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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०३

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
असौ गौरसावश्वो यश्चलति धावतीति वा, पूर्वं प्रत्यक्षं दर्शयामीति प्रतिज्ञाय, पश्चाच्चलनादिलिङ्गैर्व्यपदिशति, एवमेवैतद् ब्रह्म प्राणनादिलिङ्गैर्व्यपदिष्टं भवति त्वया; किं बहुना। त्यक्त्वा गोतृष्णानिमित्तं व्याजम्, यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः, तं मे व्याचक्ष्वेति ।<br><br>इतर आह—यथा मया प्रथमं प्रतिज्ञातस्तवात्मा—एवंलक्षण इति—तां प्रतिज्ञामनुवर्त्त एव; तत्तथैव, यथोक्तं मया। यत् पुनरुक्तं तमात्मानं घटादिवद् विषयीकुर्विति, तद् अशक्यत्वान्न क्रियते। कस्मात् पुनस्तदशक्यम् ? इत्याह—वस्तुस्वाभाव्यात्; किं पुनस्तद् वस्तुस्वाभाव्यम् दृष्ट्यादिद्रष्टृत्वम्; दृष्टेर्द्रष्टा ह्यात्मा। दृष्टिरिति द्विविधाप्रतिज्ञा करके कि तुम्हें प्रत्यक्ष [गो और अश्व] दिखलाऊँगा फिर चलन आदि लिङ्गसे कहे कि जो चलती है, वह गौ है और जो दौड़ता है, वह घोड़ा है; इसी प्रकार इस ब्रह्मका तुम प्राणनादि लिङ्गोंद्वारा व्यपदेश कर रहे हो; अतः तुम गौओंकी तृष्णाके कारण ब्रह्मवेत्ता होनेका बहाना छोड़कर जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है और जो सर्वान्तर आत्मा है, उसका मेरे प्रति स्पष्ट उल्लेख करो।<br><br>इतर (याज्ञवल्क्य) ने कहा—'मैंने जैसी पहले प्रतिज्ञा की थी कि तुम्हारा आत्मा ऐसे लक्षणोंवाला है, उस प्रतिज्ञाका मैं अनुवर्तन कर ही रहा हूँ, मैंने जैसा कहा है, वह वैसा ही है और तुमने जो कहा कि उस आत्माको घटादिके समान हमारा विषय कर दो, सो वैसा सम्भव न होनेके कारण नहीं किया जाता। वह असम्भव क्यों है? सो बतलाते हैं—वस्तुका ऐसा ही स्वभाव होनेके कारण; वह वस्तुका स्वभाव क्या है? दृष्टि आदिका द्रष्टा होना आत्माका स्वभाव है; आत्मा दृष्टिका द्रष्टा है। दृष्टि—यह दो प्रकारकी होती है—

| ७०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |

७०४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

भवति—लौकिकी पारमार्थिकी चेति; तत्र लौकिकी चक्षुःसंयुक्ता अन्तःकरणवृत्तिः, सा क्रियत इति जायते विनश्यति च; या त्वात्मनो दृष्टिः—अग्न्युष्णप्रकाशादिवत्, सा च द्रष्टुः स्वरूपत्वान्न जायते न विनश्यति च। सा क्रियमाणयोपाधिभूतया संसृष्टे वेति, व्यपदिश्यते—द्रष्टेति, भेदवच्च—द्रष्टा दृष्टिरिति च;लौकिकी और पारमार्थिकी; उनमें चक्षुसे संयुक्त जो अन्तःकरणकी वृत्ति है वह लौकिकी दृष्टि है; वह की जाती है, इसलिये उत्पन्न होती है और नष्ट भी होती है; किंतु जो अग्निके उष्णत्व और प्रकाशादिके समान आत्माकी दृष्टि है, वह द्रष्टाका स्वरूप होनेके कारण न उत्पन्न होती है और न नष्ट होती है। वह क्रियमाण उपाधिभूता दृष्टिसे संसर्गयुक्त-सी है, इसलिये आत्मा 'द्रष्टा' कहा जाता है। तथा द्रष्टा, दृष्टि ऐसा भेदवत् व्यवहार होता है।
याऽसौ लौकिकी दृष्टिश्चक्षुर्द्वारा रूपोपरक्ता जायमानैव नित्यया आत्मदृष्ट्या संसृष्टेव, तत्प्रतिच्छाया—तया व्याप्तैव जायते तथा विनश्यति च; तेनोपचर्यते द्रष्टा सदा पश्यन्नपि—पश्यति न पश्यति चेति; न तु पुनर्द्रष्टुर्दृष्टेः कदाचिदप्यन्यथात्वम्; तथा च वक्ष्यति षष्ठे “ध्यायतीव लेलायतीव”और यह जो लौकिकी दृष्टि है वह मानो चक्षुद्वारा रूपसे संश्लिष्ट-सी ही उत्पन्न होनेवाली है; वह नित्य आत्मदृष्टिसे संसृष्ट-सी, उसकी प्रतिच्छाया और उससे व्याप्त ही उत्पन्न होती और विनाशको प्राप्त होती है। उसीके कारण, सर्वदा देखनेवाला होनेपर भी द्रष्टाके विषयमें 'वह देखता है, नहीं देखता है' ऐसा उपचार किया जाता है; किंतु द्रष्टाकी दृष्टिमें कभी अन्यथात्व नहीं होता; ऐसा छठे (उपनिषद्के चौथे) अध्यायमें कहेंगे भी—“मानो ध्यान करता हुआ, मानो चेष्टा करता

