भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 211

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २०५


संस्कृत (मूल)हिन्दी अनुवाद
पयन्वा दृष्टः क्वचित् । न च निरवयवं विक्रियमाणं दृष्टं क्वचिदनित्यगुणाश्रयं वा नित्यम् । न चाकाश आगमवादिभिर्नित्यतयाभ्युपगम्यते, न चान्यो दृष्टान्तोऽस्ति ।कहीं आता-जाता नहीं देखा गया । तथा निरवयव वस्तुको कहीं विकृत होते और नित्य वस्तुको अनित्य गुणोंका आश्रय होते नहीं देखा गया । आगमोक्तमतावलम्बिन्होंने आकाशको तो नित्य नहीं माना^१ और इसके सिवा कोई दूसरा दृष्टान्त नहीं है ।
विक्रियमाणमपि तत्प्रत्ययान्निवृत्तेर्नित्यमेवेति चेत् ?पूर्व०— विकृत होनेपर भी 'यह वही है' ऐसा ज्ञान निवृत्त न होनेके कारण वह नित्य ही है—ऐसा मानें तो ?^२
न, द्रव्यस्य अवयवान्यथात्वव्यतिरेकेण विक्रियानुपपत्तेः ।सिद्धान्ती— ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि द्रव्य पदार्थके अवयवोंमें परिवर्तन हुए बिना विकार होना सम्भव नहीं है ।
सावयवत्वेऽपि नित्यत्वमिति चेन्न;यदि कहो कि सावयव होनेपर भी वह नित्य है^३ तो ऐसा हो नहीं सकता,
सावयवस्यावयवसंयोगपूर्वकत्वे सति विभागोपपत्तेः ।क्योंकि सावयव पदार्थ अवयवसंयोगपूर्वक उत्पन्न होनेके कारण उसके अवयवोंका विभाग होना सम्भव है ।
वज्रादिष्वदर्शनान्नेति चेन्न, अनुमेयत्वात्सं-यदि कहो कि वज्रादिमें तो ऐसा नहीं देखा जाता^४ तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उनकी अवयवसंयोग-

१. क्योंकि "आत्मन आकाशः सम्भूतः" ( तै० उ० २ । १ ) इस श्रुतिसे आत्मासे आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध होती है और उत्पन्न होनेवाला पदार्थ नित्य नहीं हो सकता ।
२. यह परिणामवादियोंका मत है ।
३. ऐसा जैनी लोग मानते हैं ।
४. अर्थात् वज्रादि ( बिजली आदि ) सावयव होनेपर भी अवयवसंयोगपूर्वक उत्पन्न होते हों, ऐसा नहीं देखा जाता ।