भारतकोश
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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६३

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६३

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
सर्ववेदान्तेषु च प्रत्यगात्मवेद्यतैव प्रदर्श्यतेऽहमिति, न बहिर्वेद्यता शब्दादिवत्प्रदर्श्यतेऽसौ ब्रह्मेति। तथा कौषीतकिनामेव "न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात्" (कौ० उ० ३।८) इत्यादिना वागादिकरणैर्व्यावृत्तस्य कर्तुरेव वेदितव्यतां दर्शयति।समस्त वेदान्तोंमें ब्रह्मकी 'अहम्' इस रूपसे प्रत्यगात्मभावसे ही वेद्यता दिखायी गयी है, शब्दादिके समान 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार बहिर्वेद्यता नहीं दिखायी गयी। इसी प्रकार कौषीतकी शाखावालोंकी श्रुति भी "वाणीको जाननेकी इच्छा न करे, बोलनेवालेको जाने" इत्यादि वाक्यसे वागादि इन्द्रियोंसे भिन्न कर्ताकी ही वेद्यता प्रदर्शित करती है।
अवस्थान्तरविशिष्टोऽसंसारीति चेत्—अथापि स्याद्यो जागरिते शब्दादिभुग्विज्ञानमयः, स एव सुषुप्ताख्यमवस्थान्तरं गतोऽसंसारी परः प्रशासिता अन्यः स्यादिति चेन्न, अदृष्टत्वात्। न ह्येवंधर्मकः पदार्थो दृष्टोऽन्यत्र वैनाशिकसिद्धान्तात्। न हि लोके गौस्तिष्ठन् गच्छन्वा गौर्भवति—शयानस्त्वश्वादिजात्यन्तरमिति। न्यायाच्च— यद्धर्मको यः पदार्थः प्रमाणेनावगतो भवति, स देशकालाchannel/वस्था-यदि कहो कि अवस्थान्तरविशिष्ट होनेपर वह असंसारी हो जाता है। अर्थात् यदि ऐसा मानो कि जागरित-अवस्थामें जो विज्ञानमय शब्दादिका भोक्ता है, वही सुषुप्तसंज्ञक अन्य अवस्थामें जानेपर उससे भिन्न जगत्का शासक असंसारी हो जाता है, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा देखा नहीं गया। वैनाशिक-सिद्धान्तके सिवा और कहीं ऐसे धर्मवाला पदार्थ नहीं देखा गया। लोकमें ऐसा नहीं देखा गया कि बैठते या चलते समय तो गौ गौ रहे और सोनेपर वह अश्वादि कोई अन्य जातिका पशु हो जाय। युक्तिसे भी यही सिद्ध होता है कि जो पदार्थ प्रमाणद्वारा जिन धर्मोंवाला जाना जाता है, वह अन्य देश, काल अथवा अवस्थाओंमें भी

४६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| न्तरेष्वपि तद्धर्मक एव भवति । स चेत्तद्धर्मकत्वं व्यभिचरति, सर्वः प्रमाणव्यवहारो लुप्येत । तथा च न्यायविदः साङ्ख्यमीमांसकादयोऽसंसारिणोऽभावं युक्तिशतैः प्रतिपादयन्ति । | उन्हीं धर्मोंवाला रहता है। यदि वह उन धर्मोंका त्याग कर दे तो सारे ही प्रमाण-व्यवहारका लोप हो जाय। इसी प्रकार सांख्यवादी और मीमांसकादि न्यायवेत्ता भी सैकड़ों युक्तियोंसे असंसारी ईश्वरके अभावका प्रतिपादन करते हैं। | | संसारिणोऽपि जगदुत्पत्तिस्थितिलयक्रियाकर्तृत्वविज्ञानस्याभावाद् अयुक्तमिति चेत्—यन्महता प्रपञ्चेन स्थापितं भवता, शब्दादिसुक्संसार्येवावस्थान्तरविशिष्टो जगत इह कर्तेति—तदसत्; यतो जगदुत्पत्तिस्थितिलयक्रियाकर्तृत्वविज्ञानशक्तिसाधनाभावः सर्वलोकप्रत्यक्षः संसारिणः । सकथमस्मदादिः संसारी मनसापि चिन्तयितुमशक्यं पृथिव्यादिविन्यासविशिष्टं जगन्निर्मिनुयात् ? अतोऽयुक्तमिति चेन्न, शास्त्रात्; शास्त्रं | यदि कहो कि जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयरूप क्रियाके कर्तृत्वका ज्ञान न होनेके कारण संसारी जीवको भी जगत्का कर्ता मानना उचित नहीं है, अर्थात् तुमने जो बड़े विस्तारसे यहाँ यह सिद्ध किया है कि शब्दादिका भोक्ता अवस्थान्तरविशिष्ट संसारी जीव ही जगत्का कर्ता है, वह ठीक नहीं है; क्योंकि संसारी जीवमें जगत्को उत्पत्ति, स्थिति एवं लयरूप क्रियाके कर्तृत्वविज्ञानकी शक्तिके साधनोंका अभाव सभी लोकोंको प्रत्यक्ष है। वह हम-जैसा संसारी जीव इस पृथिवी आदिके यथास्थान स्थापनपूर्वक विभिन्न प्रकारकी रचनासे विशिष्ट एवं मनसे भी अचिन्तनीय जगत्‌की किस प्रकार रचना कर सकता है ? इसलिये ऐसा मानना उचित नहीं; ऐसी यदि कोई शङ्का करे तो ठीक नहीं, क्योंकि शास्त्रसे |

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४६५

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४६५


मूल संस्कृतभाषानुवाद
संसारिणः “एवमेवास्मादात्मनः” (२।१।२०) इति जगदुत्पत्त्यादि दर्शयति। तस्मात्सर्वं श्रद्धेयमिति स्यादयमेकः पक्षः।यही सिद्ध होता है। “इसी प्रकार इस आत्मासे” इत्यादि शास्त्र संसारीसे ही जगत्की उत्पत्ति आदि प्रदर्शित करता है; इसलिये इस सबमें विश्वास रखना चाहिये—ऐसा यह एक पक्ष हो सकता है। १
[असंसारिणो जगत्कारणत्वोपपादनम्] <br> “यः सर्वज्ञः सर्ववित्” (मु० उ० १।१।९) “योऽशनायापिपासे······अत्येति” (बृ० उ० ३।५।१) “असङ्गो न हि सज्यते” (३।९।२६) “एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने” (३।८।९) “यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् ····अन्तर्याम्यमृतः” (३।७।१५) “स यस्तान्पुरुषान्निरुह्य···अत्यक्रामत्” (३।९।२६) “स वा एष महानज आत्मा” (४।४।२२) “एष सेतुर्विधरणः” (४।४।२२) “सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः” (४।४।२२) “य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युः” (छा० उ० ८।७।१) “तत्तेजोऽसृजत” (छा० उ० ६।२।३) “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्” (ऐ० उ० १।१।१) “न लिप्यते लोक-“जो सर्वज्ञ और सर्ववेत्ता है”, “जो क्षुधा-पिपासासे अतीत है”, “जो असङ्ग है इसलिये किसीसे संयुक्त नहीं होता”, “इस अक्षरके ही शासनमें”, “जो समस्त भूतोंमें रहनेवाला, अन्तर्यामी और अमृत है”, “जो उन पुरुषोंका निरोध करके उनसे आगे बढ़ा हुआ है”, “वही यह महान् अजन्मा आत्मा है”, “यह विशेषरूपसे धारण करनेवाला सेतु है”, “यह सबको वशमें रखनेवाला और सबका शासक है”, “जो निष्पाप और अजर-अमर आत्मा है”, “उसने तेजको रचा”, “आरम्भमें यह एक आत्मा ही था”, “वह लोकदुःखसे लिप्त नहीं होता