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०५

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०५


(४। ३। ७) 'न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते" (४। ३। २३) इति च।हुआ” तथा “द्रष्टाकी दृष्टिका विपरिलोप नहीं होता” इत्यादि।
तमिममर्थमाह—लौकिक्या दृष्टेः कर्मभूतायाः, द्रष्टारं स्वकीयया नित्यया दृष्ट्या व्याप्तारम्, न पश्येः; यासौ लौकिकी दृष्टिः कर्मभूता, सा रूपोपरक्ता रूपाभिव्यञ्जिका नात्मानं स्वात्मनो व्याप्तारं प्रत्यञ्चं व्याप्नोति; तस्मात्तं प्रत्यगात्मानं दृष्टेर्द्रष्टारं न पश्येः। तथा श्रुतेः श्रोतारं न शृणुयाः, तथा मतेर्मनोवृत्तेः केवलाया व्याप्तारं न मन्वीथाः। तथा विज्ञातेः केवलाया बुद्धिवृत्तेर्व्याप्तारं न विजानीयाः। एष वस्तुनः स्वभावः; अतो नैव दर्शयितुं शक्यते गवादिवत्।उसी बातको याज्ञवल्क्य इस प्रकार कहता है—जो अपनी कर्मभूता लौकिकी दृष्टिका द्रष्टा और उसे अपनी नित्यदृष्टिसे व्याप्त करनेवाला है, उसे तुम नहीं देख सकते। यह जो उसकी कर्मभूता लौकिकी दृष्टि है, वह रूपसे उपरक्त होकर रूपकी अभिव्यञ्जिका है, वह अपनेको व्याप्त करनेवाले प्रत्यगात्माको व्याप्त नहीं कर सकती; अतः उस दृष्टिके द्रष्टा प्रत्यगात्माको नहीं देख सकते। इसी प्रकार उस श्रुतिके श्रोताको नहीं सुन सकते तथा मति—केवल मनोवृत्तिके व्याप्त करनेवालेका मनन नहीं कर सकते। एवं विज्ञाति—केवल बुद्धिवृत्तिके व्याप्त करनेवालेको नहीं जान सकते। यह [उस] वस्तुका स्वभाव है, इसलिये उसे गो आदिके समान दिखाया नहीं जा सकता।
'न दृष्टेर्द्रष्टारम्' इत्यत्राक्षराणयन्यथा व्याचक्षते केचित्—न दृष्टेर्द्रष्टारं दृष्टेः कर्तारं दृष्टिभेदमकृत्वा दृष्टिमात्रस्य कर्तारम्, न पश्येरिति;कोई-कोई [भर्तृप्रपञ्चादि] 'न दृष्टेर्द्रष्टारम्' इत्यादि श्रुतिके अक्षरोंकी दूसरी तरह व्याख्या करते हैं। दृष्टिके द्रष्टा अर्थात् दृष्टिके कर्ताको नहीं देख सकते यानी दृष्टिभेद बिना किये तुम केवल दृष्टिमात्रके कर्ताको नहीं देख सकते; यहाँ

बृ० उ० ४५—

७०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७०६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृतहिन्दी
दृष्टेरिति कर्मणि षष्ठी; सा दृष्टिः क्रियमाणा घटवत् कर्म भवति; द्रष्टारमिति तृजन्तेन द्रष्टुर्दृष्टिकर्तृत्वमाचष्टे; तेनासौ दृष्टेर्द्रष्टा दृष्टेः कर्तेति व्याख्यातॄणामभिप्रायः।‘दृष्टेः’ इस पदमें कर्ममें षष्ठी है, वह दृष्टि क्रियमाण होनेसे घटके समान कर्म है और ‘द्रष्टारम्’ इस तृजन्त-पदसे द्रष्टाका दृष्टिकर्तृत्व बतलाया गया है; अतः उन व्याख्याताओंका अभिप्राय यह है कि यह दृष्टिका द्रष्टा—दृष्टिका कर्ता है।
तत्र दृष्टेरिति षष्ठ्यन्तेन दृष्टिग्रहणं निरर्थकमिति दोषं न पश्यन्ति; पश्यतां वा पुनरुक्तमसारः प्रमादपाठ इति वा न आदरः; कथं पुनराधिक्यम् ? तृजन्तेनैव दृष्टिकर्तृत्वस्य सिद्धत्वादृष्टेरिति निरर्थकम्; तदा ‘द्रष्टारं न पश्येः’ इत्येतावदेव वक्तव्यम्; यस्माद्धातोः परस्तृच् श्रूयते, तद्धातवर्थकर्तरि हि तृच् स्मर्यते; ‘गन्तारं भेत्तारं वा नयति’ऐसी व्याख्या करनेमें वे यह दोष नहीं देखते कि ‘दृष्टेः’ इस षष्ठ्यन्तरूपसे ‘दृष्टि’ पदका ग्रहण निरर्थक हो जाता है। अथवा यदि देखते होंगे तो 'यह पुनरुक्त है, असार है, प्रमादपाठ है' ऐसा समझकर उसपर ध्यान नहीं देते। यह अधिक पाठ किस प्रकार है? दृष्टिकर्तृत्वरूप अर्थ तो [ ‘द्रष्टारम्’ इस ] तृजन्त पदसे ही सिद्ध हो जाता है¹ इसलिये ‘दृष्टेः’ यह पद निरर्थक ही है; उस स्थितिमें तो ‘द्रष्टारं न पश्येः’ केवल इतना ही कहना चाहिये था; क्योंकि जिस धातुसे परे ‘तृच्’ प्रत्यय सुना जाता है, वहाँ वह ‘तृच्’ उस धात्वर्थके कर्ता-अर्थमें ही होती है; जैसे गन्ता (गमन करनेवाले) को अथवा भेत्ता (भेदन करनेवाले ) को ले जाता

१. क्योंकि ‘ण्वुल्तृचौ कर्तरि’ इस पाणिनिसूत्रके अनुसार ‘तृच्’ प्रत्यय कर्ता-अर्थमें ही होता है।

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०७

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०७


| इत्येतावानेव हि शब्दः प्रयुज्यते; न तु 'गतेर्गन्तारं भिदेर्भेत्तारम्' इति असत्यर्थविशेषे प्रयोक्तव्यः; न च अर्थवादत्वेन हातव्यं सत्यां गतौ; न च प्रमादपाठः, सर्वेषामविगानात्; तस्माद् व्याख्यातॄणामेव बुद्धिदौर्बल्यम् नाध्येतृप्रमादः। <br><br> यथा त्वस्माभिर्व्याख्यातम्— लौकिकदृष्टेर्विविच्य नित्यदृष्टिविशिष्ट आत्मा प्रदर्शयितव्यः— तथा कर्तृकर्मविशेषणत्वेन दृष्टिशब्दस्य द्विः प्रयोग उपपद्यते, आत्मस्वरूपनिर्धारणाय; "न हि द्रष्टुर्दृष्टेः" (४ । ३ । २३) इति च प्रदेशान्तरवाक्येनैव एकवाक्यतोपपन्ना भवति; तथा च "चक्षूंषि पश्यति" (के० उ० १ । ६) "श्रोत्रमिदं श्रुतम्" (के० उ० १ । ७) इति श्रुत्यन्तरेण एकवाक्यतोपपन्ना। न्यायाच्च—एव- | है—केवल इतना ही शब्द प्रयुक्त होता है, यदि कोई अन्य विशेष अभिप्राय न हो तो 'गतिके गन्ताको' या 'भेदनके भेत्ताको' ऐसा प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये। जब कि इस अधिक पदप्रयोगकी दूसरी गति है तो इसे अर्थवाद कहकर छोड़ देना भी उचित नहीं है, और न यह प्रमादपाठ ही है, क्योंकि सभी शाखाओंका इसमें मतभेद नहीं है। अतः यहाँ उन व्याख्याताओंकी ही बुद्धिकी दुर्बलता है, अध्ययनकर्ताओंका प्रमाद नहीं है। <br><br> किंतु जिस प्रकार हमने व्याख्या की है कि 'आत्माको लौकिकी दृष्टिसे अलग करके नित्यदृष्टिविशिष्ट दिखाना है' उस प्रकार आत्माके स्वरूपका निर्णय करनेके लिये कर्म और कर्ताके विशेषणरूपसे 'दृष्टि' शब्दका दो बार प्रयोग होना बन सकता है तथा "न¹ हि द्रष्टुर्दृष्टेः" इस प्रदेशान्तरके वाक्यसे भी इसकी एकवाक्यता हो जाती है एवं "चक्षूंषि पश्यति²" "श्रोत्र³मिदं श्रुतम्" इत्यादि अन्य श्रुतियोंसे भी एकवाक्यता हो जाती है। तथा युक्तिसे भी यही |


