बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९९
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९९
| न, वस्त्वन्तरेण विप्रकर्षानुपपत्तेः । | पूर्व०—नहीं, क्योंकि वस्त्वन्तररूपसे उसका दूरस्थ होना सम्भव नहीं ^१ । |
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| द्रव्ये गुणप्रवेशवदिति चेत् ? | सिद्धान्ती—द्रव्यमें गुणके प्रवेशके समान उसका प्रवेश माना जाय तो ? |
| न, अनाश्रितत्वात् । नित्यपरतन्त्रस्यैवाश्रितस्य गुणस्य द्रव्ये प्रवेश उपचर्यते । न तु ब्रह्मणः स्वातन्त्र्यश्रवणात्तथा प्रवेश उपपद्यते । | पूर्व०—नहीं, क्योंकि वह किसीके आश्रित नहीं है । जो नित्यपरतन्त्र और पराश्रित है उस गुणके ही द्रव्यमें प्रवेशका उपचार किया जाता है। ब्रह्मका उस प्रकार प्रवेश करना सम्भव नहीं है; क्योंकि उसका तो स्वातन्त्र्य सुना गया है। |
| फले बीजवदिति चेत् ? | सिद्धान्ती—यदि वह [ प्रवेश ] फलमें बीजके समान हो तो ? |
| न; सावयवत्ववृद्धिक्षयोत्पत्तिविनाशादिधर्मवत्त्वप्रसङ्गात् । न चैवंधर्मवत्त्वं ब्रह्मणः “अजोऽजरः” इत्यादि श्रुतिन्यायविरोधात् । | पूर्व०—नहीं, ऐसा माननेसे उसके सावयवत्व तथा वृद्धि, क्षय एवं उत्पत्ति-विनाशादि धर्मयुक्त होनेका प्रसंग होगा । किंतु ब्रह्मका ऐसे धर्मोंवाला होना सम्भव नहीं है; क्योंकि ऐसा माननेपर “वह अजन्मा और अजर है” इत्यादि श्रुति और युक्तिसे विरोध उपस्थित होगा । |
| तस्मादन्य एव संसारी परिच्छिन्न इह प्रविष्ट इति चेत् ? | अतः यदि ऐसा मानें कि परमात्मासे भिन्न किसी संसारीने ही इसमें प्रवेश किया है तो ? |
^१ क्योंकि प्रतिबिम्ब तभी पड़ता है जब कोई वस्तु प्रतिबिम्बके आश्रयभूत जल या दर्पणसे दूरस्थ हो । ब्रह्म व्यापक है, इसलिये उसका प्रतिबिम्बरूपसे प्रवेश नहीं हो सकता ।
२०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| न; “सेयं देवतैक्षत” (छा० उ० ६।३।२) इत्यारभ्य “नामरूपे व्याकरवाणि” (६।२।३) इति तस्या एव प्रवेशव्याकरणकर्तृत्वश्रुतेः। तथा “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” (तै० उ० २।६।१) “स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत” (ऐ० उ० ३।१२) “सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन्यदास्ते” “त्वं कुमार उत वा कुमारी त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि” (श्वे० उ० ४।३) “पुरश्चक्रे द्विपदः” (बृ० उ० २।५।१८) “रूपं रूपम्” (क० उ० २।२।९) इति च मन्त्रवर्णान्न परादन्यस्य प्रवेशः। | सिद्धान्ती—ऐसा मानना ठीक नहीं; क्योंकि “उस इस देवताने ईक्षण किया” यहाँसे लेकर “मैं नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति करूँ” यहाँतक श्रुतिसे उसीका प्रवेश और अभिव्यक्त करना सिद्ध होता है। तथा “उसे रचकर वह पीछेसे उसीमें प्रविष्ट हो गया”, “वह इसी प्रकार मस्तकके अन्तिम भागको विदीर्ण कर उसके द्वारा प्रवेश कर गया”, “वह धीर समस्त रूपोंको जानकर उनके नाम रख उनके द्वारा बोलता रहता है”, “तू कुमार है, तू ही कुमारी है और तू ही वृद्ध होकर लाठीके सहारे चलता है”, “उसने दो चरणवाले शरीर बनाये”, “रूप-रूपके [अनुरूप हो गया]” इत्यादि मन्त्रवर्णोंसे भी परमात्मासे भिन्न किसी अन्यका प्रवेश सिद्ध नहीं होता। |
| प्रविष्टानामितरेतरभेदात्परानेकत्वमिति चेत् ? | पूर्व०—किंतु प्रविष्ट होनेवाले पदार्थोंका एक दूसरेसे भेद हुआ करता है, इसलिये परमात्माका अनेकत्व प्राप्त होता है। |
| न, “एको देवो बहुधा सन्निविष्टः” “एकः सन्बहुधा विचचार” “त्वमेकोऽसि बहूननुप्रविष्टः” “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा” (श्वे० | सिद्धान्ती—नहीं, “एक ही देव अनेक प्रकारसे प्रविष्ट हुआ”, “एक होकर भी उसने अनेक रूपसे संचार किया”, “तुम एक ही अनेकोंमें अनुप्रविष्ट हो”, “सर्वभूतोंमें निहित एक देव है, वह सबमें व्याप्त और |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१
| मूल संस्कृत | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| उ० ६।११) इत्यादिश्रुतिभ्यः। | समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है" इत्यादि श्रुतियोंसे ऐसा सिद्ध नहीं होता। |
| प्रवेश उपपद्यते नोपपद्यत इति तिष्ठतु तावत्। प्रविष्टानां संसारित्वात्तदनन्यत्वाच्च परस्य संसारित्वमिति चेत् ? | पूर्व०—उत्पन्न किये हुए कार्यवर्गके भीतर परमात्माका प्रवेश होना सम्भव है अथवा नहीं है—यह प्रश्न तबतक अलग रहे, किंतु जो प्रविष्ट हैं वे संसारी हैं और उससे अभिन्न हैं, इसलिये परमात्माका भी संसारी होना प्राप्त होता है। |
| न, अशनायाद्यत्ययश्रुतेः ।<br><br>सुखित्वदुःखित्वादिदर्शनान्नेति चेन्न, "न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः" (क० उ० २।२।११) इति श्रुतेः । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि परमात्माको क्षुधादि सांसारिक धर्मोंसे परे बतानेवाली श्रुति है। यदि कहो कि उसको सुखी-दुःखी होना देखा जाता है, इसलिये यह कथन ठीक नहीं है तो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि "सबसे अलग रहनेवाला परमात्मा लौकिक दुःखसे लिप्त नहीं होता" ऐसी श्रुति है। |