१. यहाँतक सिद्धान्तीने संसारी जीवको ही जगत्का कारण माननेवाले पूर्वपक्षको प्रदर्शित किया है। इससे आगे असंसारीका जगत्कारणत्व प्रदर्शित किया जाता है।

बृ० उ० ३०—

४६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४६६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| दुःखेन बाह्यः” (क० उ० २ । २ । ११) इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः, स्मृतेश्च “अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते” (गीता १० । ८) इति—परोऽस्त्यसंसारी श्रुतिस्मृतिन्यायेभ्यश्च; स च कारणं जगतः। | क्योंकि उससे बाहर है—” इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंसे तथा “मैं सबका उत्पत्तिस्थान हूँ और मुझसे ही सब उत्पन्न होता है” इत्यादि स्मृतियोंसे जीवसे भिन्न असंसारी परमात्मा सिद्ध होता है और श्रुति-स्मृति एवं युक्तिसे वही जगत्का कारण है। | | ननु “एवमेवास्मादात्मनः” (२ । १ । २०) इति संसारिण एवोत्पत्तिं दर्शयतीत्युक्तम्। | पूर्व०—किंतु “इसी प्रकार इस आत्मासे” इत्यादि श्रुति तो संसारी जीवसे ही जगत्की उत्पत्ति दिखलाती है—ऐसा ऊपर कहा जा चुका है। | | न; “य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः” (२ । १ । १७) इति परस्य प्रकृतत्वात् “अस्मादात्मनः” इति युक्तः परस्यैव परामर्शः। “क्वैष तदाभूत्” (२ । १ । १६) इत्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनत्वेन आकाशशब्दवाच्यः पर आत्मोक्तो “य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते” (२ । १ । १७) इति। “सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति” (छा० उ० ६ । ८ । १) “अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति” (छा० उ० ८ । ३ । २) “प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः” (बृ० उ० ४ । ३ । २१) “पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते” (प्र० उ० | सिद्धान्ती—नहीं; “जो यह हृदयान्तर्गत आकाश है” इस प्रकार यहाँ परब्रह्मका ही प्रकरण होनेके कारण “इस आत्मासे” इत्यादि श्रुतिद्वारा परब्रह्मका ही परामर्श मानना उचित है। “उस समय यह कहाँ था?” इस प्रकार इस प्रश्नके उत्तररूपसे “यह जो हृदयके अन्तर्गत आकाश है, उसमें यह शयन करता है” इस वाक्यद्वारा आकाशशब्दवाच्य आत्मा ही कहा गया है। “हे सोम्य ! उस समय यह सत्से सम्पन्न रहता है” “प्रतिदिन वहाँ जाती हुई इस ब्रह्मलोकको नहीं प्राप्त करती है”, प्राज्ञात्मासे आलिङ्गित”, “पर आत्मामें सम्यक् प्रकारसे स्थित होती है” |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६७

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६७


संस्कृतहिन्दी
४।७) इत्यादिश्रुतिभ्य आकाशशब्दः पर आत्मेति निश्चीयते; "दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः" (छा० उ० ८।१।१) इति प्रस्तुत्य तस्मिन्नेवात्मशब्दप्रयोगाच्च। प्रकृत एव पर आत्मा। तस्माद्युक्तम् ‘एवमेवास्मादात्मनः’ इति परमात्मन एव सृष्टिरिति। संसारिणः सृष्टिस्थितिसंहारज्ञानसामर्थ्याभावं चावोचाम।इत्यादि श्रुतियोंसे आकाशशब्दसे कहा जानेवाला पर आत्मा ही है—ऐसा निश्चय होता है, तथा "इसमें अन्तराकाश दहर है" इस प्रकार प्रसङ्ग उठाकर उसी अर्थमें 'आत्मा' शब्दका प्रयोग भी किया गया है। इसलिये भी यहाँपर आत्माका ही प्रसङ्ग है। अतः 'इसी प्रकार इस आत्मासे' इस वाक्यद्वारा परमात्मासे ही सृष्टि होती है—ऐसा मानना ही उचित है। इसके सिवा हम संसारी जीवमें तो जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारके ज्ञानकी शक्तिका अभाव भी बतला चुके हैं।
(द्वैतवादिपक्षोद्भावनम्)<br>अत्र च "आत्मेत्येवोपासीत" (१।४।७) "आत्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि" (१।४।१०) इति ब्रह्मविद्या प्रस्तुता। ब्रह्मविषयं च ब्रह्मविज्ञानमिति 'ब्रह्म ते ब्रवाणि' इति 'ब्रह्म ज्ञापयिष्यामि' इति प्रारब्धम्। तत्रेदानीमसंसारि ब्रह्म जगतः कारणमशनायाद्यतीतं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावम्, तद्विपरीतश्च संसारी, तस्मादहं ब्रह्मा-पूर्व०—यहाँ भी "आत्मा है-इस प्रकार ही उपासना करे", "आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ" इस प्रकार ब्रह्मविद्याका ही प्रसङ्ग है। तथा ब्रह्मविज्ञान ब्रह्मविषयक ही होता है, जो कि 'मैं तुझे ब्रह्मका उपदेश करूँ', 'तुझे ब्रह्मका बोध कराऊँगा' इत्यादि श्रुतियोंसे आरम्भ किया है। यहाँ क्षुधादिसे रहित, नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव असंसारी ब्रह्म जगत्का कारण बतलाया गया है। संसारी जीव उससे विपरीत स्वभाववाला है। इसलिये वह अपनेको 'मैं ब्रह्म हूँ'

