बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 206, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 206
| २०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| न; “सेयं देवतैक्षत” (छा० उ० ६।३।२) इत्यारभ्य “नामरूपे व्याकरवाणि” (६।२।३) इति तस्या एव प्रवेशव्याकरणकर्तृत्वश्रुतेः। तथा “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” (तै० उ० २।६।१) “स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत” (ऐ० उ० ३।१२) “सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन्यदास्ते” “त्वं कुमार उत वा कुमारी त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि” (श्वे० उ० ४।३) “पुरश्चक्रे द्विपदः” (बृ० उ० २।५।१८) “रूपं रूपम्” (क० उ० २।२।९) इति च मन्त्रवर्णान्न परादन्यस्य प्रवेशः। | सिद्धान्ती—ऐसा मानना ठीक नहीं; क्योंकि “उस इस देवताने ईक्षण किया” यहाँसे लेकर “मैं नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति करूँ” यहाँतक श्रुतिसे उसीका प्रवेश और अभिव्यक्त करना सिद्ध होता है। तथा “उसे रचकर वह पीछेसे उसीमें प्रविष्ट हो गया”, “वह इसी प्रकार मस्तकके अन्तिम भागको विदीर्ण कर उसके द्वारा प्रवेश कर गया”, “वह धीर समस्त रूपोंको जानकर उनके नाम रख उनके द्वारा बोलता रहता है”, “तू कुमार है, तू ही कुमारी है और तू ही वृद्ध होकर लाठीके सहारे चलता है”, “उसने दो चरणवाले शरीर बनाये”, “रूप-रूपके [अनुरूप हो गया]” इत्यादि मन्त्रवर्णोंसे भी परमात्मासे भिन्न किसी अन्यका प्रवेश सिद्ध नहीं होता। |
| प्रविष्टानामितरेतरभेदात्परानेकत्वमिति चेत् ? | पूर्व०—किंतु प्रविष्ट होनेवाले पदार्थोंका एक दूसरेसे भेद हुआ करता है, इसलिये परमात्माका अनेकत्व प्राप्त होता है। |
| न, “एको देवो बहुधा सन्निविष्टः” “एकः सन्बहुधा विचचार” “त्वमेकोऽसि बहूननुप्रविष्टः” “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा” (श्वे० | सिद्धान्ती—नहीं, “एक ही देव अनेक प्रकारसे प्रविष्ट हुआ”, “एक होकर भी उसने अनेक रूपसे संचार किया”, “तुम एक ही अनेकोंमें अनुप्रविष्ट हो”, “सर्वभूतोंमें निहित एक देव है, वह सबमें व्याप्त और |