बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 788, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| प्रशासितृ; तदेतदुच्यते—यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वा अस्माल्लोकात् प्रैति स कृपणः, पणक्रीत इव दासादिः। अथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वा अस्माल्लोकात् प्रैति स ब्राह्मणः ॥ १० ॥ | प्रशास्ता है। इसीसे यह कहा जाता है-हे गार्गि! जो भी इस अक्षरको बिना जाने इस लोकसे मरकर जाता है, वह पैसोंसे खरीदे हुए गुलाम आदिकी तरह कृपण (दीन) है। और हे गार्गि! जो कोई इस अक्षरको जानकर इस लोकसे मरकर जाता है, वह ब्राह्मण है ॥१०॥ |
अक्षरका स्वरूप, लक्षण और अद्वितीयत्व
| अग्नेर्दहनप्रकाशकत्ववत् स्वाभाविकमस्य प्रशास्तृत्वमचेतनस्यैवेत्यत आह— | [ प्रधानवादीका कथन है कि ] अग्निके दहन और प्रकाशकत्वके समान यह अचेतन ही स्वाभाविक शासन करनेवाला है, इसीसे याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— |
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तद् वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतँ श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रे तस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ११॥
हे गार्गि ! यह अक्षर स्वयं दृष्टिका विषय नहीं, किंतु द्रष्टा है, श्रवणका विषय नहीं, किंतु श्रोता है, मननका विषय नहीं, किंतु मन्ता है, स्वयं अविज्ञात रहकर दूसरोंका विज्ञाता है। इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है, इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है, इससे भिन्न कोई मन्ता नहीं है, इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं है। हे गार्गि ! निश्चय इस अक्षरमें ही आकाश ओतप्रोत है ॥ ११ ॥
| तद् वा एतदक्षरं गार्गि अदृष्टं<br><br>न केनचिद् दृष्टम्, अविषयत्वात् | हे गार्गि ! वह यह अक्षर अदृष्ट है, दृष्टिका विषय न होनेके कारण वह किसीके द्वारा देखा नहीं गया है, किंतु |
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