४६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४६८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृतहिन्दी
स्मीति न गृह्णीयात् परं हि देवमीशानं निकृष्टः संसार्थ्यात्मत्वेन स्मरन्कथं न दोषभाक् स्यात्? तस्मान्नाहं ब्रह्मास्मीति युक्तम् । तस्मात् पुष्पोदकाञ्जलिस्तुतिनमस्कारवल्युपहारस्वाध्यायाध्ययनयोगादिभिरारिराधयिषेत् । आराधनेन विदित्वा सर्वेशितृ ब्रह्म भवति । न पुनरसंसारि ब्रह्म संसार्थ्यात्मत्वेन चिन्तयेदग्निमिव शीतत्वेन आकाशमिव मूर्त्तिमत्त्वेन । ब्रह्मात्मत्वप्रतिपादकमपि शास्त्रमर्थवादो भविष्यति । सर्वतर्कशास्त्रलोकन्यायैश्चैवमविरोधः स्यात् ।इस प्रकार ग्रहण नहीं कर सकता । भला, निम्नकोटिका संसारी जीव परम देव ईश्वरको आत्मभावसे स्मरण करके किस प्रकार दोषका भागी न होगा ? इसलिये 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा मानना उचित नहीं हो सकता । अतः पुष्पाञ्जलि, स्तुति, नमस्कार, बलि, उपहार, जप, अध्ययन और योगादिके द्वारा उसकी आराधना करनेकी इच्छा करे। उसे आराधनाके द्वारा जानकर जीव सबका शासन करनेवाला ब्रह्म हो जाता है। जिस प्रकार अग्निको शीतरूपसे तथा आकाशको मूर्तरूपसे चिन्तन करना उचित नहीं है, उसी प्रकार संसारी जीव असंसारी ब्रह्मका आत्मभावसे चिन्तन नहीं कर सकता। आत्माकी ब्रह्मस्वरूपताका प्रतिपादन करनेवाला शास्त्र भी अर्थवाद ही होगा। तथा ऐसा माननेपर समस्त युक्ति, शास्त्र और लौकिक न्यायोंसे विरोध नहीं रह सकता।
न; मन्त्रब्राह्मणवादेभ्यस्तस्यैव<br>उक्तपक्षनिरासः प्रवेशश्रवणात् ।<br>“पुरश्चक्रे” इति प्रकृत्य “पुरः पुरुष आविशत् (बृ० उ० २ । ५ । १८) इति “रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्ष-सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि मन्त्र और ब्राह्मणवाक्योंद्वारा उस (परब्रह्म) का ही प्रवेश सुना गया है। “[शरीररूप] पुरोंकी रचना की” इस प्रकार प्रकरण उठाकर “पुरुषने पुरोंमें प्रवेश किया” “वह रूप-रूपके अनुरूप हो गया इसका वह रूप प्रत्यक्ष करनेके लिये

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४६९ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४६९
संस्कृत मूल / भाष्यहिन्दी भाष्यार्थ
णाय” (२।५।१९) “सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन्यदास्ते” इति सर्वशाखासु सहस्रशो मन्त्रवादाः सृष्टिकर्तुरेवासंसारिणः शरीरप्रवेशं दर्शयन्ति। तथा ब्राह्मणवादाः— “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” (तै० उ० ३।६।१) “स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत” (ऐ० उ० १।३।१२) “सेयं देवता ॅ इमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य” (छा० उ० ६।३।२) “एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते” (क० उ० १।३।१२) इत्याद्याः।है”, “वह धीर सम्पूर्ण रूपोंकी रचनाकर उनके नाम रखकर उन्हींके द्वारा बोलता रहता है” इस प्रकार सभी शाखाओंमें सहस्रों मन्त्रवाद सृष्टिकर्ता असंसारी ब्रह्मका ही शरीरमें प्रवेश होना दिखलाते हैं। इसी प्रकार “उसे रचकर वह उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया”, “वह इस मूर्धसीमाको ही विदीर्ण कर इसीके द्वारा प्रविष्ट हो गया”, “उस इस देवताने .. इन [अप्, तेज और अन्नरूप] तीन देवताओंमें इस जीवरूपसे अनुप्रवेश कर”, “यह सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ आत्मा प्रकट नहीं होता” इत्यादि ब्राह्मणवाद भी हैं।
सर्वश्रुतिषु च ब्रह्मण्येवात्मशब्दप्रयोगाद् आत्मशब्दस्य च प्रत्यगात्माभिधायकत्वात् “एष सर्वभूतान्तरात्मा” (मु० उ० २।१।४) इति च श्रुतेः परमात्मव्यतिरेकेण संसारिणोऽभावात्— “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६।२।१) “ब्रह्मैवेदम्” (मु० उ० २।२।११) “आत्मैवेदम्” (छा० उ० ७।२५।२) इत्यादिश्रुतिभ्यो युक्तमेव अहं ब्रह्मास्मीत्यवधारयितुम्।इसके सिवा समस्त श्रुतियोंमें ब्रह्ममें ही ‘आत्मा’ शब्दका प्रयोग होने तथा ‘आत्मा’ शब्द प्रत्यगात्माका वाचक होने एवं “यह समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है” इस श्रुतिके अनुसार परमात्मासे भिन्न संसारी जीवका अभाव होनेके कारण “एक ही अद्वितीय ब्रह्म है”, यह ब्रह्म ही है” “यह आत्मा ही है” इत्यादि श्रुतियोंसे ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसा निश्चय करना उचित ही है।

