भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 784, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 784
७७४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

तस्मादस्ति दानकर्तॄणां फलेन संयोजयिता ।अतः दानकर्ताओंका फलसे संयोग करानेवाला कोई है ही।
अपूर्वमिति चेत् ?**पूर्व०—**यदि कहें कि अपूर्व ही फलदाता है तो ?
न, तत्सद्भावे प्रमाणानुपपत्तेः**सिद्धान्ती—**नहीं, क्योंकि उसकी सत्तामें कोई प्रमाण नहीं है।
प्रशास्तुरपीति चेत् ।**पूर्व०—**सो तो प्रशास्ताकी सत्तामें भी नहीं है ?
न, आगमतात्पर्यस्य सिद्धत्वात्; अवोचाम ह्यागमस्य वस्तुपरत्वम् । किञ्चान्यत्, अपूर्वकल्पनायां चार्थपत्तेः क्षयोऽन्यथैवोपपत्तेः। सेवाफलस्य सेव्यात् प्राप्तिदर्शनात्। सेवायाश्च क्रियात्वात्, तत्सामान्याच्च यागदानहोमादीनां सेव्याद् ईश्वरादेः फलप्राप्तिरुपपद्यते दृष्टक्रियाधर्मसामर्थ्यमपरित्यज्यैव**सिद्धान्ती—**नहीं, उसमें तो शास्त्रका तात्पर्य सिद्ध हो चुका है; हम शास्त्रका आत्मवस्तुपरत्व प्रतिपादन कर चुके हैं; इसके सिवा एक बात और भी है—अपूर्वकी कल्पना करनेमें जिस अर्थापत्तिका आश्रय लिया जाता है, उसका क्षय तो अन्यथा उपपत्ति ( दूसरे प्रकारसे भी फलकी सिद्धि ) होनेसे ही हो जाता है, क्योंकि सेवाके फलकी प्राप्ति सेव्यसे होती देखी जाती है; सेवा क्रिया है, अतः उसीके समान होनेके कारण याग, दान और होमादिके फलकी प्राप्ति भी ईश्वरादि सेव्योंसे ही होनी उचित है। क्रियाधर्मके दृष्टसामर्थ्य-

१ जहाँ अन्यथा अनुपपत्ति होती हो अर्थात् किसी एक वस्तु या सिद्धान्तको माने बिना काम न चलता हो, सङ्गति न लगती हो, वहाँ ही 'अर्थापत्ति' स्वीकार की जाती है; जैसे यज्ञादि क्रिया तो इस लोकमें ही समाप्त हो जाती है, कालान्तरमें मिलनेवाले स्वर्गादि फलका सम्बन्ध उस क्रियाके साथ क्योंकर माना जा सकता है ? क्रिया तो नष्ट हो चुकी है, वह है ही कहाँ जो फल दे सके ?

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