| प्रत्यक्षादिविरोधादयुक्तमिति चेत् ? | पूर्व०—किंतु प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे इस कथनका विरोध होनेके कारण यह मान्य नहीं है। |
| न, उपाध्याश्रयजनितविशेषविषयत्वात्प्रत्यक्षादेः। "न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येः" (बृ० उ० ३।४।२) "विज्ञातारमरे केन विजानीयात्" (बृ० उ० ४।५।१९) "अविज्ञातं विज्ञातृ" (बृ० | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि प्रत्यक्षादि तो उपाधिके आश्रयसे होनेवाले विशेषको ही विषय करनेवाले होते हैं। "दृष्टिके द्रष्टाको मत देखो," "अरे, विज्ञाताको किसके द्वारा जाने?," "वह स्वयं अविज्ञात रहकर दूसरोंको जाननेवाला है" |
२०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| संस्कृत-मूल | हिन्दी-अनुवाद |
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| उ० ३ । ८ । ११) इत्यादि श्रुतिभ्यो नात्मविषयं विज्ञानम् । किं तर्हि ? बुद्ध्याद्युपाध्यात्मप्रतिच्छायाविषयमेव सुखितोऽहं दुःखितोऽहमित्येवमादि प्रत्यक्षविज्ञानम् । | इत्यादि श्रुतियोंसे [ प्रमाणजनित ] ज्ञान आत्माको विषय करनेवाला नहीं है । तो फिर कैसा है? 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष ज्ञान बुद्धि आदि उपाधिमें पड़नेवाले आत्माके प्रतिबिम्बको ही विषय करनेवाला है । |
| अयमहंमिति विषयेण विषयिणः सामानाधिकरण्योपचारात्, "नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ" (बृ० उ० ३ । ८ । ११) इत्यन्यात्मप्रतिषेधाच्च, देहावयवविशेष्यत्वाच्च सुखदुःखयोर्विषयधर्मत्वम् । | इसके सिवा 'यह (देह) मैं हूँ' इस प्रकार विषयके साथ विषयीके सामानाधिकरण्यका उपचार होनेसे "इससे भिन्न कोई अन्य द्रष्टा नहीं है" इस श्रुति-वाक्यसे अन्य आत्माका निषेध होनेसे तथा देहके अवयवोंसे विशेष्य होनेके कारण सुख-दुःखकी विषयधर्मता सिद्ध होती है ।¹ |
| "आत्मनस्तु कामाय" (बृ० उ० २ । ४ । ५) इत्यात्मार्थत्वश्रुतेरयुक्त इति चेन्न, "यत्र वा अन्यदिव स्यात्" इत्यविद्याविषया- | यदि कहो कि "आत्माके लिये ही सब प्रिय होते हैं" ऐसी आत्मार्थत्वको प्रकट करनेवाली श्रुति होनेसे ऐसा कथन ठीक नहीं है तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि "जहाँ कोई अन्य-सा होता है" इस श्रुतिके अनुसार उसकी अविद्याजनित |
१ तात्पर्य यह है कि अज्ञानवश देहके साथ आत्माका तादात्म्य होनेसे देहके सुख-दुःखादिका आत्मामें उपचार किया जाता है, आत्मासे भिन्न कोई और द्रष्टा नहीं है और द्रष्टा सर्वथा शुद्ध होता है, इसलिये आत्मामें सुख-दुःखादि धर्म नहीं रह सकते तथा सुख-दुःखकी जो प्रतीति होती है उसका आश्रय भी कोई-न-कोई देहका अवयव ही होता है, जैसे शिरःपीडा, उदरशूलादि । इससे भी वे अनात्मगत ही सिद्ध होते हैं ।
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २०३
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २०३
| त्मार्थत्वाभ्युपगमात् “तत्केन कं पश्येत्” (बृ० उ० ४। ५। १५) “नेह नानास्ति किञ्चन” (बृ० उ० ४। ४। १९) “तत्र को मोहःकः शोक एकत्वमनुपश्यतः” (ईशा० ७) इत्यादिना विद्याविषये तत्प्रतिषेधाच्च नात्मधर्मत्वम् । | आत्मार्थता मानी जाती है; “वहाँ कौन किसके द्वारा देखे,” “वहाँ नाना कुछ नहीं है,” “वहाँ एकत्व देखनेवालेको क्या मोह और क्या शोक हो सकता है?” इत्यादि वाक्योंसे ज्ञानदृष्टिमें तो उनका निषेध होनेके कारण आत्मधर्मत्व होना सम्भव नहीं है। | | तार्किकसमयविरोधादयुक्तमिति चेत् ? | पूर्व०-किंतु नैयायिकोंके सिद्धान्तसे विरोध होनेके कारण यह (आत्माका असंसारित्व) अयुक्त है।¹ | | न; युक्त्याप्यात्मनो दुःखित्वानुपपत्तेः। न हि दुःखेन प्रत्यक्षविषयेण आत्मनो विशेष्यत्वम् प्रत्यक्षाविषयत्वात्। आकाशस्य शब्दगुणवत्त्ववदात्मनो दुःखित्वमिति चेन्न, एकप्रत्ययविषयत्वानुपपत्तेः। न हि सुखग्राहकेण प्रत्यक्षविषयेण प्रत्ययेन नित्यानुमेयस्यात्मनो विषयीकरणमुपपद्यते | सिद्धान्ती-ऐसा मत कहो, क्योंकि युक्तिसे भी आत्माका दुःखी होना सिद्ध नहीं हो सकता। प्रत्यक्षके विषयभूत दुःखसे आत्मा विशिष्ट नहीं हो सकता; क्योंकि वह स्वयं प्रत्यक्षका अविषय है। यदि कहो कि जिस प्रकार आकाश शब्दगुणवाला माना जाता है उसी प्रकार आत्माका दुःखित्व भी सिद्ध हो सकता है तो यह भी होना सम्भव नहीं, क्योंकि उसका एक ज्ञानका विषय होना असम्भव है। सुखको ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षविषयक ज्ञानके द्वारा नित्य अनुमेय आत्माको विषय करना सम्भव नहीं है। यदि वह उसे |
१ क्योंकि नैयायिकोंके सिद्धान्तमें आत्मा बुद्धि आदि चौबीस गुणोंवाला है।
