बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७५ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७५ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| न्तरं ज्ञापयति । न च लौकिकपदपदार्थाश्रयणव्यतिरेकेणागमेन शक्यमज्ञातं वस्त्वन्तरमवगमयितुम् । तस्मात्प्रसिद्धन्यायमनुसरता न शक्या परमात्मनः सावयवांशांशित्वकल्पना परमार्थतः प्रतिपादयितुम् ।<br><br>“क्षुद्रा विस्फुलिङ्गाः” (बृ० उ० २।१।२०) “ममैवांशः” (गीता १५।७) इति च श्रूयते स्मर्यते चेति चेन्न, एकत्वप्रत्ययार्थपरत्वात् । अग्नेर्हि विस्फुलिङ्गोऽग्निरैव इत्येकत्वप्रत्ययार्हो दृष्टो लोके; तथा चांशोंऽशिनैकत्वप्रत्ययार्हः; तत्रैवं सति विज्ञानात्मनः परमात्मविकारांशत्ववाचकाः शब्दाः परमात्मैकत्वप्रत्ययाधित्सवः ।<br><br>उपक्रमोपसंहाराभ्यां च— | दूसरा प्रमाण बतलाता है । तथा लौकिक पद और पदार्थोंका आश्रय लिये बिना शास्त्रके द्वारा किसी अज्ञात वस्त्वन्तरको नहीं जाना जा सकता । अतः इस प्रसिद्ध न्यायका अनुसरण करनेवाले पुरुषके द्वारा परमात्माके सावयवत्व और [जीवके साथ उसके] अंशांशित्वकी कल्पनाका परमार्थतः प्रतिपादन नहीं किया जा सकता ।<br><br>यदि कहो कि “क्षुद्र विस्फुलिङ्ग” और “मेरा ही अंश है' इस प्रकार श्रुति और स्मृति भी कहती हैं तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि वे तो [जीवात्मा और परमात्माके] एकत्वकी प्रीतितिके लिये हैं। अग्निकी चिनगारी अग्नि ही होती है, इसलिये लोकमें वह अग्निके साथ एकत्व-प्रतीतिका योग्य देखा गया है । इसी प्रकार अंशीके साथ अंश भी एकत्व-प्रतीतिका योग्य है।' अतः ऐसी स्थितिमें विज्ञानात्माको परमात्माका विकार या अंश बतलानेवाले शब्द परमात्माके साथ उसके एकत्वकी प्रतीति कराना चाहते हैं ।<br><br>उपक्रम और उपसंहारसे भी यही बात सिद्ध होती है । सभी उप- |
४७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ४७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| सर्वासु ह्युपनिषत्सु पूर्वमेकत्वं प्रतिज्ञाय, दृष्टान्तैर्हेतुभिश्च परमात्मनो विकारांशादित्वं जगतः प्रतिपाद्य, पुनरेकत्वमुपसंहरति; तद्यथेहैव तावत् "इदं सर्वं यदयमात्मा" (२।४।६) इति प्रतिज्ञाय, उत्पत्तिस्थितिलयहेतुदृष्टान्तैर्विकारविकारित्वाद्येकत्वप्रत्ययहेतून्प्रतिपाद्य "अनन्तरमबाह्यम्" (२।५।१९) "अयमात्मा ब्रह्म" (२।५।१९) इत्युपसंहरिष्यति । तस्मादुपक्रमोपसंहाराभ्यामयमर्थो निश्चीयते परमात्मैकत्वप्रत्ययद्रढिम्न उत्पत्तिस्थितिलयप्रतिपादकानि वाक्यानीति । | निषदोंने पहले उनके एकत्वकी प्रतिज्ञा कर हेतु और दृष्टान्तोंके द्वारा जगत्को परमात्माका विकार या अंशादि बतलाकर फिर उनके एकत्वका उपसंहार किया है, जैसे कि यहाँ भी पहले "यह जो कुछ है, सब आत्मा है" ऐसी प्रतिज्ञाकर उत्पत्ति, स्थिति, लय, हेतु और दृष्टान्तोंके द्वारा उनके एकत्वज्ञानके हेतुभूत विकार और विकारित्वादिका प्रतिपादन कर "अन्तरबाह्यशून्य है", "यह आत्मा ब्रह्म है" इस प्रकार उपसंहार किया जायगा। अतः उपक्रम और उपसंहारके द्वारा यह तात्पर्य निश्चित होता है कि जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयका प्रतिपादन करनेवाले वाक्य परमात्माके साथ उसके एकत्वज्ञानकी दृढ़ता करानेके लिये हैं। | | अन्यथा वाक्यभेदप्रसङ्गाच्च—<br>सर्वोपनिषत्सु हि विज्ञानात्मनः परमात्मनैकत्वप्रत्ययो विधीयत इत्यविप्रतिपत्तिः सर्वेषामुपनिषद्विदिनाम् । तद्विध्येकवाक्ययोगे च सम्भवत्युत्पत्त्यादिवाक्यानां वा- | यदि ऐसा न माना जायगा तो वाक्यभेदका प्रसङ्ग उपस्थित होगा। सभी उपनिषदोंमें परमात्माके साथ विज्ञानात्माके एकत्वज्ञानका विधान किया गया है, इस विषयमें सभी उपनिषद्वेत्ताओंकी एक राय है—किसीका मतभेद नहीं है। उत्पत्त्यादि वाक्योंकी भी उस विधिके साथ एकवाक्यता सम्भव होनेपर उन्हें भिन्न |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७७ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७७ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| क्यान्तरत्वकल्पनायां न प्रमाणमस्ति; फलान्तरं च कल्पयितव्यं स्यात्; तस्मादुत्पत्त्यादिश्रुतय आत्मैकत्वप्रतिपादनपराः । | अर्थका प्रतिपादन करनेवाला माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। इसके सिवा [उन्हें अन्यार्थपरक माननेपर] उनके फलान्तरकी भी कल्पना करनी पड़ेगी। अतः उत्पत्त्यादि श्रुतियाँ आत्माका एकत्व प्रतिपादन करनेवाली ही हैं। |
