बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 790, कुल 1402 में से
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| ७८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| श्च, एषा परा काष्ठा, एषा परा गतिः, एतत् परं ब्रह्म, एतत् पृथिव्यादेराकाशान्तस्य सत्यस्य सत्यम् ॥ ११ ॥ | है, वह ( यह अक्षर ) ही पराकाष्ठा है, यह परा गति है, यह परब्रह्म है और यही पृथिवीसे लेकर आकाशपर्यन्त समस्त सत्यका सत्य है ॥ ११ ॥ |
गार्गीका निर्णय
सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्येध्वं यदस्माननमस्कारेण मुच्येध्वं न वै जातु युष्माकमिमं कश्चिद् ब्रह्मोद्यं जेतेति ततो ह वाचकनव्युपरराम ॥ १२ ॥
उस गार्गीने कहा, 'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपलोग इसीको बहुत मानें कि इन याज्ञवल्क्यजीसे आपको नमस्कारद्वारा ही छुटकारा मिल जाय। आपमेंसे कोई भी कभी इन्हें ब्रह्मविषयक वादमें जीतनेवाला नहीं है।' तदनन्तर वचक्नुकी पुत्री गार्गी चुप हो गयी ॥ १२ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| सा होवाच— हे ब्राह्मणा भगवन्तः शृणुत मदीयं वचः; तदेव बहु मन्येध्वम्; किं तत् ? यदस्माद् याज्ञवल्क्यान्नमस्कारेण मुच्येध्वम्— अस्मै नमस्कारं कृत्वा तदेव बहु मन्यध्वमित्यर्थः; जयस्त्वस्य मनसापि न आशंसनीयः, किमुत कार्यतः; कस्मात् ? न वै युष्माकं मध्ये जातु कदाचिदपीमं याज्ञवल्क्यं ब्रह्मोद्यं प्रति जेता । | वह बोली, 'हे भगवन् (पूजनीय) ब्राह्मणो ! मेरी बात सुनो; तुमलोग इसीको बहुत समझो; सो किसको ? यही कि तुम इन याज्ञवल्क्यजीसे नमस्कारके द्वारा ही मुक्त हो जाओ अर्थात् यदि इन्हें नमस्कार करके ही छुटकारा पा जाओ तो इसीको बहुत मानो; इनको जीतनेकी तो मनसे भी आशा नहीं करनी चाहिये, कार्यद्वारा जीतनेकी तो बात ही क्या है? क्यों ? क्योंकि आपमेंसे कोई भी कभी इन याज्ञवल्क्यजीको ब्रह्मसम्बन्धी वादमें जीतनेवाला नहीं है। |