२०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| तस्य च विषयीकरणे आत्मन एकत्वाद्दिषय्यभावप्रसङ्गः । | विषय कर ले तो विषयीके अभावका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाय, क्योंकि आत्मा तो एक ही है।^१ | | एकस्यैव विषयविषयित्वं दीपवदिति चेत् ? | पूर्व०—दीपकके समान एकका ही विषय और विषयी भी होना सम्भव है। | | न; युगपदसम्भवात्, आत्मन्यंशानुपपत्तेश्च। एतेन विज्ञानस्य ग्राह्यग्राहकत्वं प्रत्युक्तम् । | सिद्धान्ती—नहीं, एक साथ ऐसा होना सम्भव नहीं है। इसके सिवा आत्मामें अंश होना सम्भव न होनेसे भी यही सिद्ध होता है। इससे विज्ञानका ग्राह्य-ग्राहक उभयरूप होना भी खण्डित हो जाता है। | | प्रत्यक्षानुमानविषययोश्च दुःखआत्मनोर्गुणगुणित्वे नानुमानम् । दुःखस्य नित्यमेव प्रत्यक्षविषयत्वात्, रूपादिसामानाधिकरण्याच्च । | प्रत्यक्ष प्रमाणके विषय दुःख और अनुमान प्रमाणके विषय आत्माके गुण और गुणी होनेमें अनुमान प्रमाण भी नहीं हो सकता; क्योंकि दुःख सर्वदा प्रत्यक्षका ही विषय है तथा रूपादिसे उसका सामानाधिकरण्य है। | | मनःसंयोगजत्वेऽप्यात्मनि दुःखस्य सावयवत्वविक्रियावत्त्वानित्यत्वप्रसङ्गात् । न ह्यविकृत्य संयोगि द्रव्यं गुणः कश्चिदुपयन्न- | आत्मामें दुःखको मनः संयोगजनित माना जाय तो भी आत्माके सावयवत्व, विकारित्व एवं अनित्यत्वका प्रसङ्ग उपस्थित होता है, क्योंकि संयोगी द्रव्यको विकृत किये बिना कोई गुण |
१ इसलिये यदि वह प्रत्यक्षविषयक ज्ञानका विषय हो जायगा तो विषयी कौन होगा ? क्योंकि एक ही पदार्थ एक ही ज्ञानका विषय और विषयी दोनों नहीं हो सकता।
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २०५
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २०५
| संस्कृत (मूल) | हिन्दी अनुवाद |
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| पयन्वा दृष्टः क्वचित् । न च निरवयवं विक्रियमाणं दृष्टं क्वचिदनित्यगुणाश्रयं वा नित्यम् । न चाकाश आगमवादिभिर्नित्यतयाभ्युपगम्यते, न चान्यो दृष्टान्तोऽस्ति । | कहीं आता-जाता नहीं देखा गया । तथा निरवयव वस्तुको कहीं विकृत होते और नित्य वस्तुको अनित्य गुणोंका आश्रय होते नहीं देखा गया । आगमोक्तमतावलम्बिन्होंने आकाशको तो नित्य नहीं माना^१ और इसके सिवा कोई दूसरा दृष्टान्त नहीं है । |
| विक्रियमाणमपि तत्प्रत्ययान्निवृत्तेर्नित्यमेवेति चेत् ? | पूर्व०— विकृत होनेपर भी 'यह वही है' ऐसा ज्ञान निवृत्त न होनेके कारण वह नित्य ही है—ऐसा मानें तो ?^२ |
| न, द्रव्यस्य अवयवान्यथात्वव्यतिरेकेण विक्रियानुपपत्तेः । | सिद्धान्ती— ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि द्रव्य पदार्थके अवयवोंमें परिवर्तन हुए बिना विकार होना सम्भव नहीं है । |
| सावयवत्वेऽपि नित्यत्वमिति चेन्न; | यदि कहो कि सावयव होनेपर भी वह नित्य है^३ तो ऐसा हो नहीं सकता, |
| सावयवस्यावयवसंयोगपूर्वकत्वे सति विभागोपपत्तेः । | क्योंकि सावयव पदार्थ अवयवसंयोगपूर्वक उत्पन्न होनेके कारण उसके अवयवोंका विभाग होना सम्भव है । |
| वज्रादिष्वदर्शनान्नेति चेन्न, अनुमेयत्वात्सं- | यदि कहो कि वज्रादिमें तो ऐसा नहीं देखा जाता^४ तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उनकी अवयवसंयोग- |
१. क्योंकि "आत्मन आकाशः सम्भूतः" ( तै० उ० २ । १ ) इस श्रुतिसे आत्मासे आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध होती है और उत्पन्न होनेवाला पदार्थ नित्य नहीं हो सकता ।
२. यह परिणामवादियोंका मत है ।
३. ऐसा जैनी लोग मानते हैं ।
४. अर्थात् वज्रादि ( बिजली आदि ) सावयव होनेपर भी अवयवसंयोगपूर्वक उत्पन्न होते हों, ऐसा नहीं देखा जाता ।
| २०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
| २०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| योगपूर्वत्वस्य। तस्मान्नात्मनो दुःखाद्यनित्यगुणाश्रयत्वोपपत्तिः। | पूर्वकत्वका अनुमान किया जा सकता है। अतः आत्माका अनित्य गुणोंका आश्रय होना सम्भव नहीं है। | | परस्यादुःखित्वेऽन्यस्य च दुःखिनोऽभावे दुःखोपशमनाय शास्त्रारम्भानर्थक्यमिति चेत् ? | पूर्व०—किंतु यदि परमात्मा दुःखी नहीं है और उससे भिन्न दूसरे दुःखी पदार्थका अभाव है तो ऐसी स्थितिमें [दुःखकी निवृत्तिके लिये] शास्त्रका आरम्भ होना व्यर्थ ही सिद्ध होता है। | | न, अविद्याध्यारोपितदुःखित्वभ्रमापोहार्थत्वात्, आत्मनि प्रकृतसङ्ख्यापूरणभ्रमापोहवत्। कल्पितदुःख्यात्माभ्युपगमाच्च। | सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो, क्योंकि आत्मामें प्रकृत (दशम) संख्याकी अपूर्वरूप भ्रमकी निवृत्तिके समान¹ शास्त्र अविद्यासे आरोपित दुःखित्वरूप भ्रमकी निवृत्तिके लिये है। तथा कल्पित दुःखी आत्मा स्वीकार भी किया गया है²। | | जलसूर्यादिप्रतिबिम्बवदात्मप्रवेशश्च प्रतिबिम्बवद्व्याकृते कार्ये उपलब्धयत्वम्। प्रागुत्पत्तेरनुपलब्ध | जलमें पड़े हुए सूर्यादिके प्रतिबिम्बके समान व्याकृत कार्यमें आत्माका प्रतिबिम्बके समान उपलब्ध होना ही उसका कार्यमें प्रवेश है। जगत्की उत्पत्तिसे पूर्व जो |