| अत्र च सम्प्रदायविद् आख्यायिकां सम्प्रचक्षते—कश्चित्किल राजपुत्रो जातमात्र एव मातापितृभ्यामपविद्धो व्याधगृहे संवर्धितः, सोऽमुष्य वंश्यतामजानन्व्याधजातिप्रत्ययो व्याधजातिकर्माप्येवानुवर्तते; न राजास्मीति राजजातिकर्माण्यनुवर्तते । यदा पुनः कश्चित्परमकारुणिको राजपुत्रस्य राजश्रीप्राप्तियोग्यतां जानन्नमुष्य पुत्रतां बोधयति—‘न त्वं व्याधोऽमुष्य राज्ञः पुत्रः-कथञ्चिद्व्याधगृगमनुप्रविष्टः’इति— स एवं बोधितस्त्यक्त्वा व्याधजाति- | इस विषयमें सम्प्रदायवेत्ता (श्रीद्रविडाचार्य) यह आख्यायिका कहते हैं-कोई राजपुत्र जन्म होते ही माता-पिताद्वारा त्याग दिया जानेके कारण व्याधके घरमें पाला-पोसा गया। वह अपनी कुलीनताको न जाननेके कारण अपनेको व्याधजातिका ही मानकर व्याधजातिके कर्मोंका ही अनुवर्तन करता था, 'मैं राजा हूँ' ऐसा मानकर राजोचित कर्म नहीं करता था। जब कोई अत्यन्त कृपालु पुरुष, जो राजपुत्रकी राजश्री प्राप्त करनेकी योग्यता जानता है, उसे उसकी राजपुत्रताका बोध करा देता है और यह बतला देता है कि 'तू व्याध नहीं है, अमुक राजाका पुत्र है, किसी प्रकार इस व्याधके घरमें आ गया है' तो इस प्रकार बोध कराये जानेपर वह व्याधजातिके प्रत्ययसे होनेवाले कर्मोंको छोड़कर 'मैं राजा हूँ' ऐसा |
| ४७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
| ४७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| प्रत्ययकर्मणि पितृपैतामहीमात्मनः पदवीमनुवर्तते राजाहमस्मीति । | मानकर अपने बाप-दादोंके मार्गका अनुसरण करने लगता है । |
| तथा किलायं परस्मादग्निविस्फुलिङ्गादिवत्तज्जातिरेव विभक्त इह देहेन्द्रियादिगहने प्रविष्टोऽसंसारी सन् देहेन्द्रियादिसंसारधर्ममनुवर्तते ‘देहेन्द्रियसङ्घातोऽस्मि कृशः स्थूलः सुखी दुःखी’ इति परमात्मतामजानन्नात्मनः । न त्वमेतदात्मकः परमेव ब्रह्मास्यसंसारीति प्रतिबोधित आचार्येण हित्वैषणात्रयानुवृत्तिं ब्रह्मैवास्मीति प्रतिपद्यते । अत्र राजपुत्रस्य राजप्रत्ययवद्ब्रह्मप्रत्ययो दृढीभवति—विस्फुलिङ्गवदेव त्वं परस्माद् ब्रह्मणो भ्रष्ट इत्युक्ते विस्फुलिङ्गस्य प्रागग्नेर्भ्रंशाद्दग्न्येकत्वदर्शनात् ।<br>तस्मादेकत्वप्रत्ययदाढ्र्याय सुवर्णमणिलोहाग्निविस्फुलिङ्गदृष्टान्ताः, | इसी प्रकार अग्निकी चिनगारियोंके समान परमात्मासे विभक्त यह उसी (परमात्मा) की जातिवाला विज्ञानात्मा यहाँ देह एवं इन्द्रियादि गहनवनमें प्रविष्ट होनेपर असंसारी होकर भी अपनी परमात्मस्वरूपताको न जाननेके कारण ‘मैं देहेन्द्रियादिका संघात तथा कृश, स्थूल एवं सुखी या दुखी हूँ’ ऐसा मानकर देह एवं इन्द्रियादि सांसारिक धर्मोंका अनुवर्तन करता है। किंतु ‘तू देहेन्द्रियादिरूप नहीं है, अपि तु असंसारी ब्रह्म ही है’ इस प्रकार आचार्यद्वारा बोध कराये जानेपर यह एषणात्रयकी अनुवृत्तिको छोड़कर ‘मैं ब्रह्म ही हूँ’ ऐसा जान लेता है। तथा यहाँ ऐसा कहनेपर कि ‘तू अग्निसे विस्फुलिङ्गके समान परब्रह्मसे ही च्युत हुआ है’ राजपुत्रके राजप्रत्ययके समान उसका ब्रह्मप्रत्यय दृढ़ हो जाता है, क्योंकि अग्निसे च्युत होनेसे पूर्व विस्फुलिङ्गकी अग्निके साथ एकता देखी गयी है।<br>अतः सुवर्ण, मणि, लोह एवं अग्नि-विस्फुलिङ्गादि दृष्टान्त एकत्वज्ञानकी दृढ़ताके लिये हैं, |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७९ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७९ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| नोत्पत्त्यादिभेदप्रतिपादनपराः। सैन्धवघनवत्प्रज्ञप्त्येकरसनैरन्तर्यावधारणात् "एकधैवानुद्रष्टव्यम्" (४।४।२०) इति च। यदि च ब्रह्मणश्चित्रपटवद्वृक्षसमुद्रादिवच्चोत्पत्त्याद्यनेकधर्मविचित्रता विजिग्राहयिषिता, एकरसं सैन्धवघनवदनन्तरमबाह्यमिति नोपसमहरिष्यत्, 'एकधैवानुद्रष्टव्यम्' इति च न प्रायोक्ष्यत्— "य इह नानेव पश्यति" (४।४।१९) इति निन्दावचनं च। तस्मादेकरूपैकत्वप्रत्ययदार्ढ्यायैव सर्ववेदान्तेषूत्पत्तिस्थितिलयादिकल्पना, न तत्प्रत्ययकरणाय। | उत्पत्ति आदिका भेद प्रदर्शित करनेके लिये नहीं हैं। तथा "उसे एकरूप ही देखना चाहिये" इस श्रुतिसे नमकके डलेके समान उसे ज्ञानरूप एकरससे निरन्तर परिपूर्ण भी निश्चय किया गया है। यदि चित्रपट अथवा वृक्ष या समुद्रादिके समान उत्पत्ति आदि अनेक धर्मोंके कारण ब्रह्मकी विचित्रताका ही ग्रहण करना अभीष्ट होता तो 'वह नमकके डलेके समान एकरस एवं अन्तरबाह्यशून्य है' इस प्रकार उपसंहार न किया जाता तथा उसे "एकरूप ही देखना चाहिये" ऐसे आदेशका और "जो इसे नानावत् देखता है [ वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ]" ऐसे निन्दासूचक वचनका भी प्रयोग न होता। अतः समस्त वेदान्तोंमें जो उत्पत्ति, स्थिति एवं लय आदिकी कल्पना है, वह ब्रह्मकी एकरूपताके ज्ञानकी दृढ़ताके लिये ही है, उन ( उत्पत्त्यादि ) की प्रतीति करानेके लिये नहीं है। |
| न च निरवयवस्य परमात्मनोऽसंसारिणः संसार्येकदेशकल्पना न्याय्या, स्वतोऽदेशत्वात्परमात्मनः। अदेशस्य परस्य एकदेश- | इसके सिवा निरवयव और असंसारी परमात्माके संसारीरूप एक देशकी कल्पना करना युक्तियुक्त भी नहीं है, क्योंकि स्वयं परमात्मामें तो देश है नहीं। देशहीन परमात्माके |
