बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 786, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| दातृत्वं च, सेव्यात् फलप्राप्ति-दर्शनात् । अनुमानं च दर्शितम्—'द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठतः' इत्यादि ।<br><br>तथा च यजमानं देवा ईश्वराः सन्तो जीवनार्थेऽनुगताः, चरु-पुरोडाशाद्युपजीवनप्रयोजनेन, अन्यथापि जीवितुमुत्सहन्तः कृपणां दीनां वृत्तिमाश्रित्य स्थिताः, तच्च प्रशास्तुः प्रशासनात् स्यात् । तथा पितरोऽपि तदर्थं दर्वी दर्वीहोममन्वायत्ता अनुगता इत्यर्थः; समानं सर्वमन्यत् ॥ ९ ॥ | दातृत्वकी नहीं; क्योंकि सेव्यसे फलप्राप्ति होती देखी ही गयी है। इस विषयमें 'द्युलोक और पृथिवी धारण किये हुए स्थित हैं'—इत्यादि-रूपसे अनुमान भी दिखाया गया है।<br><br>इसी प्रकार देवगण समर्थ होने पर भी जो जीवनके लिये—चरुपुरो-डाशादिके आश्रय जीवनयापनके प्रयोजनसे यजमानके अनुगत रहते हैं, अर्थात् अन्य प्रकारसे जीवित रहनेमें समर्थ होनेपर भी वे जो इस कृपण-दीन वृत्तिको आश्रित करके स्थित रहते हैं, यह भी उस प्रशा-स्ताके प्रशासनसे ही होना सम्भव है। इसी प्रकार पितृगण भी जीविकाके लिये दर्वीके अर्थात् पितरोंके उद्देश्यसे किये जानेवाले दर्वीहोमके अन्वायत्त-अनुगत हैं। शेष सब इसीके समान समझना चाहिये ॥ ६ ॥ |
अक्षरके ज्ञान और अज्ञानके परिणाम
| इतश्चास्ति तदक्षरं यस्मात्तदज्ञाने नियता संसारोपपत्तिः । भवितव्यं तु तेन, यद्विज्ञानात् तद्विच्छेदः, न्यायोपपत्तेः । ननु क्रियात एव | इस अक्षरकी सत्ता इसलिये भी है; क्योंकि इसके अज्ञानसे ही नियमतः संसारकी उपपत्ति हो सकती है। जिसके विज्ञानसे उस (संसार) का विच्छेद हो सकता है, वह वस्तु होनी ही चाहिये क्योंकि यही न्यायोचित है। यदि |