बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 787, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ८] शाङ्करभाष्यार्थ ७७७
| तद्विच्छित्तिः स्यादिति चेत् ?<br><br>न— | कहो कि उसका विच्छेद कर्मसे ही हो जायगा तो ऐसा कहना उचित नहीं [क्योंकि—] |
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यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्मिँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद् भवति यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात् प्रैति स कृपणोऽथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः ॥ १० ॥
हे गार्गि ! जो कोई इस लोकमें इस अक्षरको न जानकर हवन करता, यज्ञ करता और अनेकों सहस्र वर्षपर्यन्त तप करता है, उसका वह सब कर्म अन्तवान् ही होता है। जो कोई भी इस अक्षरको बिना जाने इस लोकसे मरकर जाता है, वह कृपण (दीन) है और हे गार्गि ! जो इस अक्षरको जानकर इस लोकसे मरकर जाता है, वह ब्राह्मण है ॥ १० ॥
| यो वा एतदक्षरं हे गार्गि अविदित्वाविज्ञाय अस्मिँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते यद्यपि बहूनि वर्षसहस्राणि, अन्तवद् एवास्य तत् फलं भवति, तत्फलोपभोगान्ते क्षीयन्त एवास्य कर्माणि। अपि च यद्विज्ञानात् कार्पण्यात्ययः संसारविच्छेदः, यद्विज्ञानाभावाच्च कर्मकृत् कृपणः कृतफलस्यैवोपभोक्ता जननमरणप्रबन्धारूढः संसरति, तदस्यत्यक्षरं | हे गार्गि ! इस लोकमें जो कोई इस अक्षरको न जानकर अर्थात् बिना जाने हवन, यज्ञ और अनेकों सहस्र वर्षपर्यन्त तप भी करता है तो उसका वह फल अन्तवान् ही होता है; उस फल-भोगके पश्चात् इसके कर्म क्षीण हो ही जाते हैं। इसके सिवा जिसके विज्ञानसे कृपणताका अतिक्रमण और संसारका विच्छेद होता है तथा जिसका विज्ञान न होनेसे कर्मकर्त्ता कृपण, किये हुए कर्मके फलका ही उपभोग करनेवाला और जन्म-मरणकी परम्परापर आरूढ होकर संसारबन्धनको प्राप्त होता है, वह अक्षर ही |
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