४८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ४८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| संसारित्वकल्पनायां पर एव संसारीति कल्पितं भवेत् । अथ परोपाधिकृत एकदेशः परस्य, घटकरकाद्याकाशवत्; न तदा तत्र विवेकिनां परमात्मैकदेशः पृथक्संव्यवहारभागिति बुद्धिरुत्पद्यते । | एकदेशमें संसारित्वकी कल्पना करनेमें 'परमात्मा ही संसारी है' ऐसी कल्पना हो जायगी और यदि ऐसा माना जाय कि घटाकाश और करकाकाशादिके समान किसी अन्य उपाधिके कारण विज्ञानात्मा परमात्माका एकदेश है तो उसमें विवेकी पुरुषोंको ऐसी बुद्धि उत्पन्न नहीं हो सकती कि परमात्माका एकदेश पृथक् व्यवहार करनेमें समर्थ है। | | अविवेकिनां विवेकिनां चोपचरिता बुद्धिर्दृष्टेति चेत् ? | पूर्व०-किंतु [मैं कर्ता हूँ] ऐसी गौणी¹ बुद्धि तो अविवेकियों और विवेकियोंको भी होती देखी गयी है ? | | न; अविवेकिनां मिथ्याबुद्धित्वात्, विवेकिनां च संव्यवहारमात्रालम्बनार्थत्वात्-यथा कृष्णो रक्तश्चाकाश इति विवेकिनामपि कदाचित्कृष्णता रक्तता च आकाशस्य संव्यवहारमात्रालम्बनार्थत्वं प्रतिपद्यत इति, न परमार्थतः कृष्णो रक्तो वा आकाशो भवितुमर्हति । अतो न पण्डितै- | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि अविवेकियोंकी तो वह बुद्धि मिथ्या होती है और विवेकियोंकी सम्यक् प्रकारसे व्यवहारको आलम्बन करनेके लिये; जिस प्रकार कि [अविवेकियोंके समान] विवेकियोंकी दृष्टिमें भी कभी-कभी 'आकाश काला अथवा लाल है' इस प्रकार आकाशकी कृष्णता अथवा लाली व्यवहारमात्रके आलम्बनार्थत्वको प्राप्त हो जाती है, किंतु वस्तुतः आकाश काला या लाल नहीं हो सकता। अतः विद्वानों- |
१. वस्तुतः जीव अपरिच्छिन्न ब्रह्ममात्र है, इसलिये इस परिच्छिन्न बुद्धिको गौणी बतलाया गया है।
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८१
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८१
| ब्रह्मस्वरूपप्रतिपत्तिविषये ब्रह्मणोंऽशांश्येकदेशैकदेशिविकारविकारित्वकल्पना कार्या, सर्वकल्पनापनयनार्थसारपरत्वात्सर्वोपनिषदाम् ।<br><br>अतो हित्वा सर्वकल्पनामाकाशस्येव निर्विशेषता प्रतिपत्तव्या—<br>“आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः”<br>“न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः” (क० उ० २।२।११) इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः; नात्मानं ब्रह्मविलक्षणं कल्पयेत्—उष्णात्मक इवाग्नौ शीतैकदेशम्, प्रकाशात्मके वा सवितरि तमएकदेशम्—सर्वकल्पनापनयनार्थसारपरत्वात्सर्वोपनिषदाम्। तस्मान्नामरूपोपाधिनिमित्ता एव आत्मन्यसंसारधर्मिणि सर्वे व्यवहाराः; “रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव” (क०उ० २।२।९-१०) “सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वा- | को ब्रह्मस्वरूपके ज्ञानके विषयमें ब्रह्मके अंशांशी, एकदेश-एकदेशी अथवा विकार-विकारित्वादिकी कल्पना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि सारी उपनिषदोंका तात्पर्य समस्त कल्पनाओंकी निवृत्तिरूप मुख्य प्रयोजनमें ही है।<br><br>इसलिये सारी कल्पनाओंको छोड़कर “ब्रह्म आकाशके समान सर्वगत और नित्य है” “वह लोकदुःखसे लिप्त नहीं होता; क्योंकि उससे बाह्य है” इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंके अनुसार आकाशके समान उसकी निर्विशेषताका ही अनुभव करना चाहिये, उष्णस्वरूप अग्निमें एक शीतल देशके समान तथा प्रकाशस्वरूप सूर्यमें एक अन्धकारमय देशके समान ब्रह्मसे भिन्न आत्माकी कल्पना न करे; क्योंकि सब उपनिषदोंका तात्पर्य समस्त कल्पनाओंकी निवृत्तिरूप मुख्य प्रयोजनमें ही है। अतः असंसारधर्मी आत्मामें सारे व्यवहार नाम एवं रूपकृत उपाधिके कारण ही हैं, जैसा कि “वह रूप-रूपके अनुरूप हो गया है” “धीर पुरुष समस्त रूपोंकी रचना कर उनके नाम रखकर उनके द्वारा बोलता |
बृ० उ० ३१—
४८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| भिवदन्यदास्ते" इत्येवमादिमन्त्रवर्णेभ्यः।<br><br>न स्वत आत्मनः संसारित्वम्, अलक्तकाद्युपाधिसंयोगजनितरक्तस्फटिकादिबुद्धिवद्भ्रान्तमेव, न परमार्थतः। "ध्यायतीव लेलायतीव" (बृ० उ० ४ । ३ । ७) "न वर्धते कर्मणा नो कनीयान्" (४ । ४ । २३) "न लिप्यते कर्मणा पापकेन" (४ । ४ । २३) "समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तम्" (गीता १३ । २७) "शुनि चैव श्वपाके च" (गीता ५ । १८) इत्यादिश्रुतिस्मृतिन्यायेभ्यः परमात्मनोऽसंसारित्वैव। अत एकदेशो विकारः शक्तिर्वा विज्ञानात्मा अन्यो वेति विकल्पयितुं निरवयवत्वाभ्युपगमे विशेषतो न शक्यते। अंशादिश्रुतिस्मृतिवादाश्चैकत्वार्थाः, न तु भेदप्रतिपादकाः, विवक्षितार्थैकवाक्ययोगात्—इत्यवोचाम।<br><br>(उपनिषत्प्रामाण्यमीमांसा)<br>सर्वोपनिषदां परमात्मैकत्वज्ञापनपरत्वे अथ किमर्थं तत्प्रतिकूलोऽर्थो विज्ञानात्मभेदः परि- | रहता है" इत्यादि मन्त्रवर्णोंसे सिद्ध होता है।