बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| ७६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
| ७६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| अनाकाशम्; भवतु तर्हि सङ्गात्मकं जतुवत्, असङ्गम्; रसोऽस्तु तर्हि, अरसम्; तथा गन्धोऽस्त्वगन्धम्; अस्तु तर्हि चक्षुः, अचक्षुष्कम्—न हि चक्षुरस्य करणं विद्यतेऽतोऽचक्षुष्कम्; “पश्यत्यचक्षुः” ( श्वेता० उ० ३ । १९ ) इति मन्त्रवर्णात् ।<br><br>तथाश्रोत्रम्; “स शृणोत्यकर्णः” (श्वेता० उ० ३ । १९) इति; भवतु तर्हि वागवाक्; तथाऽमनः; तथाऽतेजस्कम्—अविद्यमानं तेजोऽस्य तदतेजस्कम्; न हि तेजोऽग्न्यादिप्रकाशवदस्य विद्यते; अप्राणम्—आध्यात्मिको वायुः प्रतिषिध्यतेऽप्राणमिति; मुखं तर्हि द्वारं तदमुखम्; अमात्रम्—मीयते येन तन्मात्रम् अमात्रं मात्रारूपं तन्न भवति, न तेन किञ्चिन्मीयते; अस्तु तर्हिच्छिद्रवत्, अनन्तरम्—नास्यान्तरमस्ति; | होगा ? नहीं, अनाकाश है; तो फिर जतु ( लाक्षा ) के समान सङ्गवान् होगा ? नहीं, वह असङ्ग है; तो रस होगा ? नहीं, अरस है; अच्छा तो गन्ध होगा ? नहीं, अगन्ध है; तो फिर चक्षु होगा ? नहीं, अचक्षुष्क है; इसके चक्षु इन्द्रिय नहीं है; इसलिये यह अचक्षुष्क है; जैसा कि “यह चक्षुहीन होनेपर भी देखता है” इस मन्त्रवर्णसे प्रमाणित होता है।<br><br>इसी प्रकार “वह कर्णहीन होकर भी सुनता है” इस श्रुतिके अनुसार अश्रोत्र है; तो फिर वाक् होगा ? नहीं, अवाक् है; तथा अमन है और इसी प्रकार अतेजस्क जिसमें तेज नहीं है, ऐसा अतेजस्क, है, क्योंकि अग्नि आदिके प्रकाशके समान इसमें तेज नहीं है; अप्राण—ऐसा कहकर शरीरान्तर्गत वायुका प्रतिषेध किया जाता है, अतः अप्राण है। तो फिर वह मुख यानी द्वार है ? नहीं, वह अमुख है; वह अमात्र है, जिससे माप किया जाय उसे मात्र कहते हैं, वह अमात्र अर्थात् मात्रारूप नहीं है, उससे किसीका भी माप नहीं किया जाता; तो फिर वह छिद्रवान् होगा ? नहीं, वह अनन्तर है, उसमें अन्तर (छिद्र) नहीं है; तो फिर उसका |
ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७६९
ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७६९
| सम्भवेत् तर्हि बहिस्तस्य, अवाह्यम्; अस्तु तर्हि भत्तयितृ तत् न तदश्नाति किञ्चन; भवेत्तर्हि भक्ष्यं कस्यचित्, न तदश्नाति कश्चन; सर्वविशेषणरहितमित्यर्थः; एकमेवाद्वितीयं हि तत् केन किं विशिष्यते ॥ ८ ॥ | बाह्य तो सम्भव हो ही सकता है? नहीं, वह अबाह्य है, अच्छा तो वह भक्षण करनेवाला होगा? नहीं, वह कुछ भी नहीं खाता; तब वह स्वयं ही किसी दूसरेका भक्ष्य हो सकता है? नहीं; उसे कोई भी नहीं खाता; तात्पर्य यह है कि वह समस्त विशेषणोंसे रहित है; वह तो द्वितीयसे रहित अकेला ही है, फिर किससे किसको विशेषित किया जाय? ॥ ८ ॥ |
अनुमानप्रमाणद्वारा अक्षरका निरूपण
| अनेकविशेषणप्रतिषेधप्रयासादस्तित्वं तावदक्षरस्योपगमितं श्रुत्या; तथापि लोकबुद्धिमपेक्ष्या शङ्क्यते यतः, अतोऽस्तित्वायानुमानं प्रमाणमुपन्यस्यति— | श्रुतिने अनेक विशेषणोंके प्रतिषेधरूप प्रयासद्वारा तबतक उस अक्षरका अस्तित्व समझा दिया है; तो भी चूँकि लोकबुद्धिकी अपेक्षासे उसके अस्तित्वमें आशङ्का की जाती है, इसलिये इसके लिये अनुमान-प्रमाणका उल्लेख करती है— |
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि निमेषा मुहूर्ता अहोरात्राण्यर्धमासा मासा ऋतवः संवत्सरा इति विधृतास्तिष्ठन्त्येतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते श्वेतेभ्यः पर्वतेभ्यः प्रती-
बृ० उ० ४६—
७७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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च्योऽन्या यां यां च दिशमन्वेतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशꣳसन्ति यजमानं देवा दर्वी पितरोऽन्वायत्ताः ॥ ९ ॥
हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें सूर्य और चन्द्रमा विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं। हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें द्युलोक और पृथिवी विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं। हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें निमेष, मुहूर्त, दिन-रात, अर्धमास ( पक्ष ) मास, ऋतु और संवत्सर विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं। हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें पूर्ववाहिनी एवं अन्य नदियां श्वेत पर्वतोंसे बहती हैं तथा अन्य पश्चिमवाहिनी नदियां जिस-जिस दिशाको बहने लगती हैं, उसीका अनुसरण करती रहती हैं। हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें मनुष्य दाताकी प्रशंसा करते हैं तथा देवगण यजमानका और पितृगण दर्वीहोमका अनुवर्तन करते हैं ॥ ९ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाषानुवाद |
|---|---|
| एतस्य वा अक्षरस्य; यदेतदधिगतमक्षरं सर्वान्तरं साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म, य आत्मा अशनायादिधर्मातीतः, एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने— यथा राज्ञः प्रशासने राज्यमस्फुटितं नियतं वर्तते, एवमेतस्याक्षरस्य प्रशासने हे गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ, सूर्यश्च चन्द्रमाश्च सूर्याचन्द्रमसौ अहोरात्रयोर्लोकप्रदीपौ, तादर्थ्येन प्रशासित्रा ताभ्यां निर्वर्त्यमानलोकप्रयोजनविज्ञान- | 'एतस्य वा अक्षरस्य' इत्यादि; यह जो सर्वान्तर साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्मरूप अक्षर जाना गया है, जो क्षुधादि धर्मोंसे रहित आत्मा है, हे गार्गि ! इस अक्षरके प्रशासनमें— जैसे कि राजाके प्रशासनमें राज्य अखण्ड और नियमितरूपसे रहता है, इसी प्रकार इस अक्षरके प्रशासनमें सूर्याचन्द्रमसौ— सूर्य और चन्द्र, जो दिन और रातके समय लोकके दीपक ही हैं और जिन्हें उनके द्वारा सिद्ध होनेवाले लोकके प्रयोजनको जाननेवाले शासनकर्ताने उस उद्देश्यकी पूर्तिका |
ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७१
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-भाष्यार्थ |
|---|---|
| वता निर्मितौ च, स्यातां साधारणसर्वप्राणिप्रकाशोपकारकत्वान्लौकिकप्रदीपवत् । तस्मादस्ति तद् येन विधृतावीश्वरौ स्वतन्त्रौ सन्तौ निर्मितौ तिष्ठतो नियतदेशकालनिमित्तोदयास्तमयवृद्धिक्षयाभ्यां वर्तेते; तदस्त्येवमेतयोः प्रशासित्रक्षरम्, प्रदीपकर्तृविधारयितृवत् । | लिये रचा है, साधारणतया समस्त प्राणियोंका प्रकाशरूप उपकार करनेवाले होनेसे लौकिक दीपकोंके समान धारण किये हुए स्थित हैं। अतः ये दोनों (सूर्य और चन्द्र) स्वतन्त्र ईश्वर होनेपर भी जिसके द्वारा निर्मित और विधृत होकर नियत देश, काल और [प्राणियोंके अदृष्टरूप] निमित्तसे उदय-अस्त एवं वृद्धि-क्षयको प्राप्त होते हुए विद्यमान रहते हैं, वह अक्षर है तथा इस प्रकार वह अक्षर दीपकके कर्ता और विधारयिताके समान इन दोनोंका प्रशासनकर्ता है। |
| एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ द्यौश्च पृथिवी च सावयवत्वात् स्फुटनस्वभावे अपि सत्यौ गुरुत्वात् पतनस्वभावे संयुक्तत्वाद् वियोगस्वभावे चेतनावदभिमानिदेवताधिष्ठितत्वात् स्वतन्त्रे अपि एतस्याक्षरस्य प्रशासने वर्तेते विधृते तिष्ठतः; एतद्ध्यक्षरं सर्वव्यवस्थासेतुः सर्वमर्यादाविधारणम्, अतो नास्याक्षरस्य प्र- | **हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें 'द्यावापृथिव्यौ'—**द्युलोक और पृथिवी सावयव होनेके कारण फूटनेके स्वभाववाले, भारी होनेके कारण गिरनेके स्वभाववाले, संयुक्त होनेके कारण वियुक्त होनेके स्वभाववाले और चेतनावान् अभिमानी देवतासे अधिष्ठित होनेके कारण स्वतन्त्र होनेपर भी इस अक्षरके प्रशासनमें विधृत होकर स्थित हैं। यह अक्षर ही समस्त व्यवस्थाओंका सेतु—समस्त मर्यादाओंका विधारक है; अतः द्युलोक और पृथिवी इसके |
७७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ७७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| शासनं द्यावापृथिव्यावतिक्रामतः; तस्मात् सिद्धमस्यास्तित्वमक्षरस्य अव्यभिचारि हि तल्लिङ्गम्, यद् द्यावापृथिव्यौ नियते वर्तेते; चेतनावन्तं प्रशासितारमसंसारिणमन्तरेण नैतद् युक्तम् । “येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा” इति मन्त्रवर्णात् । | प्रशासनका अतिक्रमण नहीं कर सकते; इससे इस अक्षरका अस्तित्व सिद्ध होता है; द्युलोक और पृथिवी इसके द्वारा नियमित होकर विद्यमान हैं—यह इसकी सत्ताका अव्यभिचारी लिङ्ग है; क्योंकि किसी चेतनावान् असंसारी शासकके बिना ऐसा होना सम्भव नहीं है; जैसा कि “जिसके द्वारा द्युलोक उग्र और पृथिवी दृढ की गयी है” इत्यादि मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है। | | एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि, निमेषा मुहूर्ता इत्येते कालावयवाः सर्वस्य अतीतानागतवर्तमानस्य जनिमतः कलयितारः—यथा लोके प्रभुना नियतो गणकः सर्वमायं व्ययं चाप्रमत्तो गणयति, तथा प्रभुस्थानीय एषां कालावयवानां नियन्ता । | हे गार्गि! इस अक्षरके प्रशासनमें ही निमेष, मुहूर्त इत्यादि कालके अवयव उत्पन्न होनेवाले समस्त अतीत और अनागत पदार्थोंकी कलना (गणना) करनेवाले हैं; जिस प्रकार लोकमें स्वामीके द्वारा नियुक्त किया हुआ गणक (मुनीम) प्रमादशून्य रहकर समस्त आय और व्ययकी गणना करता है, उसी प्रकार इन कालावयवोंका नियन्ता भी इनका प्रभुरूप है। | | तथा प्राच्यः प्रागञ्चनाः पूर्वदिग्गमना नद्यः स्यन्दन्ते स्रवन्ति श्वेतेभ्यो हिमवदादिभ्यः पर्वतेभ्यो गिरिभ्यो गङ्गाद्या नद्यस्ताश्च यथा | इसी तरह हिमालय आदि श्वेत पर्वतोंसे निकलनेवाली प्राच्य-पूर्वकी ओर बहनेवाली अर्थात् पूर्व-दिशाकी ओर गमन करनेवाली गङ्गा आदि नदियाँ, अन्य दिशामें प्रवृत्त होनेका |
