बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 785, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ८] शाङ्करभाष्यार्थ ७७५
| फलप्राप्तिकल्पनोपपत्तौ दृष्टक्रियाधर्मसामर्थ्यपरित्यागो न न्याय्यः।<br><br>कल्पनाधिक्याच्च; ईश्वरः कल्प्योऽपूर्वं वा ? तत्र क्रियायाश्च स्वभावः सेव्यात् फलप्राप्तिर्दृष्टा न त्वपूर्वात्; न चापूर्वं दृष्टम्; तत्रापूर्वमदृष्टं कल्पयितव्यं तस्य च फलदातृत्वे सामर्थ्यम्, सामर्थ्ये च सति दानं चाभ्यधिकमिति। इह तु ईश्वरस्य सेव्यस्य सद्भावमात्रं कल्प्यम्, न तु फलदानसामर्थ्यं | को बिना त्यागे ही यदि फलप्राप्तिकी कल्पना उत्पन्न हो सकती है तो उस दृष्टक्रियाधर्मसामर्थ्यका त्याग करना युक्तियुक्त नहीं है।<br><br>इसके सिवा अपूर्वकी कल्पना करनेमें कल्पनाधिक्यका दोष भी होता है; विचार करो कि ईश्वरकी कल्पना करनी चाहिये या अपूर्वकी। किंतु क्रियाका स्वभाव तो सेव्यसे फल-प्राप्ति होना देखा गया है, अपूर्वसे नहीं और अपूर्व दृष्ट भी नहीं है। अतः उस पक्षमें अदृष्ट अपूर्वकी कल्पना करनी पड़ती है और उसमें फल-प्रदान करनेके सामर्थ्यकी भी। इस प्रकार सामर्थ्य स्वीकार करनेपर दानकी अधिक कल्पना की जाती है। किंतु इस पक्षमें केवल सेव्य ईश्वरकी सत्तामात्रहीकी कल्पना की जाती है, उसके फलदानके सामर्थ्य और |
इस प्रकार फलसिद्धिमें अनुपपत्ति देखकर मीमांसक लोग क्रियासे अपूर्वकी उत्पत्ति मानते हैं; वह अपूर्व ही कालान्तरमें स्वर्गादि फलका जनक होता है।
भाष्यकार अर्थापत्तिका खण्डन करते हुए कहते हैं—अन्यथा अनुपपत्ति हो तो 'अपूर्व स्वीकार करनेमें' हर्ज नहीं मगर यहाँ तो अन्यथा भी उपपत्ति हो जाती है, अपूर्व स्वीकार किये बिना भी क्रियाके फलकी सिद्धिमें कोई बाधा नहीं आती। जैसे सेवा एक क्रिया है, उसका मूल्य लोकमें स्वामी चुकाता है, उसी प्रकार दान और यज्ञ भी क्रिया हैं, इनका फल भी लौकिक स्वामीकी भाँति सेव्य परमेश्वर ही विचारकर दे सकते हैं। इस प्रकार अर्थापत्तिका यहाँ क्षय हो जाता है, क्योंकि यहाँ अन्यथा भी फलकी उपपत्ति (सिद्धि) होती है। ईश्वरको न मानकर अपूर्वकी कल्पनामें जो दोष आते हैं, उनको भाष्यकारने आगे भाष्यमें बताया है।