<br><br>आत्माका संसारित्व स्वतः नहीं है, अपितु लाक्षा आदि उपाधिके संयोगसे होनेवाली 'स्फटिक लाल है' इत्यादि बुद्धिके समान भ्रान्तिजनित ही है, परमार्थतः नहीं। "मानो ध्यान करता है, मानो अधिक चलता है", "यह कर्मसे न बढ़ता है, न छोटा होता है" "यह पापकर्मसे लिप्त नहीं होता" "समस्त भूतोंमें समानरूपसे स्थित", "कुत्ते और चाण्डालमें" इत्यादि श्रुति, स्मृति और युक्तियोंसे परमात्माका असंसारित्व ही सिद्ध होता है। अतः विशेषतः आत्माका निरवयवत्व स्वीकार करनेपर ऐसा विकल्प नहीं किया जा सकता कि विज्ञानात्मा परमात्माका एकदेश, विकार, शक्ति अथवा और कुछ है। उसके अंशादि होनेका प्रतिपादन करनेवाले श्रुतिस्मृतिवाद भी आत्माके एकत्वके ही लिये हैं, भेदका प्रतिपादन करनेवाले नहीं हैं, क्योंकि उपनिषदोंके विवक्षित अर्थकी एकवाक्यता होनी चाहिये—ऐसा हम पहले कह चुके हैं।<br><br>समस्त उपनिषदोंका तात्पर्य परमात्माके एकत्वमें है, फिर विज्ञानात्माके भेदरूप उससे प्रतिकूल विषयकी कल्पना किस लिये की जाती |
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८३
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८३
| कल्प्यत इति ? कर्मकाण्डप्रामाण्यविरोधपरिहारायेत्येके; कर्मप्रतिपादकानि हि वाक्यानि अनेकक्रियाकारकफलभोक्तृकर्त्राश्रयाणि, विज्ञानात्मभेदाभावे ह्यसंसारिण एव परमात्मन एकत्वे कथमिष्टफलासु क्रियासु प्रवर्त्तयेयुः? अनिष्टफलाभ्यो वा क्रियाभ्यो निवर्त्तयेयुः? कस्य वा बद्धस्य मोक्षायोपनिषदारभ्येत ? अपि च परमात्मैकत्ववादिपक्षे कथं परमात्मैकत्वोपदेशः ? कथं वा तदुपदेशग्रहणफलम् ? बद्धस्य हि बन्धनाशायोपदेशस्तदभाव उपनिषच्छास्त्रं निर्विषयमेव । | है ? इसपर किन्हीं (मीमांसकों) का तो कहना है कि यह कल्पना कर्मकाण्डके प्रामाण्यसे प्रतीत होनेवाले विरोधका परिहार करनेके लिये है, क्योंकि कर्मका प्रतिपादन करनेवाले वाक्य अनेकों क्रिया, कारक, फल, भोक्ता और कर्त्ताओंको आश्रय करनेवाले हैं, विज्ञानात्माका भेद न होनेपर असंसारी परमात्माका एकत्व रहते हुए वे किस प्रकार लोगोंको इष्टफलोंवाली क्रियाओंमें प्रवृत्त अथवा अनिष्ट फलोंवाली क्रियाओंसे निवृत्त कर सकेंगे। तथा किस बद्ध जीवकी मुक्तिके लिये उपनिषद्का आरम्भ किया जायगा ? इसके सिवा परमात्माका एकत्व प्रतिपादन करनेवालोंके मतमें किसीको परमात्माके एकत्वका उपदेश भी क्यों दिया जायगा और किस प्रकार उसके उपदेशग्रहणका फल होगा ? क्योंकि बद्ध जीवके बन्धनका नाश करनेके लिये ही इसका उपदेश किया जाता है, बन्धन न होनेपर तो उपनिषच्छास्त्रका कोई विषय ही नहीं रहता । | | एवं तर्हि उपनिषद्वादिपक्षस्य कर्मकाण्डवादिपक्षेण चोद्यपरिहार- | पूर्वं०—ऐसी स्थितिमें तो उपनिषद्वादी पक्षके शङ्का-समाधानका मार्ग कर्मकाण्डवादी पक्षके समान ही |
| ४८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
| ४८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| योः समानः पन्थाः—येन भेदाभावे कर्मकाण्डं निरालम्बनमात्मानं न लभते प्रामाण्यं प्रति तथोपनिषदपि। एवं तर्हि यस्य प्रामाण्ये स्वार्थविघातो नास्ति, तस्यैव कर्मकाण्डस्यास्तु प्रामाण्यम्; उपनिषदां तु प्रामाण्यकल्पनायां स्वार्थविघातो भवेदिति मा भूत्प्रामाण्यम्। न हि कर्मकाण्डं प्रमाणं सदप्रमाणं भवितुमर्हति; न हि प्रदीपः प्रकाश्यं प्रकाशयति, न प्रकाशयति चेति। | है, क्योंकि जिस प्रकार भेद न होनेपर कर्मकाण्ड निरालम्ब (अधिकारि-शून्य) होकर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं कर सकता, उसी प्रकार उपनिषद् भी स्वयं प्रामाणिक नहीं हो सकती। यदि ऐसी बात है, तब तो जिसकी प्रामाणिकता माननेपर स्वार्थका¹ विघात नहीं होता, उस कर्मकाण्डकी ही प्रामाणिकता माननी चाहिये। उपनिषदोंके प्रामाण्यकी कल्पना करनेमें तो स्वार्थका विघात होता है, इसलिये उनकी प्रामाणिकता भले ही न हो। कर्मकाण्ड प्रामाणिक होकर अप्रामाणिक नहीं हो सकता, क्योंकि दीपक अपने प्रकाश्य पदार्थको प्रकाशित करता है और प्रकाशित नहीं भी करता—ऐसा नहीं होता। |
| प्रत्यक्षादिप्रमाणविप्रतिषेधाच्च—<br>न केवलमुपनिषदो ब्रह्मैकत्वं प्रतिपादयन्त्यः स्वार्थविघातं कर्मकाण्डप्रामाण्यविघातं च कुर्वन्ति; प्रत्यक्षादिनिश्चितभेदप्रतिपत्त्यर्थप्रमाणैश्च विरुध्यन्ते। तस्माद- | इसके सिवा अभेद-श्रुतियोंका प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरोध भी है। ब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषदें केवल स्वार्थविघात और कर्मकाण्डके प्रामाण्यका विघात ही नहीं करतीं अपितु निश्चित भेदका ज्ञान करनेवाले प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उनका विरोध भी है। |
१. शब्दकी शक्तिवृत्तिसे प्रतीत होनेवाले सृष्ट्यादि भेदका।
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८५
