भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 224
२१८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| याद्यतीतः” इत्येवमादिवाक्यानाम् उपास्यआत्मस्वरूपविशेषसमर्पणेनोपयोगः। फलं च मोक्षोऽविद्यानिवृत्तिर्वा। | “अशनायाद्यतीतः” इत्यादि शास्त्रवाक्योंका उपयोग उपास्य आत्माके विशेष रूपको समर्पण करनेमें है तथा उसका फल मोक्ष या अविद्याकी निवृत्ति है। | | अपरे वर्णयन्ति उपासनेनात्मविषयं विशिष्टं विज्ञानान्तरं भावयेत्, तेनात्मा ज्ञायते, अविद्यानिवर्तकं च तदेव, नात्मविषयं वेदवाक्यजनितं विज्ञानमिति। एतस्मिन्नर्थे वचनान्यपि—“विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत” (बृ० उ० ४।४।२१) “द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” (२।४।५) “सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः” (छा० उ० ४।७।१) इत्यादीनि। | कुछ अन्य लोगोंका कथन है कि उपासनाके द्वारा आत्मविषयक अन्य विशिष्ट विज्ञानकी भावना करनी चाहिये, उससे आत्माका ज्ञान होता है और वही अविद्याकी निवृत्ति करनेवाला है। आत्मविषयक वेदवाक्यजनित विज्ञान उसकी निवृत्ति करनेवाला नहीं है। इस विषयमें ये वचन भी हैं—“उसे जानकर तद्विषयक बुद्धि करे” आत्माका साक्षात्कार करे तथा उसका श्रवण, मनन और निदिध्यासन करे”, “उसका अन्वेषण करना चाहिये तथा उसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये” इत्यादि। | | न, अर्थान्तराभावात्। न च ‘आत्मेत्येवोपासीत’ इत्यपूर्वविधिः; कस्मात्? आत्मस्वरूपकथनानात्मप्रतिषेधवाक्यजनितविज्ञानव्यतिरेकेण अर्थान्तरस्य कर्तव्यस्य मानसस्य बाह्यस्य | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस वाक्यका कोई अर्थान्तर नहीं हो सकता। ‘आत्मेत्येवोपासीत’ यह अपूर्वविधि नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि आत्मस्वरूपके कथन और अनात्मप्रतिषेधवाक्यजनित विज्ञानसे भिन्न इसका मानसिक या बाह्य कर्तव्यसम्बन्धी कोई दूसरा अर्थ |