ब्राह्मण ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७७३
ब्राह्मण ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७७३
| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | भाष्यार्थ |
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| प्रवर्तिता एव नियताः प्रवर्तन्तेऽन्यथापि प्रवर्तितुमुत्सहन्त्यः; तदेतल्लिङ्गं प्रशास्तुः । प्रतीच्योऽन्याः प्रतीचीं दिशमश्वन्ति सिन्ध्वाद्या नद्यः; अन्याश्च यां यां दिशमनुप्रवृत्तास्तां तां न व्यभिचरन्ति; तच्च लिङ्गम् । | सामर्थ्य होनेपर भी, जिस ओर नियुक्त कर दी गयी हैं, उसी ओर प्रवृत्त रहती हैं, यह भी उस प्रशासनकर्ताकी सत्ताका लिङ्ग है । तथा अन्य सिन्धु आदि नदियाँ प्रतीच्य-प्रतीची (पश्चिम) दिशाको बहती हैं । अन्य नदियाँ भी जिस-जिस दिशामें अनुप्रवृत्त कर दी गयी हैं, उस-उसको नहीं छोड़तीं; यह भी उस अक्षर प्रशासताके अस्तित्वका लिङ्ग है । |
| किञ्च ददतो हिरण्यादीन् प्रयच्छत आत्मपीडां कुर्वतोऽपि प्रमाणज्ञा अपि मनुष्याः प्रशंसन्ति; तत्र यच्च दीयते, ये च ददति, ये च प्रतिगृह्णन्ति, तेषामिहैव समागमो विलयश्चान्वक्षो दृश्यते; अदृष्टस्तु परः समागमः; तथापि मनुष्या ददतां दानफलेन संयोगं पश्यन्तः प्रमाणज्ञतया प्रशंसन्ति; तच्च, कर्मफलेन संयोजयितरि कर्तुः कर्मफलविभागज्ञे प्रशास्तर्यसति न स्यात्; दानक्रियायाः प्रत्यक्षविनाशित्वात्; | इसके सिवा अपनेको कष्ट देकर भी दान करनेवाले-सुवर्णादि देनेवाले पुरुषकी भी प्रमाणज्ञजन प्रशंसा करते हैं; सो जो कुछ दिया जाता है, जो देते हैं और जो ग्रहण करते हैं, उनका यहीं मिलना और बिछुड़ना प्रत्यक्ष देखा जाता है; पारलौकिक समागम तो अदृष्ट है; तो भी दानीका दानके फलसे संयोग देखनेवाले पुरुष प्रमाणके ज्ञाता होनेके कारण उनकी प्रशंसा करते हैं; किंतु यह बात कर्मफलसे संयोग करानेवाले कर्ता और कर्मफलके ज्ञाता प्रशासताकी सत्ता न होनेपर होनी सम्भव नहीं थी, क्योंकि दानक्रिया तो प्रत्यक्ष विनाशिनी है । |
७७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| तस्मादस्ति दानकर्तॄणां फलेन संयोजयिता । | अतः दानकर्ताओंका फलसे संयोग करानेवाला कोई है ही। |
|---|---|
| अपूर्वमिति चेत् ? | **पूर्व०—**यदि कहें कि अपूर्व ही फलदाता है तो ? |
| न, तत्सद्भावे प्रमाणानुपपत्तेः | **सिद्धान्ती—**नहीं, क्योंकि उसकी सत्तामें कोई प्रमाण नहीं है। |
| प्रशास्तुरपीति चेत् । | **पूर्व०—**सो तो प्रशास्ताकी सत्तामें भी नहीं है ? |
| न, आगमतात्पर्यस्य सिद्धत्वात्; अवोचाम ह्यागमस्य वस्तुपरत्वम् । किञ्चान्यत्, अपूर्वकल्पनायां चार्थपत्तेः क्षयोऽन्यथैवोपपत्तेः। सेवाफलस्य सेव्यात् प्राप्तिदर्शनात्। सेवायाश्च क्रियात्वात्, तत्सामान्याच्च यागदानहोमादीनां सेव्याद् ईश्वरादेः फलप्राप्तिरुपपद्यते दृष्टक्रियाधर्मसामर्थ्यमपरित्यज्यैव | **सिद्धान्ती—**नहीं, उसमें तो शास्त्रका तात्पर्य सिद्ध हो चुका है; हम शास्त्रका आत्मवस्तुपरत्व प्रतिपादन कर चुके हैं; इसके सिवा एक बात और भी है—अपूर्वकी कल्पना करनेमें जिस अर्थापत्तिका आश्रय लिया जाता है, उसका क्षय तो अन्यथा उपपत्ति ( दूसरे प्रकारसे भी फलकी सिद्धि ) होनेसे ही हो जाता है, क्योंकि सेवाके फलकी प्राप्ति सेव्यसे होती देखी जाती है; सेवा क्रिया है, अतः उसीके समान होनेके कारण याग, दान और होमादिके फलकी प्राप्ति भी ईश्वरादि सेव्योंसे ही होनी उचित है। क्रियाधर्मके दृष्टसामर्थ्य- |
१ जहाँ अन्यथा अनुपपत्ति होती हो अर्थात् किसी एक वस्तु या सिद्धान्तको माने बिना काम न चलता हो, सङ्गति न लगती हो, वहाँ ही 'अर्थापत्ति' स्वीकार की जाती है; जैसे यज्ञादि क्रिया तो इस लोकमें ही समाप्त हो जाती है, कालान्तरमें मिलनेवाले स्वर्गादि फलका सम्बन्ध उस क्रियाके साथ क्योंकर माना जा सकता है ? क्रिया तो नष्ट हो चुकी है, वह है ही कहाँ जो फल दे सके ?
