भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 482
४७६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| सर्वासु ह्युपनिषत्सु पूर्वमेकत्वं प्रतिज्ञाय, दृष्टान्तैर्हेतुभिश्च परमात्मनो विकारांशादित्वं जगतः प्रतिपाद्य, पुनरेकत्वमुपसंहरति; तद्यथेहैव तावत् "इदं सर्वं यदयमात्मा" (२।४।६) इति प्रतिज्ञाय, उत्पत्तिस्थितिलयहेतुदृष्टान्तैर्विकारविकारित्वाद्येकत्वप्रत्ययहेतून्प्रतिपाद्य "अनन्तरमबाह्यम्" (२।५।१९) "अयमात्मा ब्रह्म" (२।५।१९) इत्युपसंहरिष्यति । तस्मादुपक्रमोपसंहाराभ्यामयमर्थो निश्चीयते परमात्मैकत्वप्रत्ययद्रढिम्न उत्पत्तिस्थितिलयप्रतिपादकानि वाक्यानीति । | निषदोंने पहले उनके एकत्वकी प्रतिज्ञा कर हेतु और दृष्टान्तोंके द्वारा जगत्‌को परमात्माका विकार या अंशादि बतलाकर फिर उनके एकत्वका उपसंहार किया है, जैसे कि यहाँ भी पहले "यह जो कुछ है, सब आत्मा है" ऐसी प्रतिज्ञाकर उत्पत्ति, स्थिति, लय, हेतु और दृष्टान्तोंके द्वारा उनके एकत्वज्ञानके हेतुभूत विकार और विकारित्वादिका प्रतिपादन कर "अन्तरबाह्यशून्य है", "यह आत्मा ब्रह्म है" इस प्रकार उपसंहार किया जायगा। अतः उपक्रम और उपसंहारके द्वारा यह तात्पर्य निश्चित होता है कि जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और लयका प्रतिपादन करनेवाले वाक्य परमात्माके साथ उसके एकत्वज्ञानकी दृढ़ता करानेके लिये हैं। | | अन्यथा वाक्यभेदप्रसङ्गाच्च—<br>सर्वोपनिषत्सु हि विज्ञानात्मनः परमात्मनैकत्वप्रत्ययो विधीयत इत्यविप्रतिपत्तिः सर्वेषामुपनिषद्विदिनाम् । तद्विध्येकवाक्ययोगे च सम्भवत्युत्पत्त्यादिवाक्यानां वा- | यदि ऐसा न माना जायगा तो वाक्यभेदका प्रसङ्ग उपस्थित होगा। सभी उपनिषदोंमें परमात्माके साथ विज्ञानात्माके एकत्वज्ञानका विधान किया गया है, इस विषयमें सभी उपनिषद्‌वेत्ताओंकी एक राय है—किसीका मतभेद नहीं है। उत्पत्त्यादि वाक्योंकी भी उस विधिके साथ एकवाक्यता सम्भव होनेपर उन्हें भिन्न |

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