१. द्रष्टाकी दृष्टिका लोप नहीं होता। २. जिसके द्वारा चक्षु इन्द्रिय देखता है। ३. जिसके द्वारा यह श्रोत्रेन्द्रिय सुन सकता है।

७०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

७०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३


संस्कृतहिन्दी
मेव ह्यात्मनो नित्यत्वमुपपद्यते विक्रियाभावे; विक्रियावच्च नित्यमिति च विप्रतिषिद्धम् । “ध्यायतीव लेलायतीव” (४ । ३ । ७) “न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते” (४ । ३ । २३) “एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य” (४ । ४ । २३) इति च श्रुत्यक्षराण्यन्यथा न गच्छन्ति ।<br><br>ननु द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञातेत्येवमादीन्यप्यक्षराण्यात्मनोऽविक्रियत्वे न गच्छन्तीति; न; यथाप्राप्तलौकिकवाक्यानुवादित्वात्तेषाम् । न आत्मतत्त्वनिर्धारणार्थानि तानि; ‘न दृष्टेर्द्रष्टारम्’ इत्येवमादीनामन्यार्थासम्भवाद् यथोक्तार्थपरत्वमवगम्यते । तस्मादनवबोधादेव हि विशेषणं परित्यक्तं दृष्टेरिति ।उचित जान पड़ता है; क्योंकि विकारका अभाव होनेके कारण इसी प्रकार आत्माका नित्यत्व सम्भव हो सकता है । [ किन्तु यदि आत्माको दृष्टिकर्ता माना जायगा तो वह विकारी होगा ] और जो विकारी है, वह नित्य हो—ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है । इसके सिवा “ध्यायतीव लेलायतीव” “न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते” “एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य” इत्यादि श्रुतियोंके अक्षरोंकी भी अन्य किसी प्रकार गति नहीं है ।<br><br>यदि कहो कि आत्माको विकारहीन माननेपर तो द्रष्टा, श्रोता मन्ता, विज्ञाता इत्यादि शब्दोंकी भी कोई सङ्गति नहीं लग सकती, तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वे तो यथाप्राप्त लौकिक वाक्योंका अनुवाद करनेवाले हैं । वे आत्मतत्त्वका निर्णय करनेके लिये नहीं हैं; “न दृष्टेर्द्रष्टारम्” इत्यादि श्रुतियोंका कोई अन्य अर्थ होना सम्भव न होनेके कारण उनका उपर्युक्त अर्थमें ही तात्पर्य समझा जाता है । अतः अन्य व्याख्याताओंने अज्ञानसे ही ‘दृष्टेः’ इस विशेषणका त्याग किया है ।

१. यह ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) की नित्य महिमा है ।

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०९

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०९


| एष ते तवात्मा सर्वैरुक्तैर्विशेषणैर्विशिष्टः, अत एतस्मादात्मनोऽन्यदार्तम्—कार्यं वा शरीरम्; करणात्मकं वा लिङ्गम्; एतदेवैकमनार्तमविनाशि कूटस्थम्; ततो ह उषस्तश्चाक्रायण उपरराम ॥ २ ॥ | तुम्हारा यह आत्मा उपर्युक्त समस्त विशेषणोंसे विशिष्ट है; इसलिये इस आत्मासे भिन्न और सब कार्यभूत शरीर अथवा करणात्मक लिङ्ग देह आर्त (नाशवान्) है, एक यही अनार्त-अविनाशी अर्थात् कूटस्थ है; तब चाक्रायण उषस्त चुप हो गया ॥ २ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये चतुर्थमुषस्तब्राह्मणम् ॥ ४ ॥


पञ्चम ब्राह्मण

याज्ञवल्क्य-कहोल-संवाद

| बन्धनं सप्रयोजकमुक्तम्, यश्च बद्धस्तस्याप्यस्तित्वमधिगतम्, व्यतिरिक्तत्वं च । तस्येदानीं बन्धमोक्षसाधनं ससंन्यासमात्मज्ञानं वक्तव्यमिति कहोलप्रश्न आरभ्यते— | प्रयोजकोंके सहित बन्धनका वर्णन किया गया और जो बद्ध है उसका अस्तित्व तथा [ देहेन्द्रिय-संघातसे ] भिन्नत्व भी विदित हुआ । अब उसके बन्धनसे मुक्त होनेके साधनरूप संन्याससहित आत्मज्ञानका प्रतिपादन करना है, इसलिये कहोलका प्रश्न आरम्भ किया जाता है— |

संन्याससहित आत्मज्ञानका निरूपण

अथ हैनं कहोलः कौषीतकेयः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे

७१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७१०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

व्याचक्ष्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः । कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति । एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः । तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् । बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिर्मौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन स्याद् येन स्यात् तेनेदृश एवातोऽन्यदार्तं ततो ह कहोलः कौषीतकेय उपरराम ॥ १ ॥

फिर इस याज्ञवल्क्यसे कौषीतकेय कहोलने पूछा; उसने 'हे याज्ञवल्क्य!' इस प्रकार सम्बोधित करके कहा—'जो भी साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसकी तुम मेरे प्रति व्याख्या करो।' [ यह सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा ] 'यह तुम्हारा आत्मा सर्वान्तर है।' [कहोल-] 'याज्ञवल्क्य ! यह सर्वान्तर कौन-सा है?' [ याज्ञवल्क्य-] 'जो क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह, जरा और मृत्युसे परे है। उस इस आत्माको ही जानकर ब्राह्मण पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणासे अलग हटकर भिक्षाचर्यासे विचरते हैं। जो भी पुत्रैषणा है, वही वित्तैषणा है और जो वित्तैषणा है, वही लोकैषणा है। ये दोनों ही [ साध्य-साधनेच्छाएँ ] एषणाएँ ही हैं। अतः ब्राह्मण पाण्डित्य (आत्मज्ञान) का पूर्णतया सम्पादन कर आत्मज्ञानरूप बलसे स्थित रहनेकी इच्छा करे। फिर बाल्य और पाण्डित्यको पूर्णतया प्राप्त कर वह मुनि होता है। तथा अमौन और मौनका पूर्णतया सम्पादन करके ब्राह्मण (कृतकृत्य) होता है। वह किस प्रकार ब्राह्मण होता है? जिस प्रकार भी हो, ऐसा ही ब्राह्मण होता है; इससे भिन्न और सब आर्त (नाशवान्) है!' तब कौषीतकेय कहोल चुप हो गया ॥ १ ॥

