भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 483, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 483
ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४७७
संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
क्यान्तरत्वकल्पनायां न प्रमाणमस्ति; फलान्तरं च कल्पयितव्यं स्यात्; तस्मादुत्पत्त्यादिश्रुतय आत्मैकत्वप्रतिपादनपराः ।अर्थका प्रतिपादन करनेवाला माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। इसके सिवा [उन्हें अन्यार्थपरक माननेपर] उनके फलान्तरकी भी कल्पना करनी पड़ेगी। अतः उत्पत्त्यादि श्रुतियाँ आत्माका एकत्व प्रतिपादन करनेवाली ही हैं।
अत्र च सम्प्रदायविद् आख्यायिकां सम्प्रचक्षते—कश्चित्किल राजपुत्रो जातमात्र एव मातापितृभ्यामपविद्धो व्याधगृहे संवर्धितः, सोऽमुष्य वंश्यतामजानन्व्याधजातिप्रत्ययो व्याधजातिकर्माप्येवानुवर्तते; न राजास्मीति राजजातिकर्माण्यनुवर्तते । यदा पुनः कश्चित्परमकारुणिको राजपुत्रस्य राजश्रीप्राप्तियोग्यतां जानन्नमुष्य पुत्रतां बोधयति—‘न त्वं व्याधोऽमुष्य राज्ञः पुत्रः-कथञ्चिद्व्याधगृगमनुप्रविष्टः’इति— स एवं बोधितस्त्यक्त्वा व्याधजाति-इस विषयमें सम्प्रदायवेत्ता (श्रीद्रविडाचार्य) यह आख्यायिका कहते हैं-कोई राजपुत्र जन्म होते ही माता-पिताद्वारा त्याग दिया जानेके कारण व्याधके घरमें पाला-पोसा गया। वह अपनी कुलीनताको न जाननेके कारण अपनेको व्याधजातिका ही मानकर व्याधजातिके कर्मोंका ही अनुवर्तन करता था, 'मैं राजा हूँ' ऐसा मानकर राजोचित कर्म नहीं करता था। जब कोई अत्यन्त कृपालु पुरुष, जो राजपुत्रकी राजश्री प्राप्त करनेकी योग्यता जानता है, उसे उसकी राजपुत्रताका बोध करा देता है और यह बतला देता है कि 'तू व्याध नहीं है, अमुक राजाका पुत्र है, किसी प्रकार इस व्याधके घरमें आ गया है' तो इस प्रकार बोध कराये जानेपर वह व्याधजातिके प्रत्ययसे होनेवाले कर्मोंको छोड़कर 'मैं राजा हूँ' ऐसा