भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 782, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 782
७७२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| शासनं द्यावापृथिव्यावतिक्रामतः; तस्मात् सिद्धमस्यास्तित्वमक्षरस्य अव्यभिचारि हि तल्लिङ्गम्, यद् द्यावापृथिव्यौ नियते वर्तेते; चेतनावन्तं प्रशासितारमसंसारिणमन्तरेण नैतद् युक्तम् । “येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा” इति मन्त्रवर्णात् । | प्रशासनका अतिक्रमण नहीं कर सकते; इससे इस अक्षरका अस्तित्व सिद्ध होता है; द्युलोक और पृथिवी इसके द्वारा नियमित होकर विद्यमान हैं—यह इसकी सत्ताका अव्यभिचारी लिङ्ग है; क्योंकि किसी चेतनावान् असंसारी शासकके बिना ऐसा होना सम्भव नहीं है; जैसा कि “जिसके द्वारा द्युलोक उग्र और पृथिवी दृढ की गयी है” इत्यादि मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है। | | एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि, निमेषा मुहूर्ता इत्येते कालावयवाः सर्वस्य अतीतानागतवर्तमानस्य जनिमतः कलयितारः—यथा लोके प्रभुना नियतो गणकः सर्वमायं व्ययं चाप्रमत्तो गणयति, तथा प्रभुस्थानीय एषां कालावयवानां नियन्ता । | हे गार्गि! इस अक्षरके प्रशासनमें ही निमेष, मुहूर्त इत्यादि कालके अवयव उत्पन्न होनेवाले समस्त अतीत और अनागत पदार्थोंकी कलना (गणना) करनेवाले हैं; जिस प्रकार लोकमें स्वामीके द्वारा नियुक्त किया हुआ गणक (मुनीम) प्रमादशून्य रहकर समस्त आय और व्ययकी गणना करता है, उसी प्रकार इन कालावयवोंका नियन्ता भी इनका प्रभुरूप है। | | तथा प्राच्यः प्रागञ्चनाः पूर्वदिग्गमना नद्यः स्यन्दन्ते स्रवन्ति श्वेतेभ्यो हिमवदादिभ्यः पर्वतेभ्यो गिरिभ्यो गङ्गाद्या नद्यस्ताश्च यथा | इसी तरह हिमालय आदि श्वेत पर्वतोंसे निकलनेवाली प्राच्य-पूर्वकी ओर बहनेवाली अर्थात् पूर्व-दिशाकी ओर गमन करनेवाली गङ्गा आदि नदियाँ, अन्य दिशामें प्रवृत्त होनेका |