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८५
| प्रामाण्यमेवोपनिषदाम्; अन्यार्थता वाऽस्तु; न त्वेव ब्रह्मैकत्वप्रतिपत्त्यर्थता। | अतः उपनिषदें अप्रामाणिक ही हैं, अथवा उनका कोई अन्य प्रयोजन हो सकता है, वे ब्रह्मका एकत्व प्रतिपादन करनेके लिये ही नहीं हो सकतीं। |
| न; उक्तोत्तरत्वात्। प्रमाणस्य हि प्रमाणत्वमप्रमाणत्वं वा प्रमोत्पादनानुत्पादननिमित्तम्, अन्यथा चेत्स्तम्भादीनां प्रामाण्यप्रसङ्गाच्छब्दादौ प्रमेये। | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि इसका उत्तर ऊपर दिया जा चुका है। प्रमाणकी प्रमाणता अथवा अप्रमाणता प्रमाकी उत्पत्ति करने या न करनेके कारण ही होती है, यदि ऐसा न माना जायगा तो शब्दादि प्रमेयमें स्तम्भादिकी भी प्रमाणताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा¹। |
| किञ्चातः ? | पूर्व०-सो, इससे क्या हुआ ? |
| यदि तावदुपनिषदो ब्रह्मैकत्वप्रतिपत्तिप्रमां कुर्वन्ति, कथमप्रमाणं भवेयुः ? | सिद्धान्ती-यदि उपनिषदें ब्रह्मज्ञानरूप प्रमा उत्पन्न करती हैं, तो वे किस प्रकार अप्रामाणिक होंगी ? |
| न कुर्वन्त्येवेति चेद्यथाग्निः शीतमिति ? | पूर्व०-किंतु 'अग्नि शीतल होता है, इस वाक्यके समान यदि वे प्रमा उत्पन्न करती ही न हों तो ? |
| स भवानेवं वदन्वक्तव्यः-उपनिषत्प्रामाण्यप्रतिषेधार्थं भवतो वाक्यमुपनिषत्प्रामाण्यप्रतिषेधं किं | सिद्धान्ती-इस प्रकार बोलनेवाले आपसे हमें यह कहना है कि उपनिषद्के प्रामाण्यका प्रतिषेध करनेके लिये प्रवृत्त हुआ आपका वाक्य उपनिषद्के प्रामाण्यका निषेध क्या |
१. स्तम्भादिसे शब्दादिकी प्रमा नहीं होती; किंतु यदि प्रमाणके लिये प्रमाको उत्पन्न करना आवश्यक न मानें तो उन्हें भी प्रमाण क्यों न माना जाय ?
४८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| न करोत्येवाग्निर्वा रूपप्रकाशम् ? | नहीं करता है तथा अग्नि रूपको क्या प्रकाशित नहीं करता है ? | | अथ करोति । | पूर्व०— करता तो है । | | यदि करोति भवतु तदा प्रतिषेधार्थं प्रमाणं भवद्वाक्यम्, अग्निश्च रूपप्रकाशको भवेत्; प्रतिषेधवाक्यप्रामाण्ये भवत्येवोपनिषदां प्रामाण्यम् । अत्र भवन्तो ब्रुवन्तु कः परिहार इति ? | सिद्धान्ती— यदि वह उसका प्रतिषेध करता है तो उसका प्रतिषेध करनेमें आपका वाक्य प्रमाण हो सकता है तथा अग्नि भी रूपका प्रकाशक हो सकता है । अतः यदि आपका प्रतिषेधक वाक्य प्रामाणिक है तो उपनिषदोंकी प्रामाणिकता होनी ही चाहिये । अब आप बतलाइये इसका क्या परिहार हो सकता है ? | | नन्वत्र प्रत्यक्षा मद्वाक्य उपनिषत्प्रामाण्यप्रतिषेधार्थप्रतिपत्तिरग्नौ च रूपप्रकाशनप्रतिपत्तिः प्रमा । | पूर्व०— यहाँ मेरे वाक्यमें उपनिषत्प्रामाण्यके प्रतिषेधका ज्ञानरूप प्रमा तथा अग्निमें रूपप्रकाशनका ज्ञानरूप प्रमा तो प्रत्यक्ष ही है । | | कस्तर्हि भवतः प्रद्वेषो ब्रह्मैकत्वप्रत्यये प्रमां प्रत्यक्षां कुर्वतीषूपनिषत्सूपलभ्यमानासु ? प्रतिषेधानुपपत्तेः । शोकमोहादिनिवृत्तिश्च प्रत्यक्षं फलं ब्रह्मैकत्वप्रतिपत्तिपारम्पर्यजनितमित्यवोचाम। तस्मादुक्तोत्तरत्वादुपनिषदं प्रत्य- | सिद्धान्ती— तो फिर ब्रह्मैकत्वज्ञानमें प्रमाको प्रत्यक्ष करती हुई उपलब्ध होनेवाली उपनिषदोंमें ही आपका क्या द्वेष है ? क्योंकि उनके प्रामाण्यका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता । तथा हम यह कह चुके हैं कि शोकमोहादिकी निवृत्ति—यह ब्रह्मैकत्वज्ञानकी परम्परासे होनेवाला प्रत्यक्ष फल है । अतः इसका उत्तर ऊपर दे दिया जानेके कारण उपनिषदोंमें |
१. 'उपनिषदें ब्रह्मज्ञानरूप प्रमा उत्पन्न करती हैं, यह उत्तर ऊपर दिया गया है ।
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८७
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८७
| प्रामाण्यशङ्का तावन्नास्ति । | अप्रामाण्यकी शङ्का तो हो नहीं सकती । |
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| यच्चोक्तं स्वार्थविघातकरत्वा- <br> दप्रामाण्यमिति, तदपि न, तदर्थ- <br> प्रतिपत्तेर्बाधकाभावात् । न हि <br> उपनिषद्भ्यः—ब्रह्मैकमेवाद्विती- <br> यम्, नैव च—इति प्रतिपत्तिरस्ति; <br> यथाग्निरुष्णः शीतश्चेत्यस्माद्वा- <br> क्याद्विरुद्धार्थद्वयप्रतिपत्तिः । अ- <br> भ्युपगम्य चैतदवोचाम; न तु <br> वाक्यप्रामाण्यसमय एष न्यायः— <br> यदुतैकस्य वाक्यस्यानेकार्थत्वम्। <br> सति चानेकार्थत्वे, स्वार्थश्च स्यात्, <br> तद्विघातकृच्च विरुद्धोऽन्योऽर्थः। न <br> त्वेतत्—वाक्यप्रमाणकानां विरु- <br> द्धमविरुद्धं च' एकं वाक्यम्, अने- <br> कमर्थं प्रतिपादयतीत्येष समयः, <br> अर्थैकत्वाद्वह्येकवाक्यता । | और ऐसा जो कहा कि अपने अर्थका विघात करनेवाली होनेसे उनकी अप्रामाणिकता है, सो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि उनसे होनेवाले अर्थज्ञानका कोई बाधक नहीं है । उपनिषदोंसे यह ज्ञान नहीं होता कि ब्रह्म एकमात्र अद्वितीय है भी और नहीं भी है, जिस प्रकार कि 'अग्नि उष्ण और शीतल भी होता है, इस एक ही वाक्यसे दो विरुद्ध अर्थोंका ज्ञान होता है । तथा यह समझकर ही हम ऐसा कह चुके हैं कि वाक्यकी प्रामाणिकताके समय एक वाक्यके अनेक अर्थ मानने उचित नहीं हैं । यदि वाक्यके अनेक अर्थ होंगे तो एक उसका अपना अर्थ होगा और दूसरा उसका विघात करनेवाला अर्थ होगा । 'एक ही वाक्य बहुत-से विरुद्ध और अविरुद्ध अर्थोंका भी प्रतिपादन करता है, यह वाक्यको प्रमाण माननेवालोंका सिद्धान्त नहीं है; क्योंकि अर्थकी एकता होनेसे ही सबकी एकवाक्यता होती है । |
