भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 207

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१


मूल संस्कृतहिन्दी भाष्यार्थ
उ० ६।११) इत्यादिश्रुतिभ्यः।समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है" इत्यादि श्रुतियोंसे ऐसा सिद्ध नहीं होता।
प्रवेश उपपद्यते नोपपद्यत इति तिष्ठतु तावत्। प्रविष्टानां संसारित्वात्तदनन्यत्वाच्च परस्य संसारित्वमिति चेत् ?पूर्व०—उत्पन्न किये हुए कार्यवर्गके भीतर परमात्माका प्रवेश होना सम्भव है अथवा नहीं है—यह प्रश्न तबतक अलग रहे, किंतु जो प्रविष्ट हैं वे संसारी हैं और उससे अभिन्न हैं, इसलिये परमात्माका भी संसारी होना प्राप्त होता है।
न, अशनायाद्यत्ययश्रुतेः ।<br><br>सुखित्वदुःखित्वादिदर्शनान्नेति चेन्न, "न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः" (क० उ० २।२।११) इति श्रुतेः ।सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि परमात्माको क्षुधादि सांसारिक धर्मोंसे परे बतानेवाली श्रुति है। यदि कहो कि उसको सुखी-दुःखी होना देखा जाता है, इसलिये यह कथन ठीक नहीं है तो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि "सबसे अलग रहनेवाला परमात्मा लौकिक दुःखसे लिप्त नहीं होता" ऐसी श्रुति है।
प्रत्यक्षादिविरोधादयुक्तमिति चेत् ?पूर्व०—किंतु प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे इस कथनका विरोध होनेके कारण यह मान्य नहीं है।
न, उपाध्याश्रयजनितविशेषविषयत्वात्प्रत्यक्षादेः। "न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येः" (बृ० उ० ३।४।२) "विज्ञातारमरे केन विजानीयात्" (बृ० उ० ४।५।१९) "अविज्ञातं विज्ञातृ" (बृ०सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि प्रत्यक्षादि तो उपाधिके आश्रयसे होनेवाले विशेषको ही विषय करनेवाले होते हैं। "दृष्टिके द्रष्टाको मत देखो," "अरे, विज्ञाताको किसके द्वारा जाने?," "वह स्वयं अविज्ञात रहकर दूसरोंको जाननेवाला है"