बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| २०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| योगपूर्वत्वस्य। तस्मान्नात्मनो दुःखाद्यनित्यगुणाश्रयत्वोपपत्तिः। | पूर्वकत्वका अनुमान किया जा सकता है। अतः आत्माका अनित्य गुणोंका आश्रय होना सम्भव नहीं है। | | परस्यादुःखित्वेऽन्यस्य च दुःखिनोऽभावे दुःखोपशमनाय शास्त्रारम्भानर्थक्यमिति चेत् ? | पूर्व०—किंतु यदि परमात्मा दुःखी नहीं है और उससे भिन्न दूसरे दुःखी पदार्थका अभाव है तो ऐसी स्थितिमें [दुःखकी निवृत्तिके लिये] शास्त्रका आरम्भ होना व्यर्थ ही सिद्ध होता है। | | न, अविद्याध्यारोपितदुःखित्वभ्रमापोहार्थत्वात्, आत्मनि प्रकृतसङ्ख्यापूरणभ्रमापोहवत्। कल्पितदुःख्यात्माभ्युपगमाच्च। | सिद्धान्ती - ऐसा मत कहो, क्योंकि आत्मामें प्रकृत (दशम) संख्याकी अपूर्वरूप भ्रमकी निवृत्तिके समान¹ शास्त्र अविद्यासे आरोपित दुःखित्वरूप भ्रमकी निवृत्तिके लिये है। तथा कल्पित दुःखी आत्मा स्वीकार भी किया गया है²। | | जलसूर्यादिप्रतिबिम्बवदात्मप्रवेशश्च प्रतिबिम्बवद्व्याकृते कार्ये उपलब्धयत्वम्। प्रागुत्पत्तेरनुपलब्ध | जलमें पड़े हुए सूर्यादिके प्रतिबिम्बके समान व्याकृत कार्यमें आत्माका प्रतिबिम्बके समान उपलब्ध होना ही उसका कार्यमें प्रवेश है। जगत्की उत्पत्तिसे पूर्व जो |
१. यह आख्यायिका इस प्रकार है। एक बार दस आदमी विदेश गये। मार्गमें उन्होंने एक नदी पार की। उस पार पहुँचनेपर यह देखनेके लिये कि हम दस हैं या नहीं, आपसमें गणना करने लगे। परंतु जो गिनता वह अपनेको छोड़कर गिनता। इसलिये दस संख्याकी पूर्ति न होती। इतनेमें ही एक आप्त पुरुष आया, उसने उन्हें अलग-अलग गिनकर बता दिया कि तुम दस ही हो। इससे उनका भ्रमजनित दुःख दूर हो गया।
२. इसलिये भी शास्त्रारम्भ सार्थक है।