| न च कानिचिदुपनिषद्वाक्यानि <br> ब्रह्मैकत्वप्रतिषेधं कुर्वन्ति । यत्तु, <br> लौकिकं वाक्यम्—अग्निरुष्णः | कोई-कोई उपनिषद्वाक्य ब्रह्मकी एकताका प्रतिषेध करते हों—ऐसी भी बात नहीं है । 'अग्नि उष्ण और शीतल भी होता है, यह जो लौकिक |
४८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| शीतश्चेति, न तत्रैकवाक्यता, तदेकदेशस्य प्रमाणान्तरविषयानुवादित्वात्। अग्निः शीत इत्येतदेकं वाक्यम्; अग्निरुष्ण इति तु प्रमाणान्तरानुभवस्मारकम्, न तु स्वयमर्थावबोधकम्। अतो नाग्निः शीत इत्यनेनैकवाक्यता, प्रमाणान्तरानुभवस्मारेणैवोपक्षीणत्वात्। यत्तु विरुद्धार्थप्रतिपादकमिदं वाक्यमिति मन्यते, तच्छीतोष्णपदाभ्याम् अग्निपदसामानाधिकरण्यप्रयोगनिमित्ता भ्रान्तिः; न त्वेवैकस्य वाक्यस्यानेकार्थत्वं लौकिकस्य वैदिकस्य वा। | वाक्य है, वहाँ एकवाक्यता नहीं होती; क्योंकि उसका एकदेश प्रमाणान्तरके विषयभूत अर्थका अनुवाद करनेवाला है। 'अग्नि शीतल होता है' यह एक वाक्य है और 'अग्नि उष्ण होता है' यह प्रमाणान्तरसे प्राप्त हुए अनुभवका अनुवादक है, स्वयं किसी विशेष अर्थका द्योतक नहीं है। अतः 'अग्नि शीतल होता है' इस वाक्यसे उसकी एकवाक्यता नहीं है; क्योंकि वह प्रमाणान्तरसे होनेवाले अनुभवकी स्मृति कराकर ही समाप्त हो जाता है। और ऐसा जो माना जाता है कि यह वाक्य विरुद्ध अर्थोंका प्रतिपादन करनेवाला है, वह शीत और उष्ण पदोंका अग्निपदके समानाधिकरणरूपसे प्रयोग होनेके कारण उत्पन्न हुई भ्रान्ति¹ है। वास्तवमें तो लौकिक हो अथवा वैदिक, एक वाक्यके अनेक अर्थ हो ही नहीं सकते। |
| [कर्मकाण्डप्रामाण्योपपादनम्]<br>यच्चोक्तं कर्मकाण्डप्रामाण्यविघातकृदुपनिषद्व्राक्यमिति, तन्न; अन्यार्थत्वात्। ब्रह्मैकत्वप्रतिपादनपरा ह्युपनिषदो नेष्टार्थप्राप्तौ | और ऐसा जो कहा कि उपनिषद्वाक्य कर्मकाण्डकी प्रामाणिकताको नष्ट करनेवाले हैं, सो यह बात नहीं है; क्योंकि उनका तात्पर्य तो दूसरा है। ब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन करनेवाली उपनिषदें अभीष्ट अर्थकी |
१. तात्पर्य यह है कि वस्तुतः यह किसी प्रमाका उत्पादक नहीं है।
ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४८९
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४८९ |
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| साधनोपदेशं तस्मिन्वा पुरुषनियोगं वारयन्ति, अनेकार्थत्वानुपपत्तेरेव । | प्राप्तिके लिये साधनके उपदेश तथा उसमें पुरुषके नियोगका निवारण नहीं करतीं; क्योंकि उनके अनेक अर्थ होने सम्भव ही नहीं हैं। | | न च कर्मकाण्डवाक्यानां स्वार्थे प्रमा नोत्पद्यते । असाधारणे चेत्स्वार्थे प्रमामुत्पादयति वाक्यम्, कुतोऽन्येन विरोधः स्यात् ? | तथा कर्मकाण्डसम्बन्धी वाक्योंकी स्वार्थमें प्रमा उत्पन्न न होती हो—ऐसी बात भी नहीं है ! यदि कोई वाक्य अपने असाधारण अर्थमें प्रमा उत्पन्न करता है तो उसका दूसरे वाक्यसे विरोध क्यों होगा ? | | ब्रह्मैकत्वे निर्विषयत्वात्प्रमा नोत्पद्यत एवेति चेत् ? | पूर्व०—यदि कहें ब्रह्मकी एकता माननेपर तो कर्मकाण्डपरक वाक्योंका कोई विषय ही नहीं रहता, इसलिये प्रमा उत्पन्न हो ही नहीं सकती; तो ? | | न, प्रत्यक्षत्वात्प्रमायाः । "दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत" "ब्राह्मणो न हन्तव्यः" इत्येवमादिवाक्येभ्यः प्रत्यक्षा प्रमा जायमाना; 'सा नैव भविष्यति, यद्युपनिषदो ब्रह्मैकत्वं बोधयिष्यन्ति' इत्यनुमानम्; न चानुमानं प्रत्यक्षविरोधे प्रामाण्यं लभते; तस्मादसदेवैतद्ब्रूयते—प्रमैव नोत्पद्यत इति। अपि च यथाप्राप्तस्यैव | सिद्धान्ती —ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उनसे प्रमाका होना तो प्रत्यक्ष है। "स्वर्गकी इच्छावाला दर्श और पूर्णमास यज्ञोंद्वारा यजन करे" "ब्राह्मणका वध नहीं करना चाहिये" इत्यादि ऐसे ही वाक्योंसे प्रमा प्रत्यक्ष उत्पन्न होती देखी जाती है; 'यदि उपनिषदें ब्रह्मकी एकताका ज्ञान करायेंगी तो वह नहीं होगी' यह तो अनुमान है। और प्रत्यक्षसे विरोध होनेपर अनुमानकी प्रामाणिकता नहीं रह सकती। इसलिये यह कहना कि उनसे प्रमा ही उत्पन्न नहीं होती—असत् ही है। अपितु जो पुरुष |