१. यह आख्यायिका इस प्रकार है। एक बार दस आदमी विदेश गये। मार्गमें उन्होंने एक नदी पार की। उस पार पहुँचनेपर यह देखनेके लिये कि हम दस हैं या नहीं, आपसमें गणना करने लगे। परंतु जो गिनता वह अपनेको छोड़कर गिनता। इसलिये दस संख्याकी पूर्ति न होती। इतनेमें ही एक आप्त पुरुष आया, उसने उन्हें अलग-अलग गिनकर बता दिया कि तुम दस ही हो। इससे उनका भ्रमजनित दुःख दूर हो गया।
२. इसलिये भी शास्त्रारम्भ सार्थक है।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७
| आत्मा पश्चात्कार्ये च सृष्टे व्याकृते बुद्धेरन्तरुपलभ्यमानः सूर्यादिप्रतिबिम्बवज्जलादौ कार्यं सृष्ट्वा प्रविष्ट इव लक्ष्यमाणो निर्दिश्यते "स एष इह प्रविष्टः" (बृ० उ० १।४।७) "ताः सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्" "स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत" (ऐ० उ० २।१२) 'सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य" (छा० उ० ६।२।३) इत्येवमादिभिः। <br><br> न तु सर्वगतस्य निरवयवस्य दिग्देशकालान्तरापक्रमणप्राप्तिलक्षणःप्रवेशःकदाचिदप्युपपद्यते । न च परादात्मनोऽन्योऽस्ति द्रष्टा "नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्तश्रोतृ" (बृ० उ० ३।८।११) इत्यादिश्रुतेरित्यवोचाम। उपल- | आत्मा उपलब्ध नहीं होता था वह व्यक्त कार्यकी रचना हो जानेपर बुद्धिके भीतर उपलब्ध होनेसे जलादिमें सूर्यादिके प्रतिबिम्बके समान कार्यको रचकर उसमें प्रविष्ट हुआ-सा लक्षित होता है—ऐसा कहा जाता है;¹ जैसा कि वह यह आत्मा इसमें प्रवेश किये हुए है," "उन (शरीरों) को रचकर वह उनमें प्रवेश कर गया," "वह इस मूर्धसीमाको विदीर्णकर इसके द्वारा प्रवेश कर गया," "उस इस देवताने ईक्षण किया—अहो ! मैं इस जीवात्मारूपसे इन तीनों देवताओंमें प्रवेश कर" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। <br><br> जो सर्वगत और निरवयव है उस आत्माका एक दिशा, देश या कालको छोड़कर अन्य दिशा, देश या कालको प्राप्त होनारूप प्रवेश कभी सम्भव नहीं है। तथा यह हम पहले ही कह चुके हैं कि "इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है" "इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है" इत्यादि श्रुतिके अनुसार परमात्मासे भिन्न और कोई द्रष्टा नहीं है। |
१ अर्थात् वस्तुतः वह प्रतिबिम्बके समान प्रवेश करता हो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रतिबिम्बके आश्रयसे बिम्बके पार्थक्यके समान आत्माका बुद्धि आदिसे व्यवधान नहीं है।
२०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| ब्ध्यर्थत्वाच्च सृष्टिप्रवेशस्थित्यप्य- | तथा सृष्टि, प्रवेश, स्थिति और |
| यवाक्यानाम्, उपलब्धेः पुरुषार्थ- | लयका प्रतिपादन करनेवाले वाक्य |
| त्वश्रवणात्। “आत्मानमेवावेत्” | आत्मोपलब्धिके ही लिये हैं, क्योंकि |
| (बृ० उ० १।४।१०) “तस्मा- | आत्मोपलब्धि ही पुरुषार्थ है—ऐसा |
| त्तत्सर्वमभवत्” (बृ० उ० १। | सुना गया है; जैसा कि “उसने |
| ४।१०) “ब्रह्मविदाप्नोति | अपनेहीको जाना,” “अतः वह |
| परम्” (तै० उ० २।१।१) | सर्वरूप हो गया,” “ब्रह्मवेत्ता पर- |
| “स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद | मात्माको प्राप्त कर लेता है,” “वह |
| ब्रह्मैव भवति” (मु० उ० ३। | जो कि उस परब्रह्मको जानता है |
| २।९) “आचार्यवान्पुरुषो वेद” | ब्रह्म ही हो जाता है,” “आचार्यवान् |
| (छा० उ० ६।१४।२) | पुरुषको ज्ञान होता है”, उसके |
| “तस्य तावदेव चिरम्” (छा० | लिये तभीतक देरी है” इत्यादि |
| उ० ६।१४।२) इत्यादि- | श्रुतियोंसे, तथा “तब मुझे तत्त्वतः |
| श्रुतिभ्यः। “ततो मां तत्त्वतो | जानकर उसके पश्चात् मुझहीमें |
| ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्” (गीता | प्रवेश करता है,” “वही समस्त |
| १८।५५) “तद्ध्यग्रयं सर्व- | विद्याओंमें श्रेष्ठ है, क्योंकि उससे |
| विद्यानां प्राप्यते ह्यमृतं ततः” | अमृतकी प्राप्ति होती है” इत्यादि |
| इत्यादिस्मृतिभ्यश्च। भेददर्शना- | स्मृतियोंसे भी सिद्ध होता है। इसके |
| पवादाच्च सृष्ट्यादिवाक्यानाम् | सिवा भेददर्शनकी निन्दा होनेसे भी |
| आत्मैकत्वदर्शनार्थपरत्वोपपत्तिः। | सृष्ट्यादिविषयक वाक्योंका आत्मै- |
| तस्मात्कार्यस्थस्य उपलब्धृत्वमेव | कत्वदर्शनपरक होना युक्त है। अतः |
| प्रवेश इत्युपचर्यते। | कार्यस्थ आत्माका उपलब्ध होना ही |
| उसका प्रवेश है—ऐसा उपचारसे | |
| कहा जाता है। | |
| आ नखाग्रेभ्यो नखाग्रमर्यादम् | ‘आ नखाग्रेभ्यः’ अर्थात् नखाग्र- |
| आत्मनश्चैतन्यमुपलभ्यते। तत्र | पर्यन्त आत्माका चैतन्य उपलब्ध होता |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २०९ |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २०९ |