ब्राह्मण ८] शाङ्करभाष्यार्थ ७७५
ब्राह्मण ८] शाङ्करभाष्यार्थ ७७५
| फलप्राप्तिकल्पनोपपत्तौ दृष्टक्रियाधर्मसामर्थ्यपरित्यागो न न्याय्यः।<br><br>कल्पनाधिक्याच्च; ईश्वरः कल्प्योऽपूर्वं वा ? तत्र क्रियायाश्च स्वभावः सेव्यात् फलप्राप्तिर्दृष्टा न त्वपूर्वात्; न चापूर्वं दृष्टम्; तत्रापूर्वमदृष्टं कल्पयितव्यं तस्य च फलदातृत्वे सामर्थ्यम्, सामर्थ्ये च सति दानं चाभ्यधिकमिति। इह तु ईश्वरस्य सेव्यस्य सद्भावमात्रं कल्प्यम्, न तु फलदानसामर्थ्यं | को बिना त्यागे ही यदि फलप्राप्तिकी कल्पना उत्पन्न हो सकती है तो उस दृष्टक्रियाधर्मसामर्थ्यका त्याग करना युक्तियुक्त नहीं है।<br><br>इसके सिवा अपूर्वकी कल्पना करनेमें कल्पनाधिक्यका दोष भी होता है; विचार करो कि ईश्वरकी कल्पना करनी चाहिये या अपूर्वकी। किंतु क्रियाका स्वभाव तो सेव्यसे फल-प्राप्ति होना देखा गया है, अपूर्वसे नहीं और अपूर्व दृष्ट भी नहीं है। अतः उस पक्षमें अदृष्ट अपूर्वकी कल्पना करनी पड़ती है और उसमें फल-प्रदान करनेके सामर्थ्यकी भी। इस प्रकार सामर्थ्य स्वीकार करनेपर दानकी अधिक कल्पना की जाती है। किंतु इस पक्षमें केवल सेव्य ईश्वरकी सत्तामात्रहीकी कल्पना की जाती है, उसके फलदानके सामर्थ्य और |
इस प्रकार फलसिद्धिमें अनुपपत्ति देखकर मीमांसक लोग क्रियासे अपूर्वकी उत्पत्ति मानते हैं; वह अपूर्व ही कालान्तरमें स्वर्गादि फलका जनक होता है।
भाष्यकार अर्थापत्तिका खण्डन करते हुए कहते हैं—अन्यथा अनुपपत्ति हो तो 'अपूर्व स्वीकार करनेमें' हर्ज नहीं मगर यहाँ तो अन्यथा भी उपपत्ति हो जाती है, अपूर्व स्वीकार किये बिना भी क्रियाके फलकी सिद्धिमें कोई बाधा नहीं आती। जैसे सेवा एक क्रिया है, उसका मूल्य लोकमें स्वामी चुकाता है, उसी प्रकार दान और यज्ञ भी क्रिया हैं, इनका फल भी लौकिक स्वामीकी भाँति सेव्य परमेश्वर ही विचारकर दे सकते हैं। इस प्रकार अर्थापत्तिका यहाँ क्षय हो जाता है, क्योंकि यहाँ अन्यथा भी फलकी उपपत्ति (सिद्धि) होती है। ईश्वरको न मानकर अपूर्वकी कल्पनामें जो दोष आते हैं, उनको भाष्यकारने आगे भाष्यमें बताया है।
७७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| दातृत्वं च, सेव्यात् फलप्राप्ति-दर्शनात् । अनुमानं च दर्शितम्—'द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठतः' इत्यादि ।<br><br>तथा च यजमानं देवा ईश्वराः सन्तो जीवनार्थेऽनुगताः, चरु-पुरोडाशाद्युपजीवनप्रयोजनेन, अन्यथापि जीवितुमुत्सहन्तः कृपणां दीनां वृत्तिमाश्रित्य स्थिताः, तच्च प्रशास्तुः प्रशासनात् स्यात् । तथा पितरोऽपि तदर्थं दर्वी दर्वीहोममन्वायत्ता अनुगता इत्यर्थः; समानं सर्वमन्यत् ॥ ९ ॥ | दातृत्वकी नहीं; क्योंकि सेव्यसे फलप्राप्ति होती देखी ही गयी है। इस विषयमें 'द्युलोक और पृथिवी धारण किये हुए स्थित हैं'—इत्यादि-रूपसे अनुमान भी दिखाया गया है।<br><br>इसी प्रकार देवगण समर्थ होने पर भी जो जीवनके लिये—चरुपुरो-डाशादिके आश्रय जीवनयापनके प्रयोजनसे यजमानके अनुगत रहते हैं, अर्थात् अन्य प्रकारसे जीवित रहनेमें समर्थ होनेपर भी वे जो इस कृपण-दीन वृत्तिको आश्रित करके स्थित रहते हैं, यह भी उस प्रशा-स्ताके प्रशासनसे ही होना सम्भव है। इसी प्रकार पितृगण भी जीविकाके लिये दर्वीके अर्थात् पितरोंके उद्देश्यसे किये जानेवाले दर्वीहोमके अन्वायत्त-अनुगत हैं। शेष सब इसीके समान समझना चाहिये ॥ ६ ॥ |
अक्षरके ज्ञान और अज्ञानके परिणाम
| इतश्चास्ति तदक्षरं यस्मात्तदज्ञाने नियता संसारोपपत्तिः । भवितव्यं तु तेन, यद्विज्ञानात् तद्विच्छेदः, न्यायोपपत्तेः । ननु क्रियात एव | इस अक्षरकी सत्ता इसलिये भी है; क्योंकि इसके अज्ञानसे ही नियमतः संसारकी उपपत्ति हो सकती है। जिसके विज्ञानसे उस (संसार) का विच्छेद हो सकता है, वह वस्तु होनी ही चाहिये क्योंकि यही न्यायोचित है। यदि |
ब्राह्मण ८] शाङ्करभाष्यार्थ ७७७
ब्राह्मण ८] शाङ्करभाष्यार्थ ७७७
| तद्विच्छित्तिः स्यादिति चेत् ?<br><br>न— | कहो कि उसका विच्छेद कर्मसे ही हो जायगा तो ऐसा कहना उचित नहीं [क्योंकि—] |
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यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्मिँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद् भवति यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात् प्रैति स कृपणोऽथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः ॥ १० ॥
हे गार्गि ! जो कोई इस लोकमें इस अक्षरको न जानकर हवन करता, यज्ञ करता और अनेकों सहस्र वर्षपर्यन्त तप करता है, उसका वह सब कर्म अन्तवान् ही होता है। जो कोई भी इस अक्षरको बिना जाने इस लोकसे मरकर जाता है, वह कृपण (दीन) है और हे गार्गि ! जो इस अक्षरको जानकर इस लोकसे मरकर जाता है, वह ब्राह्मण है ॥ १० ॥