४९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २
| ४९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| अविद्याप्रत्युपस्थापितस्य क्रियाकारकफलस्याश्रयणेन इष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायसामान्ये प्रवृत्तस्य तद्विशेषमजानतः तदाचक्षाणा श्रुतिः क्रियाकारकफलभेदस्य लोकप्रसिद्धस्य सत्यतामसत्यतां वा नाचष्टे न च वारयति, इष्टानिष्टफलप्राप्तिपरिहारोपायविधिपरत्वात् । <br><br> यथा काम्येषु प्रवृत्ता श्रुतिः कामानां मिथ्याज्ञानप्रभवत्वे सत्यपि यथाप्राप्तानेव कामानुपादाय तत्साधनान्येव विधत्ते, न तु कामानां मिथ्याज्ञानप्रभवत्वादन्अर्थरूपत्वं चेति न विदधाति । तथा नित्याग्निहोत्रादिशास्त्रमपि मिथ्याज्ञानप्रभवं क्रियाकारकभेदं यथाप्राप्तमेवादाय इष्टविशेषप्राप्तिमनिष्टविशेषपरिहारं वा किमपि प्रयोजनं पश्यदग्निहोत्रादीनि कर्माणि विधत्ते । नाविद्यागोच- | अविद्याद्वारा प्रस्तुत किये हुए यथाप्राप्त क्रिया, कारक और फलका आश्रय करके इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिके सामान्य उपायमें प्रवृत्त है तथा उसका विशेष उपाय नहीं जानता, उसे वह (विशेष उपाय) बतलानेवाली श्रुति लोकप्रसिद्ध क्रिया, कारक और फलभेदकी सत्यता एवं असत्यताका न तो प्रतिपादन ही करती है और न निषेध ही; क्योंकि वह तो इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिके उपायका विधान करनेमें ही तत्पर है। <br><br> जिस प्रकार काम्यकर्मोंमें प्रवृत्त हुई श्रुति कामनाओंके मिथ्याज्ञानजनित होनेपर भी यथाप्राप्त कामनाओंको ही लेकर उनके साधनोंका ही विधान करती है, किंतु 'कामनाएँ मिथ्याज्ञानजनित होनेके कारण अनर्थरूप नहीं हैं' ऐसा विधान नहीं करती । इसी प्रकार अग्निहोत्रादि नित्यकर्मोंका निरूपण करनेवाला शास्त्र भी मिथ्याज्ञानजनित यथाप्राप्त क्रिया, कारक और फलरूप भेदको ही लेकर इष्टविशेषकी प्राप्ति और अनिष्टविशेषके परिहाररूप किसी प्रयोजनको देखकर अग्निहोत्रादि कर्मोंका विधान करता है। इस प्रयोजनका अविद्याविषयक |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४९१ |
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४९१ |
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| रासद्वस्तुविषयमिति न प्रवर्तते; यथा काम्येषु । | असद्वस्तुसे सम्बन्ध है, इसलिये उनका विधान न करता हो—ऐसी बात नहीं है, जैसा कि काम्य-कर्मों के विषयमें भी देखा गया है। |
| न च पुरुषा न प्रवर्तेरन्नविद्यावन्तः, दृष्टत्वाद्यथा कामिनः । | अविद्यावान् पुरुषोंकी उन कर्मोंमें प्रवृत्ति न होती हो—ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि सकाम पुरुषोंके समान उन्हें भी प्रवृत्त होते देखा ही गया है। |
| विद्यावतामेव कर्माधिकार इति चेत् ? | पूर्व०—कर्मका अधिकार तो विद्वानोंको ही है—ऐसा कहें तो ? |
| न, ब्रह्मैकत्वविद्यायां कर्माधिकारविरोधस्योक्तत्वात् । एतेन ब्रह्मैकत्वे निर्विषयत्वादुपदेशेन तद्ग्रहणफलाभावदोषपरिहार उक्तो वेदितव्यः । | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि ब्रह्मकी एकताके ज्ञानमें कर्माधिकारका विरोध तो बतलाया जा चुका है। इसीसे यह जान लेना चाहिये कि ब्रह्मकी एकता सिद्ध होनेपर कोई विषय न रहनेके कारण कर्मकाण्डके उपदेशसे उसका ग्रहणरूप फल नहीं हो सकता—इस दोषका परिहार बतला दिया गया है। |
| पुरुषेच्छा रागादिवैचित्र्याच्च—<br><br>अनेका हि पुरुषाणामिच्छाः, रागादयश्च दोषा विचित्राः; ततश्च बाह्यविषयरागाद्यपहृतचेतसो न शास्त्रं निवर्तयितुं शक्तम्; नापि स्वभावतो बाह्यविषयविरक्त- | पुरुषोंकी इच्छा एवं रागादिका भेद रहनेके कारण भी [कर्मकाण्डके उपदेशकी सार्थकता सिद्ध होती है]। पुरुषोंकी अनेकों इच्छाएँ हैं और रागादि तरह-तरहके दोष हैं, अतः जिनका चित्त बाह्य विषयोंके रागसे आकर्षित है, उन्हें उससे निवृत्त करनेमें शास्त्र समर्थ नहीं है। इसी तरह जिनका चित्त स्वभावसे ही बाह्य विषयोंसे विरक्त है, उनको |
| ४९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
| ४९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| चेतसो विषयेषु प्रवर्तयितुं शक्तम्;<br><br>किन्तु शास्त्रादेतावदेव भवति—इदमिष्टसाधनमिदमनिष्टसाधनमिति साध्यसाधनसम्बन्धविशेषाभिव्यक्तिः—प्रदीपादिवत्तमसि रूपादिज्ञानम्। न तु शास्त्रं भृत्यानिव बलान्निवर्तयति नियोजयति वा;<br><br>दृश्यन्ते हि पुरुषा रागादिगौरवाच्छास्त्रमप्यतिक्रामन्तः। तस्मात् पुरुषमतिवैचित्र्यमपेक्ष्य साध्यसाधनसम्बन्धविशेषाननेकधोपदिशति।