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| कथमिव प्रविष्टः ? इत्याह—यथा लोके क्षुरधाने क्षुरो धीयतेऽस्मिन्निति क्षुरधानं तस्मिन्नापितोपस्कराधाने, क्षुरोऽन्तःस्थ उपलभ्यते, अवहितः प्रवेशितः स्याद् यथा वा विश्वम्भरोऽग्निः, विश्वस्य भरणाद्विश्वम्भरः कुलाये नीडेऽग्निः काष्ठादाववहितः स्यादित्यनुवर्तते । तत्र हि स मथ्यमान उपलभ्यते । | है। वह उसमें किसके समान प्रविष्ट है, सो श्रुति बतलाती है—जिस प्रकार लोकमें क्षुरधानमें—जिसमें छुरा रखा जाय उसे क्षुरधान कहते हैं उसमें अर्थात् नापितके मुण्डन-सामग्री (औजार) रखनेके संदूकमें उसके भीतर रखा हुआ छुरा उपलब्ध होता अर्थात् उसमें अवहित (छिपा हुआ)—प्रविष्ट रहता है। अथवा जिस प्रकार विश्वम्भर—अग्नि, जो विश्वका भरण करनेके कारण विश्वम्भर है, कुलाय—नीड यानी काष्ठादिमें छिपा रहता है—इस प्रकार यहाँ 'अवहितः स्यात्' इसकी अनुवृत्ति होती है, वहाँ वह मन्थन करनेपर देखा जाता है। | | यथा च क्षुरः क्षुरधान एकदेशेऽवस्थितो यथा चाग्निः काष्ठादौ सर्वतो व्याप्यावस्थितः, एवं सामान्यतो विशेषतश्च देहं संव्याप्यावस्थित आत्मा । तत्र हि स प्राणनादिक्रियावान् दर्शनादिक्रियावांश्चोपलभ्यते । तस्मात्तत्रैवं प्रविष्टं तमात्मानं प्राणनादिक्रियाविशिष्टं न पश्यन्ति नोपलभन्ते । | तथा जिस प्रकार छुरा क्षुरधानके एक देशमें स्थित रहता है और अग्नि जैसे काष्ठादिमें उसे सब ओरसे व्याप्त करके विद्यमान रहता है इसी प्रकार आत्मा शरीरको सामान्य और विशेषरूपसे व्याप्त करके स्थित है। वहाँ वह प्राणनादि और दर्शनादि क्रियावाला देखा जाता है। अतः उस शरीरमें प्रविष्ट उस प्राणनादिक्रियाविशिष्ट आत्माको लोग नहीं देखते—उन्हें उसकी उपलब्धि नहीं होती। | | नन्वप्राप्तप्रतिषेधोऽयं तं न | शङ्का—किंतु 'उस आत्माको नहीं देखते यह तो अप्राप्तका प्रतिषेध |
बृ० उ० १४—
२१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| पश्यन्तीति, दर्शनस्याप्रकृतत्वात्। | है, क्योंकि यहाँ दर्शनका कोई प्रसंग नहीं है। | | नैष दोषः, सृष्ट्यादिवाक्यानाम् आत्मैकत्वप्रतिपत्त्यर्थपरत्वात्प्रकृतमेव तस्य दर्शनम्। "रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रति चक्षणाय" (बृ० उ० २। ५। १९) इति मन्त्रवर्णात्। | समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि सृष्ट्यादिपरक वाक्योंका तात्पर्य आत्मैकत्वबोध होनेके कारण उसका दर्शन प्रकृत ही है, जैसा कि "वह प्रत्येक रूपके अनुरूप हो गया है, उसका यह रूप उसके दर्शनके लिये है" इस मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है। | | तत्र प्राणनादिक्रियाविशिष्टस्यादर्शन हेतुमाह—<br>क्रियाविशिष्टस्यात्मनोऽसमस्तत्वप्रदर्शनम् | अकृत्स्नोऽसमस्तो हि यस्मात्स प्राणनादिक्रियाविशिष्टः। कुतः पुनरकृत्स्नत्वम्? इत्युच्यते—प्राणन्नेव प्राणनक्रियामेव कुर्वन्प्राणो नाम प्राणसमाख्यः प्राणाभिधानो भवति। प्राणनक्रियाकर्तृत्वाद्वि प्राणः प्राणीतीत्युच्यते नान्यां क्रियां कुर्वन्। यथा लावकः पाचक इति। तस्मात्क्रियान्तरविशिष्टस्य अनुपसंहारादकृत्स्नो हि सः। | अब श्रुति प्राणनादिक्रियाविशिष्ट आत्माके दिखायी न देनेमें हेतु बतलाती है-क्योंकि वह प्राणनादिक्रियाविशिष्ट आत्मा अकृत्स्न—असम्पूर्ण है। उसकी असम्पूर्णता क्यों है? सो बतलाया जाता है—प्राणन अर्थात् प्राणनक्रिया करनेसे ही वह प्राण यानी प्राणनामवाला होता है। [तात्पर्य यह है कि] प्राण क्रियाका कर्ता होनेसे ही 'प्राण प्राणन कर्ता है' ऐसा कहा जाता है, किसी अन्य क्रियाके करनेसे नहीं जैसे लावक, पाचक इत्यादि। अतः उसमें क्रियान्तरविशिष्टका उपसंहार (संग्रह) न होनेके कारण वह असम्पूर्ण ही है। इसी प्रकार 'वक्तीति वाक्' इस व्युत्पत्तिसे बोलने यानी वदनक्रिया करनेके कारण वह | | तथा वदन्वदनक्रियां कुर्वन्व- | |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| क्तीति वाक्, पश्यंश्चक्षुश्चष्ट इति-चक्षुर्द्रष्टा, शृण्वञ्शृणोतीति श्रोत्रम्। | वाक् है, ‘चष्टे इति चक्षुः’ इस व्युत्पत्तिसे देखनेवाले यानी द्रष्टाका नाम चक्षु है और ‘शृणोतीति श्रोत्रम्’ इस व्युत्पत्तिसे जो सुनता है वह श्रोत्र है। |
| ‘प्राणन्नेव प्राणः’ ‘वदन्वाक्’ इत्याभ्यां क्रियाशक्त्युद्भवः प्रदर्शितो भवति। ‘पश्यंश्चक्षुः’ ‘शृण्वञ्श्रोत्रम्’ इत्याभ्यां विज्ञानशक्त्युद्भवः प्रदर्श्यते, नामरूपविषयत्वाद्धिज्ञानशक्तेः। श्रोत्रचक्षुषी विज्ञानस्य साधने, विज्ञानं तु नामरूपसाधनम्। न हि नामरूपव्यतिरिक्तं विज्ञेयमस्ति। तयोश्चोपलम्भे करणं चक्षुःश्रोत्रे। | ‘प्राणन्नेव प्राणः’, ‘वदन्वाक्’ इन दोनों वाक्योंसे आत्मामें क्रियाशक्तिका उद्भव दिखाया गया है तथा ‘पश्यंश्चक्षुः’, ‘शृण्वञ्श्रोत्रम्’ इन दोनों वाक्योंसे विज्ञानशक्तिका प्राकट्य प्रदर्शित किया गया है, क्योंकि विज्ञानशक्ति नाम और रूपको विषय करनेवाली होती है। श्रोत्र और नेत्र विज्ञानके साधन हैं तथा विज्ञान नाम-रूपका साधन है; क्योंकि नाम-रूपके सिवा और कोई विज्ञेय नहीं है तथा उनकी उपलब्धिमें नेत्र और श्रोत्र करण हैं। |
