भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 481, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 481
ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४७५

संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
न्तरं ज्ञापयति । न च लौकिकपदपदार्थाश्रयणव्यतिरेकेणागमेन शक्यमज्ञातं वस्त्वन्तरमवगमयितुम् । तस्मात्प्रसिद्धन्यायमनुसरता न शक्या परमात्मनः सावयवांशांशित्वकल्पना परमार्थतः प्रतिपादयितुम् ।<br><br>“क्षुद्रा विस्फुलिङ्गाः” (बृ० उ० २।१।२०) “ममैवांशः” (गीता १५।७) इति च श्रूयते स्मर्यते चेति चेन्न, एकत्वप्रत्ययार्थपरत्वात् । अग्नेर्हि विस्फुलिङ्गोऽग्निरैव इत्येकत्वप्रत्ययार्हो दृष्टो लोके; तथा चांशोंऽशिनैकत्वप्रत्ययार्हः; तत्रैवं सति विज्ञानात्मनः परमात्मविकारांशत्ववाचकाः शब्दाः परमात्मैकत्वप्रत्ययाधित्सवः ।<br><br>उपक्रमोपसंहाराभ्यां च—दूसरा प्रमाण बतलाता है । तथा लौकिक पद और पदार्थोंका आश्रय लिये बिना शास्त्रके द्वारा किसी अज्ञात वस्त्वन्तरको नहीं जाना जा सकता । अतः इस प्रसिद्ध न्यायका अनुसरण करनेवाले पुरुषके द्वारा परमात्माके सावयवत्व और [जीवके साथ उसके] अंशांशित्वकी कल्पनाका परमार्थतः प्रतिपादन नहीं किया जा सकता ।<br><br>यदि कहो कि “क्षुद्र विस्फुलिङ्ग” और “मेरा ही अंश है' इस प्रकार श्रुति और स्मृति भी कहती हैं तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि वे तो [जीवात्मा और परमात्माके] एकत्वकी प्रीतितिके लिये हैं। अग्निकी चिनगारी अग्नि ही होती है, इसलिये लोकमें वह अग्निके साथ एकत्व-प्रतीतिका योग्य देखा गया है । इसी प्रकार अंशीके साथ अंश भी एकत्व-प्रतीतिका योग्य है।' अतः ऐसी स्थितिमें विज्ञानात्माको परमात्माका विकार या अंश बतलानेवाले शब्द परमात्माके साथ उसके एकत्वकी प्रतीति कराना चाहते हैं ।<br><br>उपक्रम और उपसंहारसे भी यही बात सिद्ध होती है । सभी उप-