| यो वा एतदक्षरं हे गार्गि अविदित्वाविज्ञाय अस्मिँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते यद्यपि बहूनि वर्षसहस्राणि, अन्तवद् एवास्य तत् फलं भवति, तत्फलोपभोगान्ते क्षीयन्त एवास्य कर्माणि। अपि च यद्विज्ञानात् कार्पण्यात्ययः संसारविच्छेदः, यद्विज्ञानाभावाच्च कर्मकृत् कृपणः कृतफलस्यैवोपभोक्ता जननमरणप्रबन्धारूढः संसरति, तदस्यत्यक्षरं | हे गार्गि ! इस लोकमें जो कोई इस अक्षरको न जानकर अर्थात् बिना जाने हवन, यज्ञ और अनेकों सहस्र वर्षपर्यन्त तप भी करता है तो उसका वह फल अन्तवान् ही होता है; उस फल-भोगके पश्चात् इसके कर्म क्षीण हो ही जाते हैं। इसके सिवा जिसके विज्ञानसे कृपणताका अतिक्रमण और संसारका विच्छेद होता है तथा जिसका विज्ञान न होनेसे कर्मकर्त्ता कृपण, किये हुए कर्मके फलका ही उपभोग करनेवाला और जन्म-मरणकी परम्परापर आरूढ होकर संसारबन्धनको प्राप्त होता है, वह अक्षर ही |
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७७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| प्रशासितृ; तदेतदुच्यते—यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वा अस्माल्लोकात् प्रैति स कृपणः, पणक्रीत इव दासादिः। अथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वा अस्माल्लोकात् प्रैति स ब्राह्मणः ॥ १० ॥ | प्रशास्ता है। इसीसे यह कहा जाता है-हे गार्गि! जो भी इस अक्षरको बिना जाने इस लोकसे मरकर जाता है, वह पैसोंसे खरीदे हुए गुलाम आदिकी तरह कृपण (दीन) है। और हे गार्गि! जो कोई इस अक्षरको जानकर इस लोकसे मरकर जाता है, वह ब्राह्मण है ॥१०॥ |
अक्षरका स्वरूप, लक्षण और अद्वितीयत्व
| अग्नेर्दहनप्रकाशकत्ववत् स्वाभाविकमस्य प्रशास्तृत्वमचेतनस्यैवेत्यत आह— | [ प्रधानवादीका कथन है कि ] अग्निके दहन और प्रकाशकत्वके समान यह अचेतन ही स्वाभाविक शासन करनेवाला है, इसीसे याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— |
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तद् वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतँ श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रे तस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ११॥
हे गार्गि ! यह अक्षर स्वयं दृष्टिका विषय नहीं, किंतु द्रष्टा है, श्रवणका विषय नहीं, किंतु श्रोता है, मननका विषय नहीं, किंतु मन्ता है, स्वयं अविज्ञात रहकर दूसरोंका विज्ञाता है। इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है, इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है, इससे भिन्न कोई मन्ता नहीं है, इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं है। हे गार्गि ! निश्चय इस अक्षरमें ही आकाश ओतप्रोत है ॥ ११ ॥
| तद् वा एतदक्षरं गार्गि अदृष्टं<br><br>न केनचिद् दृष्टम्, अविषयत्वात् | हे गार्गि ! वह यह अक्षर अदृष्ट है, दृष्टिका विषय न होनेके कारण वह किसीके द्वारा देखा नहीं गया है, किंतु |
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ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७९
ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७९
| संस्कृत (मूल/भाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| स्वयं तु द्रष्टृ दृष्टिस্বরূপत्वात् । तथा श्रुतं श्रोत्राविषयत्वात्, स्वयं श्रोतॄ श्रुतिस्वरूपत्वात् । तथामतं मनसोऽविषयत्वात्, स्वयं मन्तृ मतिस्वरूपत्वात् । तथाविज्ञातं बुद्धेरविषयत्वात्, स्वयं विज्ञातृ विज्ञानस्वरूपत्वात् । | स्वयं दृष्टिस্বরূপ होनेके कारण द्रष्टा है। इसी प्रकार यह श्रोत्रका अविषय होनेके कारण सुना नहीं गया है, किंतु स्वयं श्रुतिस्वरूप होनेसे श्रोता है। तथा मनका अविषय होनेके कारण यह मननका विषय नहीं होता, किंतु स्वयं मतिस्वरूप होनेसे मन्ता है। इसी तरह बुद्धिका अविषय होनेके कारण विज्ञात नहीं है; किंतु स्वयं विज्ञानस्वरूप होनेसे विज्ञाता है। |
| किञ्च 'नान्यदतोऽस्मादक्षरादस्ति—नास्ति किञ्चिद् द्रष्टृ दर्शनक्रियाकर्तृ; एतदेवाक्षरं दर्शनक्रियाकर्तृ सर्वत्र । तथा नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ; तदेवाक्षरं श्रोतृ सर्वत्र । नान्यदतोऽस्ति मन्तृ; तदेवाक्षरं मन्तृ सर्वत्र सर्वमनोद्वारेण । नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ विज्ञानक्रियाकर्तृ, तदेवाक्षरं सर्वबुद्धिद्वारेण विज्ञानक्रियाकर्तृ, नाचेतनं प्रधानमन्यद् वा । | यही नहीं, इस अक्षरसे भिन्न कोई द्रष्टा—दर्शन-क्रियाका कर्ता भी नहीं है; यह अक्षर ही सर्वत्र दर्शन-क्रियाका कर्ता है; इसी प्रकार इससे भिन्न कोई श्रोता भी नहीं है; यह अक्षर ही सर्वत्र श्रोता है। इससे भिन्न कोई मन्ता भी नहीं है; सम्पूर्ण मनोंके द्वारा सर्वत्र वह अक्षर ही मनन करनेवाला है और न इससे भिन्न कोई विज्ञाता—विज्ञान—क्रियाका कर्ता है, समस्त बुद्धियोंके द्वारा वह अक्षर ही विज्ञान क्रियाका कर्ता है—अचेतन प्रधान अथवा कोई अन्य नहीं। |
| एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति । यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म, य आत्मा सर्वान्तरोऽशनायादि संसारधर्मातीतः, यस्मिन्नाकाश ओतश्च प्रोत- | हे गार्गि ! निश्चय इस अक्षरमें ही आकाश ओतप्रोत है। जो ही साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, जो क्षुधादि संसारधर्मोंसे अतीत सर्वान्तर आत्मा है और जिसमें आकाश ओतप्रोत |