| क्रिया च नामरूपसाध्या प्राणसमवायिनी, तस्याः प्राणाश्रयाया अभिव्यक्तौ वाक्करणम्। तथा पाणिपादपायूपस्थाख्यानि। सर्वेषामुपलक्षणार्था वाक्। एतदेव हि सर्वं व्याकृतम्। “त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म” (बृ० उ० १।६।१) इति हि वक्ष्यति। | नाम और रूपसे साध्य जो क्रिया है वह प्राणके आश्रित है और उस प्राणाश्रिता क्रियाकी अभिव्यक्तिमें वाक् साधन है। इसी प्रकार पाणि, पाद, पायु और उपस्थ नामकी कर्मेन्द्रियाँ भी हैं। वाक् इन सबके उपलक्षणके लिये है। यही सब व्याकृत जगत् है। आगे “यह सारा नामरूप कर्म त्रयरूप ही है” इस श्रुतिसे यही बात कही जायगी। |
२१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १
२१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १
| संस्कृत | हिन्दी |
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| मन्वानो मनो मनुत इति ।<br><br>ज्ञानशक्तिविकासानां साधारणं करणं मनो मनुतेऽनेनेति । पुरुषस्तु कर्ता सन्मन्वानो मन इत्युच्यते ।<br><br>(विशिष्टात्मवेदिनोऽकृत्स्नत्वनिरूपणम्)<br>तान्येतानि प्राणादीन्यस्यात्मनः कर्मनामानि, कर्मजानि नामानि कर्मनामान्येव, न तु वस्तुमात्रविषयाणि । अतो न कृत्स्नात्मवस्तुवद्योतकानि। एवं ह्यसावात्मा प्राणनादिक्रियया तत्तत्क्रियाजनितप्राणादिनामरूपाभ्यां व्याक्रियमाणोऽवद्योत्यमानोऽपि । स योऽतोऽस्मात्प्राणनादिक्रियासमुदायाद् एकैकं प्राणं चक्षुरिति वा विशिष्टम् अनुपसंहृतेतरविशिष्टक्रियात्मकं मनसा अयमात्मेत्युपास्ते चिन्तयति, न स वेद न स जानाति ब्रह्म । कस्मात् ? अकृत्स्नोऽसमस्तो हि यस्मादेष आत्मा अस्मात्प्राणनादिसमुदायात् । अतः प्रविभक्त एकैकेन | 'मनुते इति मनः' इस व्युत्पत्तिसे मनन करनेपर उसका नाम मन हुआ। मन ज्ञानशक्तिके विकासोंका साधारण साधन है, क्योंकि इससे आत्मा मनन करता है । पुरुष ही कर्ता होनेपर जब मनन करता है तो 'मन' इस नामसे कहा जाता है।<br><br>वे ये प्राणादि इस आत्माके कर्मनाम अर्थात् कर्मजनित नाम ही हैं, ये वस्तुमात्रको विषय करनेवाले नहीं हैं। अतः ये सम्पूर्ण आत्मवस्तुके द्योतक नहीं हैं। इस प्रकार यह आत्मा प्राणनादि क्रियासे उस-उस क्रियाके कारण होनेवाले प्राणादि नाम और रूपोंसे व्यक्त होने अर्थात् प्रकाशित होनेपर भी [ पूर्णतया प्रकाशित नहीं होता ] । वह जो इस प्राणनादिक्रियासमुदायमेंसे किसी क्रियासे विशिष्ट प्राण या चक्षुकी, अन्य विशिष्टक्रियामय आत्माका उपसंहार न करके, मनके द्वारा 'यह आत्मा है' इस प्रकार उपासना यानी चिन्तन करता है वह नहीं जानता — उसे ब्रह्मका ज्ञान नहीं है। क्यों नहीं है ? क्योंकि इस प्राणनादिसमुदायसे विशिष्ट यह आत्मा अकृत्स्न-असम्पूर्ण है। इसलिये वह अन्य धर्मोंका उपसंहार न करनेके कारण प्रविभक्त |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१३
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| विशेषणेन विशिष्ट इतरधर्मान्तरानुपसंहाराद्भवति । यावदयमेवं वेद पश्यामि शृणोमि स्पृशामीति वा स्वभावप्रवृत्तिविशिष्टं वेद तावदञ्जसा कृत्स्नमात्मानं न वेद। | यानी एक-एक विशेषणसे विशिष्ट होता है। अतः जबतक यह 'मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, मैं स्पर्श करता हूँ' इस प्रकार आत्माको स्वाभाविक प्रवृत्तियोंसे विशिष्ट जानता है तबतक यह साक्षात् रूपसे सम्पूर्ण आत्माको नहीं जानता। |
| कथं पुनः पश्यन्वेद ? इत्याह— | तो फिर किस प्रकार देखनेपर वह उसे जानता है ? इसपर श्रुति कहती है— |
| (निरुपाधिकात्मोपासनमेव कृत्स्नत्वम्)<br>आत्मेत्येव, आत्मनि प्राणादीनि विशेषणानि यान्युक्तानि तानि यस्य स आप्नुवंस्तान्यात्मा इत्युच्यते । स तथा कृत्स्नविशेषोपसंहारी सन्कृत्स्नो भवति । वस्तुमात्ररूपेण हि प्राणाद्युपाधिविशेषक्रियाजनितानि विशेषणानि व्याप्नोति । तथा च वक्ष्यति— “ध्यायतीव लेलायतीव” (बृ० उ० ४ । ३ । ७) इति । तस्मादात्मेत्येवोपासीत । | 'आत्मा है' इस प्रकार ही । आत्मा—ऊपर जिन प्राणादि विशेषणोंका वर्णन किया गया है, वे जिसके हैं, उन्हें व्याप्त करनेके कारण वह आत्मा कहा जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण विशेषणोंका अपनेमें उपसंहार करनेवाला होनेसे वह सम्पूर्ण है। वह अपने वस्तुमात्ररूपसे प्राणादि विशेष उपाधियोंकी क्रियासे होनेवाले विशेषणोंमें व्याप्त है। ऐसा ही “मानो ध्यान करता है, मानो चेष्टा करता है” इस वाक्यसे श्रुति कहेगी भी। अतः 'वह आत्मा है' इस प्रकार ही उसकी उपासना करनी चाहिये। |