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७११ |

ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ७११

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अथ हैनं कहोलो नामतः, कुषीतकस्यापत्यं कौषीतकेयः, पप्रच्छ; याज्ञवल्क्येति होवाचेति, पूर्ववत्—यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः तं मे व्याचक्ष्वेति—यं विदित्वा बन्धनात् प्रमुच्यते । याज्ञवल्क्य आह—एष ते तवात्मा ।फिर इस याज्ञवल्क्यसे कहोल नामवाले कौषीतकेय—कुषीतकके पुत्रने पूछा, 'हे याज्ञवल्क्य !' इस प्रकार पूर्ववत् सम्बोधनद्वारा अभिमुख करके उसने कहा, 'जो भी साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है और जो सर्वान्तर आत्मा है, उसकी तुम मेरे प्रति व्याख्या करो, जिसको जानकर पुरुष बन्धनसे मुक्त हो जाता है।' याज्ञवल्क्यने कहा, 'यह तुम्हारा आत्मा है।'
[उषस्तकहोलप्रश्नयोर्विवेचनम्]<br><br>किम् उषस्तकहोलाभ्यामेक आत्मा पृष्टः, किं वा भिन्नावात्मानौ तुल्यलक्षणाविति । भिन्नाविति युक्तम्, प्रश्नयोरपुनरुक्तत्वोपपत्तेः । यदि ह्येक आत्मा उषस्तकहोलप्रश्नयोर्विवक्षितः, तत्रैकेनैव प्रश्नेनाधिगतत्वात्तद्विषयो द्वितीयः प्रश्नोऽनर्थकः स्यात् । न चार्थवादरूपत्वं वाक्यस्य; तस्माद् भिन्नावेतावात्मानौ क्षेत्रज्ञपरमात्माख्यौ इति केचिद् व्याचक्षते ।यहाँ प्रश्न होता है कि उषस्त और कहोलने एक ही आत्माके विषयमें पूछा है या समान लक्षणोंवाले भिन्न आत्माओंके विषयमें ?<br><br>[उत्तर—] विभिन्न आत्माओंके विषयमें मानना ही अच्छा है, क्योंकि प्रश्नोंमें पुनरुक्तिका दोष न आना ही उचित है । यदि उषस्त और कहोल दोनोंके प्रश्नोंसे एक ही आत्मा बतलाना अभीष्ट होता तो उसका ज्ञान तो एक ही प्रश्नसे हो जाता है, अतः उसके विषयमें दूसरा प्रश्न करना निरर्थक ही होगा; तथा इस वाक्यकी अर्थवादरूपता मानी नहीं जा सकती । अतः ये क्षेत्रज्ञ और परमात्मासंज्ञक भिन्न-भिन्न आत्मा ही हैं—इस प्रकार कोई कोई विद्वान् व्याख्या करते हैं।

| ७१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |

७१२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
तन्न; 'ते' इति प्रतिज्ञानात्; 'एष त आत्मा' इति हि प्रतिवचने प्रतिज्ञातम् । न चैकस्य कार्यकारणसङ्घातस्य द्वावात्मानौ उपपद्येते; एको हि कार्यकारणसङ्घात एकेनात्मना आत्मवान् । न च उषस्तस्यान्यः कहोलस्यान्यो जातितो भिन्न आत्मा भवति, द्वयोः अगौणत्वात्मत्वसर्वान्तरत्वानुपपत्तेः । यद्येकमगौणं ब्रह्म द्वयोरितरेणावश्यं गौणेन भवितव्यम्, तथा आत्मत्वं सर्वान्तरत्वं च, विरुद्धत्वात् पदार्थानाम् । यद्येकं सर्वान्तरं ब्रह्म आत्मा मुख्यः, इतरेण असर्वान्तरेण अनात्मना अमुख्येनावश्यं भवितव्यम्; तस्मादेकस्यैव द्विः श्रवणं विशेषविवक्षया ।<br><br>यत्तु पूर्वोक्तेन समानं द्वितीये प्रश्नान्तर उक्तम्, तावन्मात्रं पूर्व-ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि 'तुम्हारा' ऐसी प्रतिज्ञा की गयी है, अर्थात् उत्तरमें ऐसी प्रतिज्ञा की गयी है कि 'यह तुम्हारा आत्मा है।' और एक ही देहेन्द्रियसंधातके दो आत्मा होने सम्भव नहीं हैं, क्योंकि एक देहेन्द्रियसंधात एक ही आत्मासे आत्मवान् होता है। उषस्तका आत्मा अन्य हो और कहोलका अन्य हो—ऐसा उनमें जातितः भेद नहीं हो सकता, क्योंकि दोका अगौणत्व (मुख्यत्व), आत्मत्व और सर्वान्तरत्व उपपन्न नहीं हो सकता। यदि दोमेंसे एक ब्रह्म मुख्य है तो दूसरेका गौण होना अवश्यम्भावी है; इसी प्रकार उनका आत्मत्व और सर्वान्तरत्व भी नहीं हो सकता, क्योंकि उन पदार्थोंमें विरुद्धता है। [अभिप्राय यह है कि] यदि एक सर्वान्तर ब्रह्म आत्मा मुख्य होगा तो दूसरेको अवश्य असर्वान्तर अनात्मा और अमुख्य होना चाहिये; अतः एकहीका कुछ विशेष विवक्षासे दो बार श्रवण हुआ है।<br><br>और जो बात दूसरे प्रश्नान्तरमें पूर्व प्रश्नके ही समान कही गयी है, उतना पहले ही प्रश्नका अनुवाद है,