४७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४७०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| यदैवं स्थितः शास्त्रार्थः, तदा जीवपरयोरभेदे परमात्मनः संसारिदोषोद्भावनम् त्वम्; तथा च सति शास्त्रानर्थक्यम्, असंसारित्वे चोपदेशानर्थक्यं स्पष्टो दोषः प्राप्तः। यदि तावत्परमात्मा सर्वभूतान्तरात्मा सर्वशरीरसम्पर्कजनितदुःखान्यनुभवतीति स्पष्टं परस्य संसारित्वं प्राप्तम्। तथा च परस्यासंसारित्वप्रतिपादिकाः श्रुतयः कुप्येरन्, स्मृतयश्च, सर्वे च न्यायाः। अथ कथञ्चित्प्राणिशरीरसम्बन्धजैर्दुःखैर्न सम्बध्यत इति शक्यं प्रतिपादयितुं परमात्मनः साध्यपरिहार्याभावादुपदेशानर्थक्यदोषो न शक्यते निवारयितुम्।<br><br>अत्र केचित्परिहारमाचक्षते—<br>(जीवस्य परमात्मविकारत्वं प्रस्तूयते न)<br>परमात्मा न साक्षाद्भूतेष्वनुप्रविष्टः स्वेन रूपेण; किं तर्हि ? | जब इस प्रकार शास्त्रका अभिप्राय निश्चित होता है तो परमात्माका संसारी होना सिद्ध होता है; ऐसी स्थितिमें शास्त्र व्यर्थ हो जाता है और यदि जीवको असंसारी माना जाय तो उसे उपदेश करना व्यर्थ है—ऐसा यह स्पष्ट दोष प्राप्त होता है। यदि परमात्मा ही समस्त जीवोंका अन्तरात्मा है और वही समस्त शरीरोंके सम्पर्कसे होनेवाले दुःखोंको अनुभव करता है तो स्पष्ट ही परमात्माको संसारित्वकी प्राप्ति हो जाती है। ऐसी स्थितिमें परमात्माके असंसारित्वका प्रतिपादन करनेवाली समस्त श्रुतियाँ, स्मृतियाँ और युक्तियाँ बाधित हो जाती हैं, और यदि किसी प्रकार यह प्रतिपादन भी किया जाय कि प्राणियोंके शरीरोंके सम्बन्धसे होनेवाले दुःखोंसे उसका सम्बन्ध नहीं होता तो परमात्माके लिये कोई ग्राह्य या त्याज्य न होनेके कारण उपदेशकी व्यर्थतारूप दोषका निवारण नहीं किया जा सकता।<br><br>यहाँ कोई लोग इस दोषका इस प्रकार परिहार बतलाते हैं—परमात्मा साक्षात् अपने रूपसे भूतोंमें अनुप्रविष्ट नहीं है; तो फिर क्या बात |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४७१

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४७१


| विकारभावमापन्नो विज्ञानात्मत्वं प्रतिपेदे । स च विज्ञानात्मा परस्मादन्योऽनन्यश्च । येनान्यः, तेन संसारित्वसम्बन्धी, येनानन्यः, तेन अहं ब्रह्मेत्यवधारणार्हः । एवं सर्वमविरुद्धं भविष्यतीति । <br><br> तत्र विज्ञानात्मनो विकारपक्षे एता गतयः—पृथिवीद्रव्यवदनेकद्रव्यसमाहारस्य सावयवस्य परमात्मन एकदेशविपरिणामो विज्ञानात्मा घटादिवत् । पूर्वसंस्थानावस्थस्य वा परस्यैकदेशो विक्रियते केशोषरादिवत्, सर्व एव वा परः परिणमेत्क्षीरादिवत् । | है? वह विकारभावको प्राप्त होकर विज्ञानात्मत्वको प्राप्त हुआ है और वह विज्ञानात्मा परमात्मासे भिन्न एवं अभिन्न भी है। चूँकि वह भिन्न है, इसलिये संसारित्वसे सम्बन्ध रखनेवाला है और अभिन्न होनेके कारण 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकारके निश्चयकी योग्यता रखता है। इस प्रकार माननेसे [श्रुति, स्मृति एवं न्यायादि] सब अनुकूल रहेंगे। <br><br> तहाँ (इस सिद्धान्तके अनुसार) विज्ञानात्माको परमात्माका विकार माननेके पक्षमें तीन गतियाँ हो सकती हैं—(१) पृथिवी द्रव्यके समान अनेक द्रव्योंके संघात रूप सावयव परमात्माका विज्ञानात्मा घटादिकी तरह एकदेशी परिणाम है' (२) अथवा अपने पूर्वरूपमें स्थित परमात्माका एक ही देश केश या ऊषरभूमिके समान [विज्ञानात्मरूपसे] विकारको प्राप्त होता है, (३) अथवा दुग्धादिके समान सारा ही परमात्मा विकारको प्राप्त हो जाता है। | | (उक्तपक्षप्रतिषेधः) <br> तत्र समानजातीयानेकद्रव्यसमूहस्य कश्चिद् द्रव्यविशेषो विज्ञानात्मत्वं प्रतिपद्यते यदा, तदा समानजातीय- | इन पक्षोंमेंसे यदि [यह माना जाय कि] समान जातिवाले अनेक द्रव्योंके समुदायका कोई द्रव्यविशेष ही विज्ञानात्मत्वको प्राप्त होता है तो समानजातीय होनेके कारण उन |

४७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
त्वादेकत्वमुपचारितमेव न तु परमार्थतः । तथा च सति सिद्धान्तविरोधः ।(परमात्मा और विज्ञानात्मा) का एकत्व उपचारसे ही होगा, परमार्थतः नहीं । ऐसा माननेपर सिद्धान्तसे विरोध आवेगा ।
अथ नित्यायुतसिद्धावयवानुगतोऽवयवी पर आत्मा, तस्य तदवस्थस्यैकदेशो विज्ञानात्मा संसारी--तदापि सर्वावयवानुगतत्वादवयविन एवावयवगतो दोषो गुणो वेति, विज्ञानात्मनः संसारित्वदोषेण पर एवात्मा सम्बध्यत इति, इयमप्यनिष्टा कल्पना ।और यदि परमात्मा नित्य अयुतसिद्ध अवयवोंमें अनुगत अवयवी है और उसी रूपमें स्थित हुए उस परमात्माका एकदेश संसारी विज्ञानात्मा है तो उस अवस्था में भी अवयवगत गुण या दोष समस्त अवयवोंमें अनुगत होनेके कारण अवयवीमें ही रहेगा; इस प्रकार विज्ञानात्माके संसारित्वरूप दोषसे परमात्माका ही सम्बन्ध सिद्ध होता है । अतः यह कल्पना भी इष्ट नहीं हो सकती ।
क्षीरवत्सर्वपरिणामपक्षे सर्वश्रुतिस्मृतिकोपः, स चानिष्टः । "निष्कल निष्क्रियं शान्तम्” (श्वे० उ० ६ । १९) "दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु०उ० २ । १ । २) "आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः” “स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतः”(बृ० उ० ४ । ४ । २५) "न जायते म्रियते वा कदाचित्” (गीता २ । २०) "अव्यक्तोऽयम्” (गीता २।२५) इत्यादिदुग्धके समान सम्पूर्ण परमात्माका परिणाम माननेके पक्षमें भी समस्त श्रुति-स्मृतियोंसे विरोध होता है और यह इष्ट नहीं है । अतः ये सब पक्ष "निष्कल, निष्क्रिय और शान्त है” 'पुरुष दिव्य, अमूर्त, बाहर-भीतर विद्यमान और अजन्मा है” “वह आकाशके समान सर्वगत और नित्य है”, “वह यह महान् अजन्मा आत्मा अजर, अमर एवं अमृत है”, "वह न कभी उत्पन्न होता है और न मरता है”, वह "अव्यक्त है”