| एवं कृत्स्नो ह्यसौ स्वेन वस्तुरूपेण गृह्यमाणो भवति । कस्मात्कृत्स्नः ? इत्याशङ्क्याह—अत्रा- | इस प्रकार अपने वास्तविक स्वरूपसे ग्रहण किया जानेपर यह सम्पूर्ण है। क्यों सम्पूर्ण है ?—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है— |
२१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
२१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| [आत्मोपासनस्याविधेयत्वम्]<br>स्मिन्नात्मनि हि यस्मान्निरुपाधिकजलसूर्यप्रतिबिम्बभेदा इवादित्ये प्राणाद्युपाधिकृता विशेषाः प्राणादिकर्मजनामाभिधेया यथोक्ता ह्येते एकमभिन्नतां भवन्ति प्रतिपद्यन्ते ।<br><br>‘आत्मत्येवोपासीत’ इति नापूर्वविधिः । पक्षे प्राप्तत्वात् “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” (बृ० उ० ३ । ४ । १) “कतम आत्मेति—योऽयं विज्ञानमयः” (बृ० उ० ४ । ३ । ७) इत्येवमाद्यात्मप्रतिपादनपराभिः श्रुतिभिरात्मविषयं विज्ञानमुत्पादितम् । तत्रात्मस्वरूपविज्ञानेनैव तद्विषयानात्माभिमानबुद्धिः कारकादिक्रियाफलाध्यारोपणात्मिका अविद्या निवर्तिता । तस्यां निवर्तितायां कामादिदोषानुपपत्तेः | क्योंकि इस निरुपाधिक आत्मामें, जिस प्रकार जलमें पड़े हुए सूर्य-प्रतिबिम्बके भेद सूर्यमें एक हो जाते हैं उसी प्रकार, ऊपर बतलाये हुए प्राणादि कर्मजन्य नामोंसे कहे जानेवाले प्राणादि उपाधियोंके कारण होनेवाले सम्पूर्ण विशेष एक होते अर्थात् अभिन्नताको प्राप्त हो जाते हैं।<br><br>‘आत्मत्येवोपासीत’ यह अपूर्वविधि नहीं है, क्योंकि यह एक पक्षमें स्वतः प्राप्त है।¹ “जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है” “आत्मा कौन-सा है, इसपर कहते हैं—यह जो विज्ञानमय है” इस प्रकारकी आत्माका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंसे आत्मविषयक ज्ञान उत्पन्न होता है। वहाँ आत्मस्वरूपके ज्ञानसे ही उसमें होनेवाली अनात्माभिमानबुद्धि अर्थात् कारकादि क्रिया एवं फलकी अध्यारोपरूपा अविद्या निवृत्त की जाती है। उसके निवृत्त हो जानेपर कामादि दोषोंकी सम्भावना |
१. जो अर्थ अत्यन्त अप्राप्त होता है उसके लिये जो विधि की जाती है उसे अपूर्वविधि कहते हैं। जैसे 'जिसे स्वर्गकी इच्छा हो वह अग्निहोत्र करे' यहाँ अग्निहोत्र अत्यन्त अप्राप्त था, अतः उसके लिये जो विधि की गयी है वह अपूर्वविधि है। आत्मा विधिका विषय नहीं है—यह बात आगेके विचारसे स्पष्ट हो जायगी।
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१५
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१५
| अनात्मचिन्तानुपपत्तिः। पारिशेष्यादात्मचिन्तैव। तस्मात्तदुपासनमस्मिन्पक्षे न विधातव्यम्, प्राप्तत्वात्। | न रहनेसे अनात्मचिन्तनकी सम्भावना नहीं रहती। फलतः आत्मचिन्तन ही रह जाता है। अतः इस पक्षमें आत्मोपासनाका विधान करनेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह स्वतः प्राप्त है। |
|---|---|
| उक्तार्थमीमांसा<br>तिष्ठतु तावत्पाक्षिक्यात्मोपासनप्राप्तिर्नित्या वेति, अपूर्वविधिः स्यात्; ज्ञानोपासनयोरेकत्वे सत्यप्राप्तत्वात्। 'न स वेद' इति विज्ञानं प्रस्तुत्य 'आत्मेत्येवोपासीत' इत्यभिधानाद्वेदोपासनशब्दयोरेकार्थतावगम्यते। "अनेन ह्येतत्सर्वं वेद" "आत्मानमेवावेत्" (बृ० उ० १।४।१०) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च विज्ञानमुपासनम्। तस्य चाप्राप्तत्वाद्विध्येयत्वम्। | शङ्का—आत्मोपासनकी प्राप्ति पाक्षिक है अथवा नित्य है—इस विचारको अभी रहने दो, यह तो अपूर्वविधि ही है, क्योंकि यहाँ ज्ञान और उपासनाका एक ही अर्थ होनेके कारण वह स्वतः प्राप्त नहीं है। 'न स वेद' (वह नहीं जानता) इस वाक्यसे विज्ञानका आरम्भ कर 'आत्मेत्येवोपासीत' इस प्रकार कहनेके कारण यहाँ 'वेद' और 'उपासन' इन शब्दोंकी एकार्थता ज्ञात होती है। "इससे इस सबको जान लेता है" "आत्माको ही जाना" इत्यादि श्रुतियोंसे भी विज्ञान उपासनाहीका नाम है। और वह (उपासना) अप्राप्त होनेके कारण विधिकी योग्यता रखती है।¹ |
| न च स्वरूपान्वाख्याने पुरुषप्रवृत्तिरुपपद्यते, तस्मादपूर्व- | इसके सिवा स्वरूपके अनुवादमें पुरुषकी प्रवृत्ति होनी भी सम्भव नहीं |
१. क्योंकि उपासना मानस कर्म है, वह स्वतः प्राप्त नहीं होता; इसलिये उसके लिये विधिकी आवश्यकता है।
२१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| विधिरेवायम् । कर्मविधिसामान्याच्च । यथा 'यजेत' 'जुहुयात्' इत्यादयः कर्मविधयः, न तैरस्य "आत्मेत्येवोपासीत" (१।४।७) "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" (२ । ४ । ५) इत्याद्यात्मोपासनविधेर्विशेषोऽवगम्यते । मानसक्रियात्वाच्च विज्ञानस्य; तथा 'यस्यै देवतायै हविर्गृहीतं स्यात्तां मनसा ध्यायेद्वषट्करिष्यन्' इत्याद्या मानसी क्रिया विधीयते, तथा "आत्मेत्येवोपासीत" (१ । ४ । ७) "मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" (२ । ४ । ५) इत्याद्या क्रियैव विधीयते ज्ञानात्मिका । तथावोचाम वेदोपासनशब्दयोरेकार्थत्वमिति ।