भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 789, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 789

ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७९


संस्कृत (मूल/भाष्य)हिन्दी भाष्यार्थ
स्वयं तु द्रष्टृ दृष्टिस্বরূপत्वात् । तथा श्रुतं श्रोत्राविषयत्वात्, स्वयं श्रोतॄ श्रुतिस्वरूपत्वात् । तथामतं मनसोऽविषयत्वात्, स्वयं मन्तृ मतिस्वरूपत्वात् । तथाविज्ञातं बुद्धेरविषयत्वात्, स्वयं विज्ञातृ विज्ञानस्वरूपत्वात् ।स्वयं दृष्टिस্বরূপ होनेके कारण द्रष्टा है। इसी प्रकार यह श्रोत्रका अविषय होनेके कारण सुना नहीं गया है, किंतु स्वयं श्रुतिस्वरूप होनेसे श्रोता है। तथा मनका अविषय होनेके कारण यह मननका विषय नहीं होता, किंतु स्वयं मतिस्वरूप होनेसे मन्ता है। इसी तरह बुद्धिका अविषय होनेके कारण विज्ञात नहीं है; किंतु स्वयं विज्ञानस्वरूप होनेसे विज्ञाता है।
किञ्च 'नान्यदतोऽस्मादक्षरादस्ति—नास्ति किञ्चिद् द्रष्टृ दर्शनक्रियाकर्तृ; एतदेवाक्षरं दर्शनक्रियाकर्तृ सर्वत्र । तथा नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ; तदेवाक्षरं श्रोतृ सर्वत्र । नान्यदतोऽस्ति मन्तृ; तदेवाक्षरं मन्तृ सर्वत्र सर्वमनोद्वारेण । नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ विज्ञानक्रियाकर्तृ, तदेवाक्षरं सर्वबुद्धिद्वारेण विज्ञानक्रियाकर्तृ, नाचेतनं प्रधानमन्यद् वा ।यही नहीं, इस अक्षरसे भिन्न कोई द्रष्टा—दर्शन-क्रियाका कर्ता भी नहीं है; यह अक्षर ही सर्वत्र दर्शन-क्रियाका कर्ता है; इसी प्रकार इससे भिन्न कोई श्रोता भी नहीं है; यह अक्षर ही सर्वत्र श्रोता है। इससे भिन्न कोई मन्ता भी नहीं है; सम्पूर्ण मनोंके द्वारा सर्वत्र वह अक्षर ही मनन करनेवाला है और न इससे भिन्न कोई विज्ञाता—विज्ञान—क्रियाका कर्ता है, समस्त बुद्धियोंके द्वारा वह अक्षर ही विज्ञान क्रियाका कर्ता है—अचेतन प्रधान अथवा कोई अन्य नहीं।
एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति । यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म, य आत्मा सर्वान्तरोऽशनायादि संसारधर्मातीतः, यस्मिन्नाकाश ओतश्च प्रोत-हे गार्गि ! निश्चय इस अक्षरमें ही आकाश ओतप्रोत है। जो ही साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, जो क्षुधादि संसारधर्मोंसे अतीत सर्वान्तर आत्मा है और जिसमें आकाश ओतप्रोत
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