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४७३

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४७३


संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
श्रुतिस्मृतिन्यायविरुद्धा एते सर्वे पक्षाः।इत्यादि श्रुति, स्मृति और युक्तियोंसे विरुद्ध हैं।
अचलस्य परमात्मन एकदेशपक्षे विज्ञानात्मनः कर्मफलवद्देशसंसरणानुपपत्तिः, परस्य वा संसारित्वम्—इत्युक्तम्। परस्यैकदेशोऽग्निविस्फुलिङ्गवत्स्फुटितो विज्ञानात्मा संसरतीति चेत् — तथापि परस्यावयवस्फुटनेन क्षतप्राप्तिः, तत्संसरणे च परमात्मनः प्रदेशान्तरावयव्यूहे छिद्रताप्राप्तिः; अव्रणत्ववाक्यविरोधश्च । आत्मावयवभूतस्य विज्ञानात्मनः संसरणे परमात्मशून्यप्रदेशाभावादवयवान्तरनोदनव्यूहनाभ्यां हृदयशूलेनेव परमात्मनो दुःखित्वप्राप्तिः ।अचल परमात्माके एक देशमें विज्ञानात्मा है—इस पक्षमें विज्ञानात्माका कर्मफलयुक्त देशमें जाना सम्भव नहीं है तथा परमात्माको संसारित्वकी प्राप्ति होती है—ऐसा ऊपर कहा जा चुका है। यदि कहो कि अग्निसे चिनगारीके समान परमात्माका एक देशरूप विज्ञानात्मा उससे अलग होकर आता-जाता है तो भी अवयवके फूटकर अलग हो जानेसे परमात्मामें क्षतकी प्राप्ति होगी तथा उसके जानेपर परमात्माके अन्य देशस्थ अवयवसमुदायमें छेदकी भी प्राप्ति होगी और इस प्रकार परमात्माकी निश्छिद्रताका प्रतिपादन करनेवाले वाक्यसे विरोध होगा। परमात्मासे शून्य देशका अभाव होनेके कारण आत्माके अवयवभूत विज्ञानात्माको संसारित्वकी प्राप्ति होनेपर अवयवान्तरके ह्रास और वृद्धिके कारण परमात्माको हृदयशूलके समान दुःखकी प्राप्ति होगी।
अग्निविस्फुलिङ्गादिदृष्टान्तश्रुतेर्न दोष इति चेत् ?पूर्व०—किंतु आगकी चिनगारी आदि दृष्टान्तोंका वर्णन करनेवाली श्रुति होनेके कारण ऐसा माननेमें भी कोई दोष नहीं हो सकता—यदि ऐसा कहें तो ?

४७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४७४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| न, श्रुतेर्ज्ञापकत्वात्; न शास्त्रं पदार्थानन्यथा कर्तुं प्रवृत्तम्। किं तर्हि ? यथाभूतानामज्ञातानां ज्ञापने। | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है; क्योंकि श्रुति तो केवल ज्ञान ही करानेवाली है। शास्त्रकी प्रवृत्ति पदार्थोंको अन्यथा करनेके लिये नहीं है। तो फिर किस लिये है ? यथाभूत अज्ञात पदार्थोंको ज्ञात करानेके लिये। | | किञ्चातः ! | पूर्व०-इससे क्या होता है ? | | शृणु—अतो यद्भवति, यथाभूता मूर्तामूर्तादिपदार्थधर्मा लोके प्रसिद्धाः। तद्दृष्टान्तोपादानेन तदविरोध्येव वस्त्वन्तरं ज्ञापयितुं प्रवृत्तं शास्त्रं न लौकिकवस्तुविरोधज्ञापनाय लौकिकमेव दृष्टान्तमुपादत्ते। उपादीयमानोऽपि दृष्टान्तोऽनर्थकः स्याद्दाष्टन्तिकासङ्गतेः। न ह्यग्निः शीत आदित्यो न तपतीति वा दृष्टान्तशतेनापि प्रतिपादयितुं शक्यम्, प्रमाणान्तरेणान्यथाधिगतत्वाद्वस्तुनः। न च प्रमाणं प्रमाणान्तरेण विरुध्यते, प्रमाणान्तराविषयमेव हि प्रमाणा- | सिद्धान्ती-इससे जो होता है, सो सुनो। लोकमें वास्तविक ही मूर्त और अमूर्तादिरूप पदार्थ-धर्म प्रसिद्ध हैं। उन्हें दृष्टान्तरूपसे ग्रहण कर शास्त्र उनसे अविरोधी एक अन्य वस्तुको बतलानेके लिये प्रवृत्त होता है। वह लौकिक वस्तुओंका विरोध सूचित करनेके लिये लौकिक दृष्टान्तोंको ही ग्रहण करता हो-ऐसी बात नहीं है। ऐसा दृष्टान्त तो दाष्टन्तिकसे असंगत होनेके कारण ग्रहण किये जानेपर भी व्यर्थ ही होगा। अग्नि शीतल होता है, अथवा सूर्य नहीं तपता-यह बात, सैकड़ों दृष्टान्तोंसे भी प्रतिपादित नहीं हो सकती; क्योंकि अन्य प्रमाणसे तो वह वस्तु दूसरे प्रकारकी जानी जाती है। एक प्रमाणका दूसरे प्रमाणसे विरोध नहीं होता। जो वस्तु एक प्रमाणसे नहीं जानी जाती उसीको |

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७५ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४७५

संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
न्तरं ज्ञापयति । न च लौकिकपदपदार्थाश्रयणव्यतिरेकेणागमेन शक्यमज्ञातं वस्त्वन्तरमवगमयितुम् । तस्मात्प्रसिद्धन्यायमनुसरता न शक्या परमात्मनः सावयवांशांशित्वकल्पना परमार्थतः प्रतिपादयितुम् ।<br><br>“क्षुद्रा विस्फुलिङ्गाः” (बृ० उ० २।१।२०) “ममैवांशः” (गीता १५।७) इति च श्रूयते स्मर्यते चेति चेन्न, एकत्वप्रत्ययार्थपरत्वात् । अग्नेर्हि विस्फुलिङ्गोऽग्निरैव इत्येकत्वप्रत्ययार्हो दृष्टो लोके; तथा चांशोंऽशिनैकत्वप्रत्ययार्हः; तत्रैवं सति विज्ञानात्मनः परमात्मविकारांशत्ववाचकाः शब्दाः परमात्मैकत्वप्रत्ययाधित्सवः ।<br><br>उपक्रमोपसंहाराभ्यां च—दूसरा प्रमाण बतलाता है । तथा लौकिक पद और पदार्थोंका आश्रय लिये बिना शास्त्रके द्वारा किसी अज्ञात वस्त्वन्तरको नहीं जाना जा सकता । अतः इस प्रसिद्ध न्यायका अनुसरण करनेवाले पुरुषके द्वारा परमात्माके सावयवत्व और [जीवके साथ उसके] अंशांशित्वकी कल्पनाका परमार्थतः प्रतिपादन नहीं किया जा सकता ।<br><br>यदि कहो कि “क्षुद्र विस्फुलिङ्ग” और “मेरा ही अंश है' इस प्रकार श्रुति और स्मृति भी कहती हैं तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि वे तो [जीवात्मा और परमात्माके] एकत्वकी प्रीतितिके लिये हैं। अग्निकी चिनगारी अग्नि ही होती है, इसलिये लोकमें वह अग्निके साथ एकत्व-प्रतीतिका योग्य देखा गया है । इसी प्रकार अंशीके साथ अंश भी एकत्व-प्रतीतिका योग्य है।' अतः ऐसी स्थितिमें विज्ञानात्माको परमात्माका विकार या अंश बतलानेवाले शब्द परमात्माके साथ उसके एकत्वकी प्रतीति कराना चाहते हैं ।<br><br>उपक्रम और उपसंहारसे भी यही बात सिद्ध होती है । सभी उप-