७८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| श्च, एषा परा काष्ठा, एषा परा गतिः, एतत् परं ब्रह्म, एतत् पृथिव्यादेराकाशान्तस्य सत्यस्य सत्यम् ॥ ११ ॥ | है, वह ( यह अक्षर ) ही पराकाष्ठा है, यह परा गति है, यह परब्रह्म है और यही पृथिवीसे लेकर आकाशपर्यन्त समस्त सत्यका सत्य है ॥ ११ ॥ |
गार्गीका निर्णय
सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्येध्वं यदस्माननमस्कारेण मुच्येध्वं न वै जातु युष्माकमिमं कश्चिद् ब्रह्मोद्यं जेतेति ततो ह वाचकनव्युपरराम ॥ १२ ॥
उस गार्गीने कहा, 'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपलोग इसीको बहुत मानें कि इन याज्ञवल्क्यजीसे आपको नमस्कारद्वारा ही छुटकारा मिल जाय। आपमेंसे कोई भी कभी इन्हें ब्रह्मविषयक वादमें जीतनेवाला नहीं है।' तदनन्तर वचक्नुकी पुत्री गार्गी चुप हो गयी ॥ १२ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| सा होवाच— हे ब्राह्मणा भगवन्तः शृणुत मदीयं वचः; तदेव बहु मन्येध्वम्; किं तत् ? यदस्माद् याज्ञवल्क्यान्नमस्कारेण मुच्येध्वम्— अस्मै नमस्कारं कृत्वा तदेव बहु मन्यध्वमित्यर्थः; जयस्त्वस्य मनसापि न आशंसनीयः, किमुत कार्यतः; कस्मात् ? न वै युष्माकं मध्ये जातु कदाचिदपीमं याज्ञवल्क्यं ब्रह्मोद्यं प्रति जेता । | वह बोली, 'हे भगवन् (पूजनीय) ब्राह्मणो ! मेरी बात सुनो; तुमलोग इसीको बहुत समझो; सो किसको ? यही कि तुम इन याज्ञवल्क्यजीसे नमस्कारके द्वारा ही मुक्त हो जाओ अर्थात् यदि इन्हें नमस्कार करके ही छुटकारा पा जाओ तो इसीको बहुत मानो; इनको जीतनेकी तो मनसे भी आशा नहीं करनी चाहिये, कार्यद्वारा जीतनेकी तो बात ही क्या है? क्यों ? क्योंकि आपमेंसे कोई भी कभी इन याज्ञवल्क्यजीको ब्रह्मसम्बन्धी वादमें जीतनेवाला नहीं है। |
ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७८१
ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७८१
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| प्रश्नौ चेन्मह्यं वक्ष्यति, न जेता भवितेति पूर्वमेव मया प्रतिज्ञातम्; अद्यापि ममायमेव निश्चयः—ब्रह्मोद्यं प्रत्येतेत्तुल्यो न कश्चिद् विद्यत इति। ततो ह वाचक्नव्युपरराम। | मैं पहले ही प्रतिज्ञा कर चुकी हूँ कि यदि ये मेरे दो प्रश्नोंका उत्तर दे देंगे तो आपमेंसे कोई भी विजयी नहीं होगा। आज भी मेरा यही निश्चय है कि ब्रह्मसम्बन्धी वादमें इनके समान कोई नहीं है।' तदनन्तर वचक्नुकी पुत्री गार्गी चुप हो गयी। |
| अत्र अन्तर्यामिब्राह्मणे एतद् प्रकरणार्थ-परामर्श उक्तम्—यं पृथिवी न वेद, यं सर्वाणि भूतानि न विदुरिति च। यमन्तर्यामिणं न विदुर्यं च न विदुर्यच्च तदक्षरं दर्शनादिक्रियाकर्तृत्वेन सर्वेषां चेतनाधातुरित्युक्तम्—कस्त्वेषां विशेषः, किं वा सामान्यमिति। | यहाँ अन्तर्यामिब्राह्मणमें यह कहा गया था कि जिसे पृथिवी नहीं जानती तथा जिसे सम्पूर्ण भूत नहीं जानते इत्यादि। इस प्रकार जिस अन्तर्यामीको नहीं जानते, जो नहीं जानते और जो वह अक्षर है, जिसे समस्त विषयोंकी दर्शनादिक्रियाओंके कर्तारूपसे सबकी चेतनाका धातु कहा गया है-इन सबमें क्या अन्तर है और क्या समानता है? |
| तत्र केचिदाचक्षते—परस्य महासमुद्रस्थानीयस्य ब्रह्मणोऽक्षरस्य अप्रचलितस्वरूपस्येषत्प्रचलितावस्थान्तर्यामी; अत्यन्तप्रचलितावस्था क्षेत्रज्ञः, यस्तं न वेदान्तर्यामिणम्; तथान्याः पञ्चावस्थाः परिकल्पयन्ति; तथा अष्टावस्था ब्रह्मणो भवन्तीति वदन्ति। | यहाँ कोई-कोई कहते हैं-महासमुद्रस्थानीय अविचलरूप अक्षर परब्रह्मकी किञ्चिद् विचलित अवस्थाका नाम अन्तर्यामी है और उसकी अत्यन्त विचलित अवस्था क्षेत्रज्ञ है, जो कि उस अन्तर्यामीको नहीं जानता; इनके सिवा वे उसकी [ पिण्ड, जाति, विराट्, सूत्र और दैव-इन ] अन्य पाँच अवस्थाओंकी भी कल्पना करते हैं; इस प्रकार वे कहते हैं कि ब्रह्मकी कुल आठ अवस्थाएँ हैं। |
| ७८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
| ७८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| अन्येऽक्षरस्य शक्तय एता इति वदन्ति, अनन्तशक्तिमदक्षरमिति च । अन्ये त्वक्षरस्य विकारा इति वदन्ति । अवस्थाशक्ती तावन्नोपपद्येते अक्षरस्य, अशनायादिसंसारधर्मातीतत्वश्रुतेः । न ह्यशनायाद्यतीतत्वमशनायादिधर्मवदवस्थावत्त्वं चैकस्य युगपदुपपद्यते; तथा शक्तिमत्त्वं च । विकारावयवत्वे च दोषाः प्रदर्शिताश्चतुर्थे । तस्मादेता असत्याः सर्वाः कल्पनाः ।<br><br>कस्तर्हि भेद एषाम् ? उपाधिकृत इति ब्रूमः; न स्वत एषां भेदोऽभेदो वा, सैन्धवघनवत् प्रज्ञानघनैकरसस्वाभाव्यात्, “अपूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्” (बृ० उ० २।५।१९) “अयमात्मा ब्रह्म” (२।५।१९) इति च श्रुतेः । “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु० उ० २।१।२) इति | इनसे भिन्न दूसरे लोग ऐसा कहते हैं कि ये अक्षरकी शक्तियां हैं; और उनका यह भी कथन है कि वह अक्षर अनन्त शक्तिमान् है। इनके सिवा दूसरे लोग यह कहते हैं कि ये अक्षरके विकार हैं। किंतु इनका अक्षरकी अवस्था या शक्ति होना तो सम्भव नहीं है, क्योंकि वह क्षुधादि संसारधर्मोंसे अतीत है—ऐसी श्रुति है। एक ही वस्तुका एक साथ क्षुधादि धर्मोंसे अतीत होना और क्षुधादि धर्मवाली अवस्थाओंसे युक्त होना सम्भव नहीं है; इसी प्रकार उसका शक्तिमान् होना भी असम्भव है। उसके विकार या अवयव माननेमें जो दोष हैं, वे चतुर्थ ब्राह्मणमें दिखाये जा चुके हैं। इसलिये ये सारी कल्पनाएँ असत्य हैं।<br><br>तो फिर इनका भेद क्या है ? हमारा कथन है कि इनका भेद उपाधिकृत है। स्वयं तो इनका भेद या अभेद कुछ भी नहीं है, क्योंकि ये सैन्धवघनके समान एकमात्र प्रज्ञानघनरसस्वरूप हैं। जैसा कि “वह कारणसे भिन्न, कार्यसे भिन्न अन्तररहित और अबाह्य है” “यह आत्मा ब्रह्म है” इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है तथा “वह बाहर-भीतरके सहित सर्वत्र विद्यमान एवं अजन्मा है” ऐसा आथर्वण |