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१३

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
स्यैवानुवादः, तस्यैवानुक्तः कश्चिद् विशेषो वक्तव्य इति। कः पुनरसौ विशेषः ? इत्युच्यते पूर्वस्मिन् प्रश्नेऽस्ति व्यतिरिक्त आत्मा यस्यायं सप्रयोजको बन्ध उक्त इति। द्वितीये तु, तस्यैव आत्मनोऽशनायादिसंसारधर्मातीतत्वं विशेष उच्यते। यद्विशेषपरिज्ञानात् संन्याससहितात् पूर्वोक्ताद् बन्धनाद् विमुच्यते। तस्मात् प्रश्नप्रतिवचनयोः 'एष त आत्मा' इत्येवमन्तयोस्तुल्यार्थतैव।क्योंकि उसीकी कुछ विशेषता बतलानी है, जो अभी बतायी नहीं गयी है। वह विशेषता क्या है ? सो बतलाया जाता है; पूर्व प्रश्नमें जिसका यह प्रयोजकोंसहित बन्ध बतलाया गया है, वह देहादिसे व्यतिरिक्त आत्मा है। दूसरे प्रश्नमें उसी आत्माका क्षुधादि संसारधर्मोंसे परे होना यह विशेषता बतलायी जाती है, जिस विशेषताका संन्यासपूर्वक ज्ञान होनेपर पुरुष पूर्वोक्त बन्धनसे मुक्त हो जाता है। अतः 'एष त आत्मा' इस वाक्यतक इन दोनों प्रश्न और उत्तरोंकी समानार्थता ही है।
ननु कथमेकस्यैवात्मन अशनायाद्यतीतत्वं तद्वत्त्वं चेति विरुद्धधर्मसमवायित्वमिति ?**शङ्का—**किंतु एक ही आत्माका क्षुधादिसे अतीत और उनसे युक्त होना—यह विरुद्धधर्मसमवायित्व किस प्रकार सम्भव है ?
न; परिहृतत्वात्। नामरूप-<br>व्यवहारतद्भाव- विकारकार्यकरण-<br>समन्वयः लक्षणसङ्घातोपाधिभेदसम्पर्कजनितभ्रान्तिमात्रं हि संसारित्वम् इत्यसकृदवोचाम। विरुद्धश्रुतिव्याख्यानप्रसङ्गेन च;**समाधान—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इसका तो परिहार किया जा चुका है। उसका संसारित्व नाम-रूपात्मक विकाररूप जो देहेन्द्रियसंधात है, उस उपाधिभेदके सम्पर्कसे होनेवाली भ्रान्तिमात्र है—ऐसा हम अनेकों बार कह चुके हैं। तथा विरुद्धार्थवाची श्रुतियोंकी व्याख्याके प्रसङ्गमें भी यह बात कही जा

७१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७१४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| यथा रज्जुशुक्तिकागगनादयः सर्परजतमलिना भवन्ति पराध्यारोपितधर्मविशिष्टाः, स्वतः केवला एव रज्जुशुक्तिकागगनादयः; न चैवं विरुद्धधर्मसमवायित्वे पदार्थानां कश्चन विरोधः। | चुकी है; जिस प्रकार कि रज्जु, शुक्ति और आकाश आदि दूसरोंके आरोपित किये धर्मोंसे युक्त होकर सर्प, रजत और मलिन प्रतीत होते हैं, किंतु वे स्वयं शुद्ध रज्जु, शुक्ति और आकाशादि ही हैं; इस प्रकार पदार्थोंके विरुद्ध धर्म-समवायी होनेमें कोई विरोध भी नहीं है। | | नामरूपोपाध्यस्तित्वे—<br>“एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६।२।१) “नेह नानास्ति किञ्चन” (बृ०उ० ४।४।१९ इति श्रुतयो विरुध्येरन्निति चेत् ? | शङ्का—किंतु नाम-रूप उपाधिकी सत्ता स्वीकार करनेपर तो “एक ही अद्वितीय ब्रह्म है”, “यहाँ नाना कुछ नहीं है” इन श्रुतियोंसे विरोध होगा—ऐसा कहें तो ? | | न, सलिलफेनदृष्टान्तेन परिहृतत्वात्, मृदादिदृष्टान्तैश्च; यदा तु परमार्थदृष्ट्या परमात्मतत्त्वाच्छ्रुत्यनुसारिभिरन्यत्वेन निरूप्यमाणे नामरूपे मृदादिविकारवद् वस्त्वन्तरे तत्त्वतो न स्तः— सलिलफेनघटादिविकारवदेव, तदा तदपेक्ष्य “एकमेवाद्वितीयम्” “नेह नानास्ति किञ्चन” इत्यादिपरमार्थदर्शनगोचरत्वं प्रतिपद्यते। यदा तु स्वाभा- | समाधान—नहीं, इस शङ्काका तो जल और फेनके दृष्टान्तसे तथा मृत्तिकादिके दृष्टान्तसे परिहार किया जा चुका है, जिस समय श्रुतिका अनुसरण करनेवाले पुरुषोंद्वारा अन्यरूपसे निरूपण किये जानेवाले नाम और रूप परमार्थदृष्टिसे मृत्तिकादिके विकार तथा जल-फेन और घटादिके विकारके समान ही परमात्मतत्त्वसे वस्तुतः कोई भिन्न पदार्थ नहीं रहते, तब उसकी दृष्टिकी अपेक्षासे ही “एक ही अद्वितीय है” “यहाँ नाना कुछ नहीं है” इस परमार्थदृष्टिका बोध होता है। किंतु जिस समय |

ब्राह्मण ५] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७१५

ब्राह्मण ५]शाङ्करभाष्यार्थ७१५

| विक्याविद्यया ब्रह्मस्वरूपं रज्जुशुक्तिकागगनस्वरूपवदेव स्वेन रूपेण वर्तमानं केनचिदस्पृष्टस्वभावमपि सत्—नामरूपकृतकार्यकरणोपाधिभ्यो विवेकेन नावधार्यते, नामरूपोपाधिदृष्टिरेव च भवति स्वाभाविकी, तदा सर्वोऽयं वस्त्वन्तरास्तित्वव्यवहारः। | रज्जु, शुक्ति और आकाशके स्वरूपके समान किसीसे भी अछूते स्वभाववाला होकर अपने निजरूपसे विद्यमान रहते हुए भी ब्रह्मके स्वरूपका स्वाभाविकी अविद्याके कारण नामरूपजनित देहेन्द्रियरूप उपाधिसे अलग करके निश्चय नहीं किया जाता और स्वाभाविकिकी नाम-रूप उपाधिकी ही दृष्टि रहती है, उस समय यह ब्रह्मसे भिन्न वस्तुकी सत्तासे सम्बन्ध रखनेवाला सारा व्यवहार रहता है। | | अस्ति चायं भेदकृतो मिथ्याव्यवहारः, येषां ब्रह्मतत्त्वादअन्यत्वेन वस्तु विद्यते, येषां च नास्ति; परमार्थवादिभिस्तु श्रुत्यनुसारेण निरूप्यमाणे वस्तुनि—किं तत्त्वतोऽस्ति वस्तु किं वा नास्तीति, ब्रह्मैकमेवाद्वितीयं सर्वसंव्यवहारशून्यमिति निर्धार्यते; तेन न कश्चिद् विरोधः। | तथा यह भेदकृत मिथ्या व्यवहार तो, जिनकी दृष्टिमें ब्रह्मतत्त्वसे भिन्न वस्तु है और जिनकी दृष्टिमें नहीं है, उन दोनों को ही रहता है; किंतु जो परमार्थवादी हैं वे, कौन-सी वस्तु तत्त्वतः हे और कौन-सी नहीं है-इस प्रकार श्रुतिके अनुसार वस्तुका निरूपण किये जानेपर, यही निश्चय करते हैं कि सम्पूर्ण व्यवहारसे रहित एक अद्वितीय ब्रह्म ही सत्य है; इसलिये उनका व्यवहार रहनेमें भी कोई विरोध नहीं है। | | न हि परमार्थावधारणनिष्ठायां वस्त्वन्तरास्तित्वं प्रतिपद्यामहे—"एकमेवाद्वितीयम्" "अनन्तरमबाह्यम्" (बृ० उ० २।५।१९) | हम परमार्थनिश्चयकी निष्ठामें किसी अन्य वस्तुकी सत्ता स्वीकार नहीं करते, जैसा कि "एक ही अद्वितीय ब्रह्म है" "वह अन्तर बाह्यशून्य है" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध |

७१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७१६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
इति श्रुतेः। न च नामरूपव्यवहारकाले त्वविवेकिनां क्रियाकारकफलादिसंव्यवहारो नास्तीति प्रतिषिध्यते। तस्माज्ज्ञानाज्ञाने अपेक्ष्य सर्वः संव्यवहारः शास्त्रीयो लौकिकश्च; अतो न काचन विरोधशङ्का। सर्ववादिनामप्यपरिहार्यः परमार्थसंव्यवहारकृतो व्यवहारः।होता है और नाम-रूप व्यवहारकालमें अविवेकियोंकी दृष्टिमें भी क्रिया, कारक और फलादिका सम्यक् व्यवहार नहीं होता—ऐसा प्रतिषेध भी नहीं किया जाता। अतः शास्त्रीय और लौकिक सारा ही व्यवहार ज्ञान और अज्ञानकी अपेक्षासे हे; इसलिये इसमें विरोधकी कोई शङ्का नहीं हो सकती। परमार्थ और संव्यवहारकृत व्यवहार तो सभी वादियोंके लिये अपरिहार्य है।
तत्र परमार्थात्मस्वरूपमपेक्ष्य- <br><br> प्रश्नः पुनः—कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तर इति।अब, पारमार्थिक आत्मस्वरूपकी अपेक्षासे ही पुनः प्रश्न किया जाता है, 'हे याज्ञवल्क्य ! वह सर्वान्तर आत्मा कौन-सा है?'
(परमार्थात्मस्वरूपनिरूपणम्) <br><br> प्रत्याहेतरः—योऽशनायापिपासे, अशितुमिच्छाशनाया, पातुमिच्छा पिपासा; ते अशनायापिपासे योऽत्येतीति वक्ष्यमाणेण सम्बन्धः, अविवेकिभिस्तलमलवदिव गगनं गम्यमानमेव तलमले अत्येति परमार्थतः; ताभ्यामसंस्पृष्टस्वभावत्वात्। तथाइसपर याज्ञवल्क्यने कहा—'जो अशनाया-पिपासा—अशनकी इच्छा अशनाया है और पीनेकी इच्छा पिपासा—उन अशनाया और पिपासाको जो अतिक्रमण किये हुए है—इस प्रकार इसका आगेसे सम्बन्ध है; अविवेकी पुरुष आकाशको तलमलादियुक्त मानते हैं, तो भी वस्तुतः वह उनसे अछूते स्वभाववाला होनेके कारण तलमलको अतिक्रमण किये हुए है। इसी प्रकार

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७१७ |

ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ७१७

| मूढैः अशनायापिपासादिमद्ब्रह्म गम्यमानमपि क्षुधितोऽहं पिपासितोऽहमिति, ते अत्येत्येव परमार्थतः । ताभ्यामसंस्पृष्टस्वभावत्वात्; "न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः" (क० उ० २ । २ । ११) इति श्रुतेः—अविद्वल्लोकाध्यारोपितदुःखेनेत्यर्थः । प्राणैकधर्मत्वात् समासकरणमशनायापिपासयोः ।<br><br>शोकं मोहम्—शोक इति कामः; इष्टं वस्तूद्दिश्य चिन्तयतो यदरमणम्, तत्तृष्णाभिभूतस्य कामबीजम्; तेन हि कामो दीप्यते; मोहस्तु विपरीतप्रत्ययप्रभवोऽविवेको भ्रमः, स चाविद्या सर्वस्यानर्थस्य प्रसवबीजम्; भिन्नकार्यत्वात्तयोः शोकमोहयोरसमासकरणम् । तौ | यद्यपि मूढलोग 'मैं भूखा हूँ, मैं प्यासा हूँ, ऐसा मानकर ब्रह्मको भूख-प्याससे युक्त समझते हैं तो भी उनसे असंस्पृष्ट स्वभाववाला होनेके कारण वह परमार्थतः उनका अतिक्रमण ही किये हुए है; इस विषयमें "वह लोकदुःखसे लिप्त नहीं होता, उससे बाह्य है" ऐसी श्रुति भी है। तात्पर्य यह है कि वह अविद्वान् पुरुषोंद्वारा आरोपित दुःखसे लिप्त नहीं होता। एक प्राणके ही धर्म होनेके कारण 'अशनाया' और 'पिपासा' पदोंका समास किया गया है।<br><br>'शोकं मोहम्' इनमें शोक यह काम है; इष्ट वस्तुके लिये चिन्तन करनेवालेका जो अरमण (खेद) है, वह तृष्णाभिभूत पुरुषके कामका बीज होता है; क्योंकि उससे काम उत्तेजित होता है; मोह विपरीत प्रतीतिसे होनेवाला अविवेक यानी भ्रम है; यही समस्त अनर्थोंकी उत्पत्तिकी बीजभूता अविद्या है;¹ शोक और मोहके कार्य भिन्न हैं, इसलिये इनका समास नहीं किया गया। |


१ योगदर्शनमें अविद्याका लक्षण इस प्रकार किया है—'अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या' अर्थात् अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्मामें नित्य, शुचि, सुख और आत्मबुद्धि होना अविद्या है—यही विपरीत प्रतीति है।