४७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

४७६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| सर्वासु ह्युपनिषत्सु पूर्वमेकत्वं प्रतिज्ञाय, दृष्टान्तैर्हेतुभिश्च परमात्मनो विकारांशादित्वं जगतः प्रतिपाद्य, पुनरेकत्वमुपसंहरति; तद्यथेहैव तावत् "इदं सर्वं यदयमात्मा" (२।४।६) इति प्रतिज्ञाय, उत्पत्तिस्थितिलयहेतुदृष्टान्तैर्विकारविकारित्वाद्येकत्वप्रत्ययहेतून्प्रतिपाद्य "अनन्तरमबाह्यम्" (२।५।१९) "अयमात्मा ब्रह्म" (२।५।१९) इत्युपसंहरिष्यति । तस्मादुपक्रमोपसंहाराभ्यामयमर्थो निश्चीयते परमात्मैकत्वप्रत्ययद्रढिम्न उत्पत्तिस्थितिलयप्रतिपादकानि वाक्यानीति । | निषदोंने पहले उनके एकत्वकी प्रतिज्ञा कर हेतु और दृष्टान्तोंके द्वारा जगत्‌को परमात्माका विकार या अंशादि बतलाकर फिर उनके एकत्वका उपसंहार किया है, जैसे कि यहाँ भी पहले "यह जो कुछ है, सब आत्मा है" ऐसी प्रतिज्ञाकर उत्पत्ति, स्थिति, लय, हेतु और दृष्टान्तोंके द्वारा उनके एकत्वज्ञानके हेतुभूत विकार और विकारित्वादिका प्रतिपादन कर "अन्तरबाह्यशून्य है", "यह आत्मा ब्रह्म है" इस प्रकार उपसंहार किया जायगा। अतः उपक्रम और उपसंहारके द्वारा यह तात्पर्य निश्चित होता है कि जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और लयका प्रतिपादन करनेवाले वाक्य परमात्माके साथ उसके एकत्वज्ञानकी दृढ़ता करानेके लिये हैं। | | अन्यथा वाक्यभेदप्रसङ्गाच्च—<br>सर्वोपनिषत्सु हि विज्ञानात्मनः परमात्मनैकत्वप्रत्ययो विधीयत इत्यविप्रतिपत्तिः सर्वेषामुपनिषद्विदिनाम् । तद्विध्येकवाक्ययोगे च सम्भवत्युत्पत्त्यादिवाक्यानां वा- | यदि ऐसा न माना जायगा तो वाक्यभेदका प्रसङ्ग उपस्थित होगा। सभी उपनिषदोंमें परमात्माके साथ विज्ञानात्माके एकत्वज्ञानका विधान किया गया है, इस विषयमें सभी उपनिषद्‌वेत्ताओंकी एक राय है—किसीका मतभेद नहीं है। उत्पत्त्यादि वाक्योंकी भी उस विधिके साथ एकवाक्यता सम्भव होनेपर उन्हें भिन्न |

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७७ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४७७
संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
क्यान्तरत्वकल्पनायां न प्रमाणमस्ति; फलान्तरं च कल्पयितव्यं स्यात्; तस्मादुत्पत्त्यादिश्रुतय आत्मैकत्वप्रतिपादनपराः ।अर्थका प्रतिपादन करनेवाला माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। इसके सिवा [उन्हें अन्यार्थपरक माननेपर] उनके फलान्तरकी भी कल्पना करनी पड़ेगी। अतः उत्पत्त्यादि श्रुतियाँ आत्माका एकत्व प्रतिपादन करनेवाली ही हैं।
अत्र च सम्प्रदायविद् आख्यायिकां सम्प्रचक्षते—कश्चित्किल राजपुत्रो जातमात्र एव मातापितृभ्यामपविद्धो व्याधगृहे संवर्धितः, सोऽमुष्य वंश्यतामजानन्व्याधजातिप्रत्ययो व्याधजातिकर्माप्येवानुवर्तते; न राजास्मीति राजजातिकर्माण्यनुवर्तते । यदा पुनः कश्चित्परमकारुणिको राजपुत्रस्य राजश्रीप्राप्तियोग्यतां जानन्नमुष्य पुत्रतां बोधयति—‘न त्वं व्याधोऽमुष्य राज्ञः पुत्रः-कथञ्चिद्व्याधगृगमनुप्रविष्टः’इति— स एवं बोधितस्त्यक्त्वा व्याधजाति-इस विषयमें सम्प्रदायवेत्ता (श्रीद्रविडाचार्य) यह आख्यायिका कहते हैं-कोई राजपुत्र जन्म होते ही माता-पिताद्वारा त्याग दिया जानेके कारण व्याधके घरमें पाला-पोसा गया। वह अपनी कुलीनताको न जाननेके कारण अपनेको व्याधजातिका ही मानकर व्याधजातिके कर्मोंका ही अनुवर्तन करता था, 'मैं राजा हूँ' ऐसा मानकर राजोचित कर्म नहीं करता था। जब कोई अत्यन्त कृपालु पुरुष, जो राजपुत्रकी राजश्री प्राप्त करनेकी योग्यता जानता है, उसे उसकी राजपुत्रताका बोध करा देता है और यह बतला देता है कि 'तू व्याध नहीं है, अमुक राजाका पुत्र है, किसी प्रकार इस व्याधके घरमें आ गया है' तो इस प्रकार बोध कराये जानेपर वह व्याधजातिके प्रत्ययसे होनेवाले कर्मोंको छोड़कर 'मैं राजा हूँ' ऐसा

