार अध्यात्म और अधिदैवसम्बन्धी विचार करके यह निश्चय किया गया है कि