ब्राह्मण ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८३
| ब्राह्मण ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८३ |
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| संस्कृत-मूल (भाष्य) | हिन्दी-भाष्यार्थ |
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| चाथर्वणे । तस्मान्निरुपाधिकस्यात्मनो निरूपाख्यत्वान्निर्विशेषत्वादेकत्वाच्च “नेति नेति” ( बृ० उ० ३ । ९ । २६) इति व्यपदेशो भवति । | श्रुतिमें कहा है। अतः उपाधिशून्य आत्मा अनिर्वचनीय, निर्विशेष और एक होनेके कारण उसका “नेति नेति” इस प्रकार उपदेश किया जाता है । |
| अविद्याकामकर्मविशिष्टकार्यकरणोपाधिरात्मा संसारी जीव उच्यते । नित्यनिरतिशयज्ञानशक्त्युपाधिरात्मान्तर्यामीश्वर उच्यते, स एव निरुपाधिः केवलः शुद्धः स्वेन स्वभावेनाक्षरं पर उच्यते, तथा हिरण्यगर्भाव्याकृतदेवताजातिपिण्डमनुष्यतिर्यक्प्रेतादिकार्यकरणोपाधिभिर्विशिष्टस्तदाख्यस्तद्रूपो भवति । तथा “तदेजति तन्नैजति” (ईशा० उ० ५) इति व्याख्यातम् । तथा “एष त आत्मा” (बृ० उ० ३ । ७ । ३–२३) “एष सर्वभूतान्तरात्मा” (मु० उ० २ । १ । ४) “एष सर्वेषु भूतेषु गूढः” (क० उ० १ । ३ । १२) “तत्त्वमसि” (छा० उ० ६।८।१६) “अहमेवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । १) “आत्मैवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । २) “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” (बृ० उ० ३ । ७ । २३) इत्यादिश्रुतयो न विरुध्यन्ते। कल्पनान्तरेष्वेताः श्रुतयो न | अविद्या, काम और कर्मविशिष्ट देह एवं इन्द्रियरूप उपाधिवाला आत्मा संसारी जीव कहा जाता है । तथा नित्य निरतिशय ज्ञानशक्तिरूप उपाधिवाला आत्मा अन्तर्यामी ईश्वर कहा जाता है । वही उपाधिशून्य, केवल और शुद्ध होनेपर अपने स्वरूपसे अक्षर या पर कहा जाता है, तथा हिरण्यगर्भ, अव्याकृत, देवता, जाति, पिण्ड, मनुष्य, तिर्यक्, प्रेत एवं शरीर और इन्द्रियरूप उपाधियोंसे विशिष्ट होकर वह उन्हीं नाम और रूपोंवाला होता है । ऐसा ही “वह चलता है, वह नहीं चलता” इत्यादि श्रुतिमें व्याख्या किया गया है और इस प्रकार “यह तेरा आत्मा”, “यह समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है”, “यह समस्त भूतोंमें छिपा हुआ है”, “वह तू है”, “मैं ही यह सब हूँ”, “यह सब आत्मा ही है”, “इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है” इत्यादि श्रुतियोंसे विरोध नहीं रहता । दूसरे प्रकारकी कल्पनाओंमें इन श्रुतियोंकी संगति नहीं लगती । |
७८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| गच्छन्ति । तस्मादुपाधिभेदेनैव एषां भेदो नान्यथा । 'एकमेवाद्वितीयम्' इत्यवधारणात् सर्वोपनिषत्सु ॥ १२ ॥ | अतः उपाधिके भेदसे ही इनमें भेद है, और किसी प्रकार नहीं; क्योंकि समस्त उपनिषदोंमें यही निश्चय किया गया है कि 'ब्रह्म एकमात्र अद्वितीय ही है' ॥ १२ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्यायेऽष्टममक्षरब्राह्मणम् ॥ ८ ॥
नवम ब्राह्मण
याज्ञवल्क्य-शाकल्य-संवाद
| अथ हैनँ विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ । पृथिव्यादीनां सूक्ष्मतारतम्यक्रमेण पूर्वस्य पूर्वस्य उत्तरस्मिन्नुत्तरस्मिन्नोतप्रोतभावं कथयन् सर्वान्तरं ब्रह्म प्रकाशितवान्, तस्य च ब्रह्मणो व्याकृतविषये सूत्रभेदेषु नियन्तृत्वमुक्तम्—व्याकृतविषये व्यक्ततरं लिङ्गमिति । तस्यैव ब्रह्मणः साक्षादपरोक्षत्वे नियन्तव्यदेवताभेदसंकोचविका- | 'अथ हैनँ विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ' । पृथिवी आदिके सूक्ष्मतारतम्यक्रमसे पूर्व-पूर्व पदार्थका उत्तरोत्तरवर्ती पदार्थमें ओत-प्रोतभाव बतलाते हुए याज्ञवल्क्यने सर्वान्तर ब्रह्मको प्रकाशित किया है । और उस ब्रह्मका, नाम-रूपात्मक द्वैत-प्रपञ्चमें जो पृथिवी आदि भिन्न-भिन्न सूत्र हैं, उनमें नियन्तृत्व बतलाया गया है । व्याकृत विषयोंमें ब्रह्मके नियन्ता होनेमें अत्यन्त स्पष्ट लिङ्ग है¹ । उसी ब्रह्मका नियन्तव्य देवताभेदके [ प्राणपर्यन्त ] संकोच और [ आनन्त्यपर्यन्त ] विकासद्वारा साक्षात् एवं अपरोक्ष |
१. 'यः पृथिवीमन्तरो यमयति' इत्यादि मन्त्रोंमें जो परतन्त्र पृथिवी आदिका ग्रहण किया है, इससे इनका नियम्य होना और ब्रह्मका नियामक होना सूचित होता है ।
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७८५
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७८५
| सद्द्वारेणाधिगन्तव्ये इति तदर्थं<br>शाकल्यब्राह्मणमारभ्यते— | ज्ञान प्राप्त करना है, इसीलिये<br>शाकल्यब्राह्मण आरम्भ किया<br>जाता है— |
