बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 783, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 783
ब्राह्मण ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७७३
| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | भाष्यार्थ |
|---|---|
| प्रवर्तिता एव नियताः प्रवर्तन्तेऽन्यथापि प्रवर्तितुमुत्सहन्त्यः; तदेतल्लिङ्गं प्रशास्तुः । प्रतीच्योऽन्याः प्रतीचीं दिशमश्वन्ति सिन्ध्वाद्या नद्यः; अन्याश्च यां यां दिशमनुप्रवृत्तास्तां तां न व्यभिचरन्ति; तच्च लिङ्गम् । | सामर्थ्य होनेपर भी, जिस ओर नियुक्त कर दी गयी हैं, उसी ओर प्रवृत्त रहती हैं, यह भी उस प्रशासनकर्ताकी सत्ताका लिङ्ग है । तथा अन्य सिन्धु आदि नदियाँ प्रतीच्य-प्रतीची (पश्चिम) दिशाको बहती हैं । अन्य नदियाँ भी जिस-जिस दिशामें अनुप्रवृत्त कर दी गयी हैं, उस-उसको नहीं छोड़तीं; यह भी उस अक्षर प्रशासताके अस्तित्वका लिङ्ग है । |
| किञ्च ददतो हिरण्यादीन् प्रयच्छत आत्मपीडां कुर्वतोऽपि प्रमाणज्ञा अपि मनुष्याः प्रशंसन्ति; तत्र यच्च दीयते, ये च ददति, ये च प्रतिगृह्णन्ति, तेषामिहैव समागमो विलयश्चान्वक्षो दृश्यते; अदृष्टस्तु परः समागमः; तथापि मनुष्या ददतां दानफलेन संयोगं पश्यन्तः प्रमाणज्ञतया प्रशंसन्ति; तच्च, कर्मफलेन संयोजयितरि कर्तुः कर्मफलविभागज्ञे प्रशास्तर्यसति न स्यात्; दानक्रियायाः प्रत्यक्षविनाशित्वात्; | इसके सिवा अपनेको कष्ट देकर भी दान करनेवाले-सुवर्णादि देनेवाले पुरुषकी भी प्रमाणज्ञजन प्रशंसा करते हैं; सो जो कुछ दिया जाता है, जो देते हैं और जो ग्रहण करते हैं, उनका यहीं मिलना और बिछुड़ना प्रत्यक्ष देखा जाता है; पारलौकिक समागम तो अदृष्ट है; तो भी दानीका दानके फलसे संयोग देखनेवाले पुरुष प्रमाणके ज्ञाता होनेके कारण उनकी प्रशंसा करते हैं; किंतु यह बात कर्मफलसे संयोग करानेवाले कर्ता और कर्मफलके ज्ञाता प्रशासताकी सत्ता न होनेपर होनी सम्भव नहीं थी, क्योंकि दानक्रिया तो प्रत्यक्ष विनाशिनी है । |