| ४७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |

४७८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

संस्कृतहिन्दी
प्रत्ययकर्मणि पितृपैतामहीमात्मनः पदवीमनुवर्तते राजाहमस्मीति ।मानकर अपने बाप-दादोंके मार्गका अनुसरण करने लगता है ।
तथा किलायं परस्मादग्निविस्फुलिङ्गादिवत्तज्जातिरेव विभक्त इह देहेन्द्रियादिगहने प्रविष्टोऽसंसारी सन् देहेन्द्रियादिसंसारधर्ममनुवर्तते ‘देहेन्द्रियसङ्घातोऽस्मि कृशः स्थूलः सुखी दुःखी’ इति परमात्मतामजानन्नात्मनः । न त्वमेतदात्मकः परमेव ब्रह्मास्यसंसारीति प्रतिबोधित आचार्येण हित्वैषणात्रयानुवृत्तिं ब्रह्मैवास्मीति प्रतिपद्यते । अत्र राजपुत्रस्य राजप्रत्ययवद्ब्रह्मप्रत्ययो दृढीभवति—विस्फुलिङ्गवदेव त्वं परस्माद् ब्रह्मणो भ्रष्ट इत्युक्ते विस्फुलिङ्गस्य प्रागग्नेर्भ्रंशाद्दग्न्येकत्वदर्शनात् ।<br>तस्मादेकत्वप्रत्ययदाढ्र्याय सुवर्णमणिलोहाग्निविस्फुलिङ्गदृष्टान्ताः,इसी प्रकार अग्निकी चिनगारियोंके समान परमात्मासे विभक्त यह उसी (परमात्मा) की जातिवाला विज्ञानात्मा यहाँ देह एवं इन्द्रियादि गहनवनमें प्रविष्ट होनेपर असंसारी होकर भी अपनी परमात्मस्वरूपताको न जाननेके कारण ‘मैं देहेन्द्रियादिका संघात तथा कृश, स्थूल एवं सुखी या दुखी हूँ’ ऐसा मानकर देह एवं इन्द्रियादि सांसारिक धर्मोंका अनुवर्तन करता है। किंतु ‘तू देहेन्द्रियादिरूप नहीं है, अपि तु असंसारी ब्रह्म ही है’ इस प्रकार आचार्यद्वारा बोध कराये जानेपर यह एषणात्रयकी अनुवृत्तिको छोड़कर ‘मैं ब्रह्म ही हूँ’ ऐसा जान लेता है। तथा यहाँ ऐसा कहनेपर कि ‘तू अग्निसे विस्फुलिङ्गके समान परब्रह्मसे ही च्युत हुआ है’ राजपुत्रके राजप्रत्ययके समान उसका ब्रह्मप्रत्यय दृढ़ हो जाता है, क्योंकि अग्निसे च्युत होनेसे पूर्व विस्फुलिङ्गकी अग्निके साथ एकता देखी गयी है।<br>अतः सुवर्ण, मणि, लोह एवं अग्नि-विस्फुलिङ्गादि दृष्टान्त एकत्वज्ञानकी दृढ़ताके लिये हैं,

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७९ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४७९
संस्कृत-भाष्यम्भाष्यार्थ
नोत्पत्त्यादिभेदप्रतिपादनपराः। सैन्धवघनवत्प्रज्ञप्त्येकरसनैरन्तर्यावधारणात् "एकधैवानुद्रष्टव्यम्" (४।४।२०) इति च। यदि च ब्रह्मणश्चित्रपटवद्वृक्षसमुद्रादिवच्चोत्पत्त्याद्यनेकधर्मविचित्रता विजिग्राहयिषिता, एकरसं सैन्धवघनवदनन्तरमबाह्यमिति नोपसमहरिष्यत्, 'एकधैवानुद्रष्टव्यम्' इति च न प्रायोक्ष्यत्— "य इह नानेव पश्यति" (४।४।१९) इति निन्दावचनं च। तस्मादेकरूपैकत्वप्रत्ययदार्ढ्यायैव सर्ववेदान्तेषूत्पत्तिस्थितिलयादिकल्पना, न तत्प्रत्ययकरणाय।उत्पत्ति आदिका भेद प्रदर्शित करनेके लिये नहीं हैं। तथा "उसे एकरूप ही देखना चाहिये" इस श्रुतिसे नमकके डलेके समान उसे ज्ञानरूप एकरससे निरन्तर परिपूर्ण भी निश्चय किया गया है। यदि चित्रपट अथवा वृक्ष या समुद्रादिके समान उत्पत्ति आदि अनेक धर्मोंके कारण ब्रह्मकी विचित्रताका ही ग्रहण करना अभीष्ट होता तो 'वह नमकके डलेके समान एकरस एवं अन्तरबाह्यशून्य है' इस प्रकार उपसंहार न किया जाता तथा उसे "एकरूप ही देखना चाहिये" ऐसे आदेशका और "जो इसे नानावत् देखता है [ वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ]" ऐसे निन्दासूचक वचनका भी प्रयोग न होता। अतः समस्त वेदान्तोंमें जो उत्पत्ति, स्थिति एवं लय आदिकी कल्पना है, वह ब्रह्मकी एकरूपताके ज्ञानकी दृढ़ताके लिये ही है, उन ( उत्पत्त्यादि ) की प्रतीति करानेके लिये नहीं है।
न च निरवयवस्य परमात्मनोऽसंसारिणः संसार्येकदेशकल्पना न्याय्या, स्वतोऽदेशत्वात्परमात्मनः। अदेशस्य परस्य एकदेश-इसके सिवा निरवयव और असंसारी परमात्माके संसारीरूप एक देशकी कल्पना करना युक्तियुक्त भी नहीं है, क्योंकि स्वयं परमात्मामें तो देश है नहीं। देशहीन परमात्माके

४८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

४८०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| संसारित्वकल्पनायां पर एव संसारीति कल्पितं भवेत् । अथ परोपाधिकृत एकदेशः परस्य, घटकरकाद्याकाशवत्; न तदा तत्र विवेकिनां परमात्मैकदेशः पृथक्संव्यवहारभागिति बुद्धिरुत्पद्यते । | एकदेशमें संसारित्वकी कल्पना करनेमें 'परमात्मा ही संसारी है' ऐसी कल्पना हो जायगी और यदि ऐसा माना जाय कि घटाकाश और करकाकाशादिके समान किसी अन्य उपाधिके कारण विज्ञानात्मा परमात्माका एकदेश है तो उसमें विवेकी पुरुषोंको ऐसी बुद्धि उत्पन्न नहीं हो सकती कि परमात्माका एकदेश पृथक् व्यवहार करनेमें समर्थ है। | | अविवेकिनां विवेकिनां चोपचरिता बुद्धिर्दृष्टेति चेत् ? | पूर्व०-किंतु [मैं कर्ता हूँ] ऐसी गौणी¹ बुद्धि तो अविवेकियों और विवेकियोंको भी होती देखी गयी है ? | | न; अविवेकिनां मिथ्याबुद्धित्वात्, विवेकिनां च संव्यवहारमात्रालम्बनार्थत्वात्-यथा कृष्णो रक्तश्चाकाश इति विवेकिनामपि कदाचित्कृष्णता रक्तता च आकाशस्य संव्यवहारमात्रालम्बनार्थत्वं प्रतिपद्यत इति, न परमार्थतः कृष्णो रक्तो वा आकाशो भवितुमर्हति । अतो न पण्डितै- | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि अविवेकियोंकी तो वह बुद्धि मिथ्या होती है और विवेकियोंकी सम्यक् प्रकारसे व्यवहारको आलम्बन करनेके लिये; जिस प्रकार कि [अविवेकियोंके समान] विवेकियोंकी दृष्टिमें भी कभी-कभी 'आकाश काला अथवा लाल है' इस प्रकार आकाशकी कृष्णता अथवा लाली व्यवहारमात्रके आलम्बनार्थत्वको प्राप्त हो जाती है, किंतु वस्तुतः आकाश काला या लाल नहीं हो सकता। अतः विद्वानों- |


