बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 474, कुल 1402 में से
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| ४६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| स्मीति न गृह्णीयात् परं हि देवमीशानं निकृष्टः संसार्थ्यात्मत्वेन स्मरन्कथं न दोषभाक् स्यात्? तस्मान्नाहं ब्रह्मास्मीति युक्तम् । तस्मात् पुष्पोदकाञ्जलिस्तुतिनमस्कारवल्युपहारस्वाध्यायाध्ययनयोगादिभिरारिराधयिषेत् । आराधनेन विदित्वा सर्वेशितृ ब्रह्म भवति । न पुनरसंसारि ब्रह्म संसार्थ्यात्मत्वेन चिन्तयेदग्निमिव शीतत्वेन आकाशमिव मूर्त्तिमत्त्वेन । ब्रह्मात्मत्वप्रतिपादकमपि शास्त्रमर्थवादो भविष्यति । सर्वतर्कशास्त्रलोकन्यायैश्चैवमविरोधः स्यात् । | इस प्रकार ग्रहण नहीं कर सकता । भला, निम्नकोटिका संसारी जीव परम देव ईश्वरको आत्मभावसे स्मरण करके किस प्रकार दोषका भागी न होगा ? इसलिये 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा मानना उचित नहीं हो सकता । अतः पुष्पाञ्जलि, स्तुति, नमस्कार, बलि, उपहार, जप, अध्ययन और योगादिके द्वारा उसकी आराधना करनेकी इच्छा करे। उसे आराधनाके द्वारा जानकर जीव सबका शासन करनेवाला ब्रह्म हो जाता है। जिस प्रकार अग्निको शीतरूपसे तथा आकाशको मूर्तरूपसे चिन्तन करना उचित नहीं है, उसी प्रकार संसारी जीव असंसारी ब्रह्मका आत्मभावसे चिन्तन नहीं कर सकता। आत्माकी ब्रह्मस्वरूपताका प्रतिपादन करनेवाला शास्त्र भी अर्थवाद ही होगा। तथा ऐसा माननेपर समस्त युक्ति, शास्त्र और लौकिक न्यायोंसे विरोध नहीं रह सकता। |
| न; मन्त्रब्राह्मणवादेभ्यस्तस्यैव<br>उक्तपक्षनिरासः प्रवेशश्रवणात् ।<br>“पुरश्चक्रे” इति प्रकृत्य “पुरः पुरुष आविशत् (बृ० उ० २ । ५ । १८) इति “रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्ष- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि मन्त्र और ब्राह्मणवाक्योंद्वारा उस (परब्रह्म) का ही प्रवेश सुना गया है। “[शरीररूप] पुरोंकी रचना की” इस प्रकार प्रकरण उठाकर “पुरुषने पुरोंमें प्रवेश किया” “वह रूप-रूपके अनुरूप हो गया इसका वह रूप प्रत्यक्ष करनेके लिये |