<br><br>भावनांशत्रयोपपत्तेश्च—यथा | है; इसलिये यह अपूर्वविधि ही है। तथा कर्मविधिसे इसकी समानता होनेके कारण भी [ यही बात सिद्ध होती है ] । जिस प्रकार 'यजन करे' 'हवन करे' इत्यादि कर्मविधियाँ हैं, उनसे "आत्मा है—इस प्रकार उपासना करे" "अयि मैत्रेयि ! यह आत्मा द्रष्टव्य है" इत्यादि आत्मोपासनसम्बन्धी विधियोंका कोई अन्तर नहीं जान पड़ता । तथा विज्ञान भी मानसक्रिया ही है [ इसलिये भी यह विधि है ] । जिस प्रकार 'जिस देवताके लिये हवि ग्रहण किया जाय उसका 'वषट्कार' करते हुए मनसे ध्यान करे' इत्यादिरूपसे मानसी क्रियाका विधान किया जाता है उसी प्रकार "आत्मा है—इस प्रकार उपासना करे", "आत्माका मनन करना चाहिये, निदिध्यासन करना चाहिये" इत्यादि रूपसे ज्ञानात्मिका क्रियाका ही विधान किया जाता है । तथा 'वेद' और 'उपासन' शब्दोंका एक ही अर्थ है—यह हम कह ही चुके हैं ।<br><br>इसके सिवा इस वाक्यमें भावनाके [ फल, करण और इतिकर्तव्यता-रूप ] तीनों अंश सम्भव होनेके |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१७
| [शाङ्करभाष्यम्] | [भाष्यार्थ] |
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| हि यजेत इत्यस्यां भावनायाम्-किं केन कथम् इति भाव्याद्याकाङ्क्षापनयकारणमंशत्रयमवगम्यते, तथा उपासीत इत्यस्यामपि भावनायां विधीयमानायाम् किमुपासीत ? केनोपासीत? कथमुपासीत? इत्यस्यामाकाङ्क्षायाम् आत्मानमुपासीत मनसा त्यागब्रह्मचर्यशमदमोपरमतितिक्षादीतिकर्तव्यतासंयुक्तः इत्यादि शास्त्रेणैव समर्थ्यतेऽशत्रयम् । यथा च कृत्स्नस्य दर्शपूर्णमासादिप्रकरणस्य दर्शपूर्णमासादिविध्युद्देशत्वेनोपयोगः, एवमौपनिषदाम् आत्मोपासनप्रकरणस्य आत्मोपासनविध्युद्देशत्वेनैवोपयोगः। "नेति नेति" ( २ । ३ । ६ ) "अस्थूलम्" (३।८।८) "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६ । २ । १) 'अशना- | कारण भी यह विधिवाक्य है। जिस प्रकार 'यजेत' ( यजन करे ) इस भावनामें 'किस उद्देश्यसे किस साधनसे और किस प्रकार [ यजन करे ]' ऐसी भाव्यादिसम्बन्धिनी आकाङ्क्षाओंकी निवृत्तिके कारणभूत तीन अंश देखे जाते हैं, उसी प्रकार 'उपासीत' इस विधान की जानेवाली भावनामें भी 'किसकी उपासना करे?' 'किसके द्वारा उपासना करे?' और 'किस प्रकार उपासना करे?' ऐसी आकाङ्क्षा होनेपर 'आत्माकी उपासना करे', 'मनसे करे' तथा 'त्याग, ब्रह्मचर्य, शम, दम, उपरति तथा तितिक्षादिरूप इतिकर्तव्यतासे युक्त होकर करे' इत्यादि शास्त्रसे ही तीन अंशोंका समर्थन होता है। तथा जिस प्रकार दर्शपूर्णमासादिसम्बन्धी शास्त्रके सम्पूर्ण प्रकरणका दर्शपूर्णमासकी विधिके उद्देशरूपसे ही उपयोग है उसी प्रकार उपनिषदोंके आत्मोपासनसम्बन्धी प्रकरणका भी आत्मोपासनकी विधिके उद्देशरूपसे ही उपयोग है । "नेति नेति" "अस्थूलम्" "एकमेवाद्वितीयम्" |
१. 'शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येत्' इत्यादि शास्त्र आत्मज्ञानके साधनका निरूपण करता है।
२१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २१८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| याद्यतीतः” इत्येवमादिवाक्यानाम् उपास्यआत्मस्वरूपविशेषसमर्पणेनोपयोगः। फलं च मोक्षोऽविद्यानिवृत्तिर्वा। | “अशनायाद्यतीतः” इत्यादि शास्त्रवाक्योंका उपयोग उपास्य आत्माके विशेष रूपको समर्पण करनेमें है तथा उसका फल मोक्ष या अविद्याकी निवृत्ति है। | | अपरे वर्णयन्ति उपासनेनात्मविषयं विशिष्टं विज्ञानान्तरं भावयेत्, तेनात्मा ज्ञायते, अविद्यानिवर्तकं च तदेव, नात्मविषयं वेदवाक्यजनितं विज्ञानमिति। एतस्मिन्नर्थे वचनान्यपि—“विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत” (बृ० उ० ४।४।२१) “द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” (२।४।५) “सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः” (छा० उ० ४।७।१) इत्यादीनि। | कुछ अन्य लोगोंका कथन है कि उपासनाके द्वारा आत्मविषयक अन्य विशिष्ट विज्ञानकी भावना करनी चाहिये, उससे आत्माका ज्ञान होता है और वही अविद्याकी निवृत्ति करनेवाला है। आत्मविषयक वेदवाक्यजनित विज्ञान उसकी निवृत्ति करनेवाला नहीं है। इस विषयमें ये वचन भी हैं—“उसे जानकर तद्विषयक बुद्धि करे” आत्माका साक्षात्कार करे तथा उसका श्रवण, मनन और निदिध्यासन करे”, “उसका अन्वेषण करना चाहिये तथा उसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये” इत्यादि। | | न, अर्थान्तराभावात्। न च ‘आत्मेत्येवोपासीत’ इत्यपूर्वविधिः; कस्मात्? आत्मस्वरूपकथनानात्मप्रतिषेधवाक्यजनितविज्ञानव्यतिरेकेण अर्थान्तरस्य कर्तव्यस्य मानसस्य बाह्यस्य | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस वाक्यका कोई अर्थान्तर नहीं हो सकता। ‘आत्मेत्येवोपासीत’ यह अपूर्वविधि नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि आत्मस्वरूपके कथन और अनात्मप्रतिषेधवाक्यजनित विज्ञानसे भिन्न इसका मानसिक या बाह्य कर्तव्यसम्बन्धी कोई दूसरा अर्थ |