७१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७१८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| मनोऽधिकरणौ; तथा शरीराधिकरणौ जरां मृत्युं चात्येति; जरेति कार्यकरणसङ्घातविपरिणामो वलीपालितादिलिङ्गः; मृत्युरिति तद्विच्छेदो विपरिणामावसानः; तौ जरामृत्यू शरीराधिकरणावत्येति । | इन दोनोंका अधिकरण मन है, इनको तथा शरीर जिनका अधिकरण है, उन जरा और मृत्युको भी आत्मा अतिक्रमण किये हुए है। जरा—यह देहेन्द्रियसङ्घातका विपरिणाम है, झुर्रियाँ पड़ जाना, बाल पक जाना आदि इसके चिह्न हैं तथा मृत्यु शरीरका विच्छेद और विपरिणामका अन्त हो जाना है; उन शरीररूप अधिकरणवाले जरामृत्युका वह अतिक्रमण किये हुए है। | | ये तेऽशनायादयः प्राणमनःशरीराधिकरणा प्राणिष्वनवरतं वर्तमाना अहोरात्रादिवत् समुद्रोर्मिवच्च प्राणिषु संसार इत्युच्यन्ते, योऽसौ दृष्टेर्द्रष्टेत्यादिलक्षणः साक्षादव्यवहितोऽपरोक्षादगौणः सर्वान्तर आत्मा ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानां भूतानामशनायापिपासादिभिः संसारधर्मैः सदा न स्पृश्यते; आकाश इव घनादिमलैः । | ये जो प्राण, मन और शरीररूप अधिकरणवाले तथा प्राणियोंमें दिन-रात और समुद्रकी तरङ्गोंके समान निरन्तर रहनेवाले क्षुधादि धर्म हैं, वे ही प्राणियोंमें 'संसार' इस नामसे कहे जाते हैं; किंतु यह जो दृष्टिका द्रष्टा आदि लक्षणोंवाला, साक्षात्—अव्यवहित और अपरोक्ष—अगौण सर्वान्तर—ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त भूतोंका आत्मा है, वह मेघादि मलोंसे आकाशके समान कभी संसारधर्मोंसे स्पर्श नहीं किया जाता। | | [विदुषो व्युत्थान-निरूपणम्]<br>तमेतं वै आत्मानं स्वं तत्त्वं विदित्वा ज्ञात्वा अयमहमस्मि परं ब्रह्म सदा सर्वसंसारविनिर्मुक्तं नित्य- | उस इस आत्मा—स्वरूपको यह सर्वदा सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित नित्यतृप्त परब्रह्म मैं हूँ—ऐसा जानकर ब्राह्मणलोग—क्योंकि |

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७१९ |

ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ७१९
संस्कृत मूल / भाष्यभाष्यार्थ
वृत्तामिति, ब्राह्मणाः ब्राह्मणानाम् एवाधिकारो व्युत्थाने, अतो ब्राह्मणग्रहणम्, व्युत्थाय वैपरीत्येन उत्थानं कृत्वा; कुत इत्याह—व्युत्थान (संन्यास) में ब्राह्मणोंका ही अधिकार है, इसलिये यहाँ ‘ब्राह्मण’ पद ग्रहण किया गया है— ‘व्युत्थाय’ विपरीतभावसे उत्थान करके, कहाँसे उत्थान करके ? सो बताते हैं—
पुत्रैषणायाः पुत्रार्थैषणा पुत्रैषणा—पुत्रेणेमं लोकं जयेयमिति लोकजयसाधनं पुत्रं प्रतीच्छा—एषणा दारसङ्ग्रहः । दारसङ्ग्रहमकृत्वेत्यर्थः—पुत्रैषणासे, पुत्रके लिये जो एषणा (इच्छा) होती है, उसे पुत्रैषणा कहते हैं—मैं पुत्रके द्वारा यह लोक जीतूँगा, इसलिये लोकजयके साधन पुत्रके प्रति जो इच्छा होती है वही पुत्रैषणा है; यहाँ ‘एषणा’ से स्त्रीपरिग्रह लक्षित होता है। भाव यह कि स्त्रीसंग्रह न करके—
वित्तैषणायाश्च—कर्मसाधनस्य गवादेरुपादानम्—अनेन कर्म कृत्वा पितृलोकं जेष्यामीति, विद्यासंयुक्तेन वा देवलोकम्, केवलया वा हिरण्यगर्भविद्यया दैवेन वित्तेन देवलोकम् ।तथा वित्तैषणासे उत्थान करके, कर्मके साधनभूत गौ आदि मानुष-वित्तको इस भावसे ग्रहण करना कि इसके द्वारा कर्म करके मैं पितृलोकपर विजय प्राप्त करूँगा अथवा विद्यासंयुक्त कर्मसे देवलोक या केवल हिरण्यगर्भविद्यारूप देववित्तसे देवलोक प्राप्त करूँगा, [ इसका नाम वित्तैषणा है ] ।
दैवाद् वित्ताद् व्युत्थानमेव नास्तीति केचित्, यस्मात्तद्बलेन हि किल व्युत्थानमिति; तदसत्, “एतावान्वै कामः” (बृ० उ० १ । ४ । १७) इतिकिन्हीं-किन्हींका मत है कि दैव-वित्तसे तो व्युत्थान होता ही नहीं, क्योंकि उसके बलसे ही तो व्युत्थान होता है; किंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि “एतावान्वै कामः” इस

७२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७२०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पठितत्वादेषणामध्ये दैवस्य वित्तस्य; हिरण्यगर्भादिदेवताविषयैव विद्या वित्तमित्युच्यते; देवलोकहेतुत्वात्; न हि निरुपाधिकप्रज्ञानघनविषया ब्रह्मविद्या देवलोकप्राप्तिहेतुः, “तस्मात्तत्सर्वमभवत्” (बृ०उ० १।४।१०) “आत्मा ह्येषां स भवति” (१।४।१०) इति श्रुतेः तद्बलेन हि व्युत्थानम्, “एतं वै तमात्मानं विदित्वा” (३।५।१) इति विशेषवचनात् ।श्रुतिद्वारा दैववित्तको एषणाके बीचमें ही पढ़ा गया है और हिरण्यगर्भादि देवताविषयिणी विद्या ही दैववित्त कही जाती है, क्योंकि वह देवलोकप्राप्तिकी हेतु है। निरुपाधिक प्रज्ञानघनविषयिणी ब्रह्मविद्या देवलोककी प्राप्तिकी हेतु नहीं है, जैसा कि “अतः वह सर्व हो गया” “वह इनका आत्मा ही हो जाता है” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है। और व्युत्थान भी ब्रह्मविद्याके ही बलसे होता है, क्योंकि इस विषयमें “उस इस आत्माको जानकर” ऐसा विशेष वाक्य है।
तस्मात् त्रिभ्योऽप्येतेभ्योऽनात्मलोकप्राप्तिसाधनेभ्य एषणाविषयेभ्यो व्युत्थाय—एषणा कामः “एतावान् वै कामः” (१।४।१७) इति श्रुतेः— एतस्मिंस्त्रिविधेऽनात्मलोकप्राप्तिसाधने तृष्णामकृत्वेत्यर्थः ।अतः एषणाके विषयभूत इन तीनों ही अनात्मलोकप्राप्तिके साधनोंसे व्युत्थान करके—“निश्चय इतना ही काम है” इस श्रुतिके अनुसार एषणा कामका ही नाम है—तात्पर्य यह है कि अनात्मलोककी प्राप्तिके इस त्रिविध साधनमें तृष्णा न करके [भिक्षाचर्या करते हैं।]
सर्वा हि साधनेच्छा फलेच्छैव, (एषणात्रयस्यैकत्वम्) अतो व्याचष्टे श्रुतिः एकैव एषणेति; कथम् ? या ह्येव पुत्रैषणा सासाधनसम्बन्धिनी सारी इच्छा फलेच्छा ही है, इसलिये श्रुति ऐसी व्याख्या करती है कि एक ही एषणा है; किस प्रकार?—जो भी पुत्रैषणा है, वही वित्तैषणा है; क्योंकि

| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७२१ |

ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ७२१

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
वित्तैषणा, दृष्टफलसाधनत्वतुल्यत्वात्; या वित्तैषणा सा लोकैषणा; फलार्थैव सा; सर्वः फलार्थप्रयुक्त एव हि सर्वं साधनमुपादत्ते; अत एकैव एषणा, या लोकैषणा सा साधनमन्तरेण सम्पादयितुं न शक्यत इति, साध्यसाधनभेदेन उभे हि यस्मादेते एषणे एव भवतः; तस्माद् ब्रह्मविदो नास्ति कर्म कर्मसाधनं वा।<br><br>अतो येऽतिक्रान्ता ब्राह्मणाः<br><br>[भिक्षाचर्यविधानम्]<br>सर्वं कर्म कर्मसाधनं च सर्वं देवपितृमानुषनिमित्तं यज्ञोपवीतादि; तेन हि दैवं पित्र्यं मानुषं च कर्म क्रियते, “निवीतं मनुष्याणाम्” इत्यादिश्रुतेः। तस्मात् पूर्वे ब्राह्मणा ब्रह्मविदो व्युत्थाय कर्मभ्यः कर्मसाधनेभ्यश्च यज्ञोपवीतादिभ्यः, परमहंसपारिव्राज्यं प्रतिपद्य, भिक्षाचर्यं चरन्तिउनका दृष्ट फलमें साधन होना समान है; और जो वित्तैषणा है वही लोकैषणा है, क्योंकि वह फलके ही लिये है; सब लोग फलरूप प्रयोजनसे प्रेरित होकर ही सारे साधनोंको स्वीकार करते हैं; अतः एक ही एषणा है; जो लोकैषणा है, उसका साधनके बिना सम्पादन नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस प्रकार साध्य-साधन-भेदसे ये दोनों एषणाएं ही हैं; अतः ब्रह्मवेत्ताके लिये कर्म और कर्मका साधन दोनों ही नहीं हैं।<br><br>अतः जो पूर्ववर्ती ब्राह्मण थे, वे सम्पूर्ण कर्म और देव, पितृ एवं मनुष्यलोकसम्बन्धी यज्ञोपवीतादि सम्पूर्ण कर्मसाधनोंको [छोड़कर], क्योंकि उन्हींसे देव, पितृ और मनुष्यलोकसम्बन्धी कर्म किये जाते हैं, जैसा कि “मनुष्योंके लिये निवीत¹ [पितरोंके लिये प्राचीनावीत² और देवोंके लिये उपवीत³ है]” इस श्रुतिसे ज्ञात होता है। अतः पूर्ववर्ती ब्राह्मण—ब्रह्मवेत्तालोग कर्म और कर्मके साधन यज्ञोपवीतादिसे व्युत्थान कर परमहंस परिव्राजकभावको प्राप्त होकर भिक्षाचर्या करते हैं।

१. जनेऊको मालाकी भाँति पहनना। २. जनेऊको अपसव्यभावसे अर्थात् दायें कन्धेपर पहनना। ३. जनेऊको सव्यभावसे यानी बायें कन्धेपर पहनना।

बृ० उ० ४६—

| ७२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |

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| भिक्षार्थं चरणं भिक्षाचर्यम् चरन्ति त्यक्त्वा स्मार्तं लिङ्गं केवलम् आश्रममात्रशरणानां जीवनसाधनं पारिव्राज्यव्यञ्जकम्; विद्वाँल्लिङ्गवर्जितः—"तस्मादलिङ्गो धर्मज्ञोऽव्यक्तलिङ्गोऽव्यक्ताचारः" इत्यादिस्मृतिभ्यः, "अथ परिव्राड् विवर्णवासा मुण्डोऽपरिग्रहः" (जाबालोप० ५) इत्यादिश्रुतेः, "सशिखान् केशान्निकृत्य विसृज्य यज्ञोपवीतम्" (कठश्रुतिः १) इति च । | भिक्षाके लिये विचरना भिक्षाचर्या है, उसका चरण—आचरण करते हैं, जो केवल आश्रममात्रमें रहनेवालोंके जीवनका साधन और संन्यासका अभिव्यञ्जक है, उस [त्रिदण्डादि] स्मार्त चिह्नको त्याग कर भिक्षा करते हैं, बाह्य चिह्नोंसे रहित एवं विद्वान् होकर जैसा कि "इसलिये [यति] अलिङ्ग, धर्मज्ञ, अव्यक्तलिङ्ग और अव्यक्ताचार होता है" इत्यादि स्मृतियोंसे ज्ञात होता है तथा "परिव्राट् विवर्णवस्त्रयुक्त, मुण्डित और अपरिग्रह होता है" इत्यादि श्रुतिसे और "शिखाके सहित केशोंको काटकर यज्ञोपवीतको त्याग कर" इत्यादि वाक्यसे भी सिद्ध होता है। | | (व्युत्थानविधिराक्षिप्यते)<br>ननु 'व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति' इति वर्तमानापदेशादर्थवादोऽयम्; न विधायकः प्रत्ययः कश्चिच्छ्रूयते लिङ्ग्लोट्तव्यानाम् अन्यतमोऽपि। तस्मादर्थवादमात्रेण श्रुतिस्मृतिविहितानां यज्ञोपवीतादीनां साधनानां न शक्यते परित्यागः कारयितुम्; "यज्ञोपवीत्येवाधीयीत याजयेद्यजेत वा" | पूर्व०-किंतु 'व्युत्थान करके भिक्षाचर्या करते हैं' ऐसा वर्तमानकालिक प्रयोग होनेके कारण यह अर्थवाद ही है। लिङ्, लोट्, तव्य—इन विधिसूचक प्रत्ययोंमेंसे तो यहाँ किसीका भी श्रवण नहीं है; अतः केवल अर्थवादके ही कारण श्रुतिस्मृतिविहित यज्ञोपवीतादि साधनोंमेंसे किसीका भी त्याग नहीं कराया जा सकता; "यज्ञोपवीतीको ही अध्ययन, याजन अथवा यजन |