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देवताओंकी संख्या
अथ हैनँ विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रयस्त्रिꣳशदित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ॥ १ ॥
इसके पश्चात् इस याज्ञवल्क्यसे शाकल्य विदग्धने पूछा, 'हे याज्ञवल्क्य ! कितने देवगण हैं ?' तब याज्ञवल्क्यने इस आगे कही जानेवाली निविद्से ही उनकी संख्याका प्रतिपादन किया । 'जितने वैश्वदेवकी निविद्में अर्थात् देवताओंकी संख्या बतानेवाले मन्त्रपदोंमें बतलाये गये हैं । वे तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र (तीन हजार तीन सौ छः) हैं ।' [तब शाकल्यने] 'ठीक है' ऐसा कहा । फिर पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'तैंतीस' । [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पूछा, 'तो, याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'छः ।' [शाकल्यने] 'ठीक है' ऐसा कहा और फिर पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'तीन !' [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पुनः पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?'[याज्ञवल्क्य—] 'दो ।' [शाकल्य-
बृ० उ० ५०—
७८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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ने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'डेढ़।' [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा, और पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'एक।' [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पूछा, 'वे तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र देव कौन-से हैं?' ॥ १ ॥
| अथ हैनँ विदग्ध इति नामतः शकलस्यापत्यं शाकल्यः पप्रच्छ—कतिसंख्याका देवा हे याज्ञवल्क्येति। स याज्ञवल्क्यः, ह किल, एतयैव वक्ष्यमाणया निविदा प्रतिपेदे संख्याम्, यां संख्यां पृष्टवाञ्शाकल्यः। यावन्तो यावत्संख्याका देवा वैश्वदेवस्य शस्त्रस्य निविदि—निविन्नाम देवतासंख्यावाचकानि मन्त्रपदानि, कानिचिद् वैश्वदेवे शस्त्रे शस्यन्ते तानि निवित्संज्ञकानि; तस्यां निविदि यावन्तो देवाः श्रूयन्ते तावन्तो देवा इति। <br><br> का पुनः सा निविदिति तानि निवित्पदानि प्रदर्श्यन्ते—त्रयश्च त्री च शता—त्रयश्च देवाः, | फिर इस याज्ञवल्क्यसे विदग्ध इस नामवाले शाकल्य—शकलके पुत्रने पूछा, 'हे याज्ञवल्क्य ! देवगण कितनी संख्यावाले हैं?' उस याज्ञवल्क्यने, जो संख्या शाकल्यने पूछी थी उस संख्याका इस आगे बतलायी जानेवाली निविद्से निरूपण किया। जितने—जितनी संख्यावाले देवता विश्वेदेवसम्बन्धी शस्त्रकी निविद् (मन्त्र-पद) में बताये गये हैं (उतने सब देव हैं), निविद् कहते हैं देवताओंकी संख्या बतानेवाले मन्त्रपदोंको, विश्वेदेव-सम्बन्धी शस्त्रमें देवसंख्याप्रतिपादक कुछ मन्त्रपदोंका उपदेश किया गया है, वे सब 'निविद्' कहलाते हैं। अतः तात्पर्य यह है कि उस निविद्में जितने देवगण श्रुतिद्वारा बताये जाते हैं, उतने ही कुल देवता हैं। <br><br> किंतु वह निविद् क्या है? वे निविद्के पद दिखलाये जाते हैं—'त्रयश्च त्री च शता' अर्थात् देवगण |
ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८७
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८७ |
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| देवा॒नां त्री च॒ त्रीणि॑ च श॒तानि॑; पुन॒रप्ये॒वं त्रय॑श्च, त्री च सह॒स्रा सह॒स्राणि॑—एतावन्तो देवा इति शाकल्योऽप्योमिति होवाच।<br><br>एवमेषां मध्यमा संख्या सम्यक्तया ज्ञाता, पुनस्तेषामेव देवानां संकोचविषयां संख्यां पृच्छति—कतमेव देवा याज्ञवल्क्येति; त्रयस्त्रिंशत्; षट्, त्रयः, द्वौ, अध्यर्धः, एक इति। देवतासंकोचविकासविषयां संख्यां पृष्ट्वा पुनः संख्येयस्वरूपं पृच्छति—कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ॥ १ ॥ | तीन हैं और तीन सौ हैं। तथा इसी प्रकार वे तीन और तीन सहस्र हैं। यानी सम्पूर्ण देव इतने हैं। इसपर शाकल्यने भी 'ठीक है' ऐसा कहा।<br><br>इस प्रकार इनकी मध्यमा संख्याका ठीक-ठीक पता लग गया। फिर शाकल्य उन्हीं देवताओंकी संकोचविषयिणी संख्या पूछता है, 'हे याज्ञवल्क्य ! देव कितने हैं?' तब याज्ञवल्क्य क्रमशः 'तैंतीस, छः, तीन, दो, डेढ़ और एक' ऐसा बतलाते हैं। इस प्रकार देवताओंके संकोच और विकासविषयक संख्या पूछकर फिर संख्येयके स्वरूपके विषयमें पूछता है, 'वे तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र देव कौन-से हैं?' ॥ १॥ |
तैंतीस देवताओंका विवरण
स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिँशत्त्वेव देवा इति कतमे ते त्रयस्त्रिँशदित्यष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रिँशदिन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिँशाविति ॥ २ ॥
उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'ये तो इनकी महिमाएँ ही हैं। देवगण तो तैंतीस ही हैं।' [ शाकल्य—] 'वे तैंतीस देव कौन-से हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य—ये इकतीस देवगण हैं तथा इन्द्र और प्रजापतिके सहित तैंतीस हैं' ॥ २ ॥