भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 473, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 473

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४६७


संस्कृतहिन्दी
४।७) इत्यादिश्रुतिभ्य आकाशशब्दः पर आत्मेति निश्चीयते; "दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः" (छा० उ० ८।१।१) इति प्रस्तुत्य तस्मिन्नेवात्मशब्दप्रयोगाच्च। प्रकृत एव पर आत्मा। तस्माद्युक्तम् ‘एवमेवास्मादात्मनः’ इति परमात्मन एव सृष्टिरिति। संसारिणः सृष्टिस्थितिसंहारज्ञानसामर्थ्याभावं चावोचाम।इत्यादि श्रुतियोंसे आकाशशब्दसे कहा जानेवाला पर आत्मा ही है—ऐसा निश्चय होता है, तथा "इसमें अन्तराकाश दहर है" इस प्रकार प्रसङ्ग उठाकर उसी अर्थमें 'आत्मा' शब्दका प्रयोग भी किया गया है। इसलिये भी यहाँपर आत्माका ही प्रसङ्ग है। अतः 'इसी प्रकार इस आत्मासे' इस वाक्यद्वारा परमात्मासे ही सृष्टि होती है—ऐसा मानना ही उचित है। इसके सिवा हम संसारी जीवमें तो जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारके ज्ञानकी शक्तिका अभाव भी बतला चुके हैं।
(द्वैतवादिपक्षोद्भावनम्)<br>अत्र च "आत्मेत्येवोपासीत" (१।४।७) "आत्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि" (१।४।१०) इति ब्रह्मविद्या प्रस्तुता। ब्रह्मविषयं च ब्रह्मविज्ञानमिति 'ब्रह्म ते ब्रवाणि' इति 'ब्रह्म ज्ञापयिष्यामि' इति प्रारब्धम्। तत्रेदानीमसंसारि ब्रह्म जगतः कारणमशनायाद्यतीतं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावम्, तद्विपरीतश्च संसारी, तस्मादहं ब्रह्मा-पूर्व०—यहाँ भी "आत्मा है-इस प्रकार ही उपासना करे", "आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ" इस प्रकार ब्रह्मविद्याका ही प्रसङ्ग है। तथा ब्रह्मविज्ञान ब्रह्मविषयक ही होता है, जो कि 'मैं तुझे ब्रह्मका उपदेश करूँ', 'तुझे ब्रह्मका बोध कराऊँगा' इत्यादि श्रुतियोंसे आरम्भ किया है। यहाँ क्षुधादिसे रहित, नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव असंसारी ब्रह्म जगत्का कारण बतलाया गया है। संसारी जीव उससे विपरीत स्वभाववाला है। इसलिये वह अपनेको 'मैं ब्रह्म हूँ'