बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 225, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 225
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २१९ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| वाभावात्। तत्र हि विधेः साफल्यं यत्र विधिवाक्यश्रवणमात्रजनितविज्ञानव्यतिरेकेण पुरुषप्रवृत्तिर्गम्यते। यथा "दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत" इत्येवमादौ। न हि दर्शपूर्णमासविधिवाक्यजनितविज्ञानमेव दर्शपूर्णमासानुष्ठानम्; तच्चाधिकाराद्यपेक्षानुभावि। | नहीं हो सकता। विधिकी सफलता वहीं होती है जहाँ विधिवाक्यके श्रवणमात्रसे होनेवाले विज्ञानके सिवा कोई अन्य पुरुषप्रवृत्ति भी जानी जाय। जैसे "स्वर्गकी कामनावाला दर्श-पूर्णमास यज्ञोंद्वारा यजन करे" इत्यादि वाक्योंमें। यहाँ दर्श-पूर्णमाससम्बन्धी विधिवाक्यसे होनेवाला विज्ञान ही दर्श-पूर्णमास यज्ञोंका अनुष्ठान नहीं है; वह तो अधिकारी आदिकी अपेक्षासे पीछे होनेवाला है। |
| न तु "नेति नेति" (२। ३। ६) इत्याद्यात्मप्रतिपादकवाक्यजनितविज्ञानव्यतिरेकेण दर्शपूर्णमासादिवत्पुरुषव्यापारः सम्भवति। सर्वव्यापारोपशमहेतुत्वात् तद्वाक्यजनितविज्ञानस्य। | किन्तु "नेति नेति" इत्यादि आत्मप्रतिपादक वाक्योंसे होनेवाले विज्ञानके सिवा उससे, दर्श-पूर्णमासादिके समान, कोई और पुरुषव्यापार होना सम्भव नहीं है, क्योंकि इन वाक्योंसे होनेवाला विज्ञान तो सब प्रकारके व्यापारकी निवृत्तिका हेतु है। अतः उदासीन विज्ञान प्रवृत्तिका जनक नहीं हो सकता। इसके सिवा "एकमेवाद्वितीयम्" "तत्त्वमसि" इत्यादि वाक्य अब्रह्म और अनात्मविषयक विज्ञानकी निवृत्ति करनेवाले भी हैं और उसकी निवृत्ति होनेपर प्रवृत्तिका होना सम्भव नहीं है, क्योंकि अनात्मविज्ञानकी निवृत्ति और पुरुषप्रवृत्तिमें विरोध है। |
| न ह्युदासीनविज्ञानं प्रवृत्तिजनकम्, अब्रह्मानात्मविज्ञाननिवर्तकत्वाच्च "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) "तत्त्वमसि" (छा० उ० ६।८—१६) इत्येवमादिवाक्यानाम्। न च तन्निवृत्तौ प्रवृत्तिरुपपद्यते; विरोधात्। | |
| वाक्यजनितविज्ञानमात्रान्नाब्र- | पूर्व०-किन्तु वाक्यजनित विज्ञान- |