१. वस्तुतः जीव अपरिच्छिन्न ब्रह्ममात्र है, इसलिये इस परिच्छिन्न बुद्धिको गौणी बतलाया गया है।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८१

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८१


| ब्रह्मस्वरूपप्रतिपत्तिविषये ब्रह्मणोंऽशांश्येकदेशैकदेशिविकारविकारित्वकल्पना कार्या, सर्वकल्पनापनयनार्थसारपरत्वात्सर्वोपनिषदाम् ।<br><br>अतो हित्वा सर्वकल्पनामाकाशस्येव निर्विशेषता प्रतिपत्तव्या—<br>“आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः”<br>“न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः” (क० उ० २।२।११) इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः; नात्मानं ब्रह्मविलक्षणं कल्पयेत्—उष्णात्मक इवाग्नौ शीतैकदेशम्, प्रकाशात्मके वा सवितरि तमएकदेशम्—सर्वकल्पनापनयनार्थसारपरत्वात्सर्वोपनिषदाम्। तस्मान्नामरूपोपाधिनिमित्ता एव आत्मन्यसंसारधर्मिणि सर्वे व्यवहाराः; “रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव” (क०उ० २।२।९-१०) “सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वा- | को ब्रह्मस्वरूपके ज्ञानके विषयमें ब्रह्मके अंशांशी, एकदेश-एकदेशी अथवा विकार-विकारित्वादिकी कल्पना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि सारी उपनिषदोंका तात्पर्य समस्त कल्पनाओंकी निवृत्तिरूप मुख्य प्रयोजनमें ही है।<br><br>इसलिये सारी कल्पनाओंको छोड़कर “ब्रह्म आकाशके समान सर्वगत और नित्य है” “वह लोकदुःखसे लिप्त नहीं होता; क्योंकि उससे बाह्य है” इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंके अनुसार आकाशके समान उसकी निर्विशेषताका ही अनुभव करना चाहिये, उष्णस्वरूप अग्निमें एक शीतल देशके समान तथा प्रकाशस्वरूप सूर्यमें एक अन्धकारमय देशके समान ब्रह्मसे भिन्न आत्माकी कल्पना न करे; क्योंकि सब उपनिषदोंका तात्पर्य समस्त कल्पनाओंकी निवृत्तिरूप मुख्य प्रयोजनमें ही है। अतः असंसारधर्मी आत्मामें सारे व्यवहार नाम एवं रूपकृत उपाधिके कारण ही हैं, जैसा कि “वह रूप-रूपके अनुरूप हो गया है” “धीर पुरुष समस्त रूपोंकी रचना कर उनके नाम रखकर उनके द्वारा बोलता |

बृ० उ० ३१—

४८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| भिवदन्यदास्ते" इत्येवमादिमन्त्रवर्णेभ्यः।<br><br>न स्वत आत्मनः संसारित्वम्, अलक्तकाद्युपाधिसंयोगजनितरक्तस्फटिकादिबुद्धिवद्भ्रान्तमेव, न परमार्थतः। "ध्यायतीव लेलायतीव" (बृ० उ० ४ । ३ । ७) "न वर्धते कर्मणा नो कनीयान्" (४ । ४ । २३) "न लिप्यते कर्मणा पापकेन" (४ । ४ । २३) "समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तम्" (गीता १३ । २७) "शुनि चैव श्वपाके च" (गीता ५ । १८) इत्यादिश्रुतिस्मृतिन्यायेभ्यः परमात्मनोऽसंसारित्वैव। अत एकदेशो विकारः शक्तिर्वा विज्ञानात्मा अन्यो वेति विकल्पयितुं निरवयवत्वाभ्युपगमे विशेषतो न शक्यते। अंशादिश्रुतिस्मृतिवादाश्चैकत्वार्थाः, न तु भेदप्रतिपादकाः, विवक्षितार्थैकवाक्ययोगात्—इत्यवोचाम।<br><br>(उपनिषत्प्रामाण्यमीमांसा)<br>सर्वोपनिषदां परमात्मैकत्वज्ञापनपरत्वे अथ किमर्थं तत्प्रतिकूलोऽर्थो विज्ञानात्मभेदः परि- | रहता है" इत्यादि मन्त्रवर्णोंसे सिद्ध होता है।<br><br>आत्माका संसारित्व स्वतः नहीं है, अपितु लाक्षा आदि उपाधिके संयोगसे होनेवाली 'स्फटिक लाल है' इत्यादि बुद्धिके समान भ्रान्तिजनित ही है, परमार्थतः नहीं। "मानो ध्यान करता है, मानो अधिक चलता है", "यह कर्मसे न बढ़ता है, न छोटा होता है" "यह पापकर्मसे लिप्त नहीं होता" "समस्त भूतोंमें समानरूपसे स्थित", "कुत्ते और चाण्डालमें" इत्यादि श्रुति, स्मृति और युक्तियोंसे परमात्माका असंसारित्व ही सिद्ध होता है। अतः विशेषतः आत्माका निरवयवत्व स्वीकार करनेपर ऐसा विकल्प नहीं किया जा सकता कि विज्ञानात्मा परमात्माका एकदेश, विकार, शक्ति अथवा और कुछ है। उसके अंशादि होनेका प्रतिपादन करनेवाले श्रुतिस्मृतिवाद भी आत्माके एकत्वके ही लिये हैं, भेदका प्रतिपादन करनेवाले नहीं हैं, क्योंकि उपनिषदोंके विवक्षित अर्थकी एकवाक्यता होनी चाहिये—ऐसा हम पहले कह चुके हैं।<br><br>समस्त उपनिषदोंका तात्पर्य परमात्माके एकत्वमें है, फिर विज्ञानात्माके भेदरूप उससे प्रतिकूल विषयकी कल्पना किस लिये की जाती |