<br><br>तत्र पुरुषाः स्वयमेव यथारुचि साधनविशेषेषु प्रवर्तन्ते, शास्त्रं तु सवितृप्रदीपादिवदुदास्त एव। तथा कस्यचित्परोऽपि पुरुषार्थोऽपुरुषार्थवदवभासते; यस्य यथावभासः; स तथारूपं पुरुषार्थं पश्यति; तदनुरूपाणि साधनान्युपादित्सते। तथा चार्थवादोऽपि—<br><br>“त्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुः” (बृ०उ० | विषयोंमें प्रवृत्त करनेमें भी शास्त्र समर्थ नहीं है। किंतु शास्त्रसे तो इतना ही होता है कि यह इष्टसाधन है और यह अनिष्टसाधन—इस प्रकार केवल साध्यसाधनके सम्बन्धविशेषकी अभिव्यक्ति ही होती है, जिस प्रकार कि अन्धकारमें दीपकादिसे रूपका ज्ञान होता है। शास्त्र अपने सेवकोंके समान किसीको बलात्कारसे प्रवृत्त या निवृत्त नहीं करता;<br><br>क्योंकि रागादिकी अधिकता होनेपर लोग शास्त्रका उल्लङ्घन करते भी देखे जाते हैं; अतः पुरुषोंकी बुद्धिकी विचित्रताको दृष्टिमें रखकर शास्त्र अनेक प्रकारसे साध्य-साधनरूप सम्बन्धविशेषोंका उपदेश करता है।<br><br>तहाँ अपनी-अपनी रुचिके अनुसार पुरुष स्वयं ही साधनविशेषोंमें प्रवृत्त होते हैं। शास्त्र तो सूर्य और दीपकादिके समान उदासीन ही रहता है। इस प्रकार किसीको परम पुरुषार्थ भी अपुरुषार्थके समान भासता है; जिसको जैसा भासता है वह तदनुरूप ही पुरुषार्थ देखता है, और उसके अनुसार ही साधन ग्रहण करना चाहता है। इस विषयमें<br><br>“प्रजापतिके तीन पुत्रोंने अपने पिता प्रजापतिके यहाँ ब्रह्मचर्य वास किया’ |
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९३
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९३
| ५।२।१) इत्यादिः। तस्मान्न ब्रह्मैकत्वं ज्ञापयिष्यन्तो वेदान्ता विधिशास्त्रस्य बाधकाः। न च विधिशास्त्रमेतावता निर्विषयं स्यात्। नाप्युक्तकारकादिभेदं विधिशास्त्रमुपनिषदां ब्रह्मैकत्वं प्रति प्रामाण्यं निवर्तयति। स्वविषयशूराणि हि प्रमाणानि, श्रोत्रादिवत्। <br><br> [ब्रह्मैकत्वमाक्षिप्यते] <br> तत्र पण्डितम्मन्याः केचित्स्वचित्तवशात्सर्वं प्रमाणितरेतरविरुद्धं मन्यन्ते, तथा प्रत्यक्षादिविरोधमपि चोदयन्ति ब्रह्मैकत्वे— <br><br> शब्दादयः किल श्रोत्रादिविषया भिन्नाः प्रत्यक्षत उपलभ्यन्ते, ब्रह्मैकत्वं ब्रुवतां प्रत्यक्षविरोधः स्यात्; तथा श्रोत्रादिभिः शब्दा- | इत्यादि अर्थवाद भी है। अतः ब्रह्मकी एकताको सूचित करनेवाले वेदान्तवाक्य विधि-शास्त्रके बाधक नहीं हैं। इतनेहीसे विधिशास्त्र निर्विषय नहीं हो सकता और न उपर्युक्त कारकादि भेदवाला विधिशास्त्र ब्रह्मकी एकताके प्रति उपनिषदोंके प्रामाण्यको ही निवृत्त कर सकता है; क्योंकि श्रोत्रादि इन्द्रियोंके समान सब प्रमाण अपने-अपने विषयमें प्रबल होते हैं। <br><br> यहाँ अपनेको पण्डित माननेवाले कोई-कोई पुरुष [शास्त्रगम्य ऐक्यको स्वीकार करनेपर] अपनी बुद्धिके अनुसार समस्त प्रमाणोंको एक-दूसरेके विरुद्ध समझते हैं तथा ब्रह्मकी एकता माननेमें प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके विरोधकी भी शङ्का करते हैं— <br><br> श्रोत्रादि इन्द्रियोंके विषयभूत जो शब्दादि हैं, वे तो प्रत्यक्ष ही भिन्न-भिन्न उपलब्ध होते हैं। अतः ब्रह्मकी एकता बतलानेवाले वाक्योंका प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरोध सिद्ध होता है। इसी प्रकार श्रोत्रादि- |
१. प्रजापतिके तीन पुत्र देवता, मनुष्य और दानव प्रजापतिसे उपदेश ग्रहण करनेके लिये गये। प्रजापतिने उन तीनोंको 'द', 'द', 'द' ऐसा कहकर एक ही शब्दसे उपदेश किया। उन तीनोंने अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार उसके 'दमन करो', 'दान करो' और 'दया करो' ये तीन अर्थ कर लिये। इस प्रकार यह अर्थवाद इस उपनिषदके पञ्चम अध्याय द्वितीय ब्राह्मणमें है।
४९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २
| ४९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| द्युपलब्धारः कर्तारश्च धर्माधर्मयोः प्रतिशरीरं भिन्ना अनुमीयन्ते संसारिणः; तत्र ब्रह्मैकत्वं ब्रुवतामनुमानविरोधश्च । तथा च आगमविरोधं वदन्ति—"ग्रामकामो यजेत" "पशुकामो यजेत" "स्वर्गकामो यजेत" इत्येवमादिवाक्येभ्यो ग्रामपशुस्वर्गादिकामास्तत्साधनाद्यनुष्ठातारश्च भिन्ना अवगम्यन्ते । <br><br> (उक्ताक्षेप-निरासः) <br> अत्रोच्यते—ते तु कुतर्कदूषितान्तःकरणा ब्राह्मणादिवर्णापसदा अनुकम्पनीया आगमार्थविच्छिन्नसम्प्रदायबुद्धय इति । कथम् ? श्रोत्रादिद्वारैः शब्दादिभिः प्रत्यक्षत उपलभ्यमानैर्ब्रह्मण एकत्वं विरुध्यत इति वदन्तो वक्तव्याः—किं शब्दादीनां भेदेनाकाशैकत्वं विरुध्यत | से शब्दादिको उपलब्ध करनेवाले तथा धर्माधर्मका अनुष्ठान करनेवाले संसारी जीव भी प्रत्येक शरीरमें भिन्न-भिन्न हैं—ऐसा अनुमान होता है। ऐसी स्थितिमें ब्रह्मकी एकता बतलानेवाले वाक्योंका अनुमान प्रमाणसे भी विरोध है। इसी तरह वे उनका शास्त्रप्रमाणसे भी विरोध बतलाते हैं, [ क्योंकि ] "ग्रामकी कामनावाला यज्ञ करे", "पशुकी कामनावाला यज्ञ करे", "स्वर्गकी कामनावाला यज्ञ करे", इत्यादि वाक्योंद्वारा ग्राम, पशु और स्वर्गकी कामनावाले तथा उनके साधनोंका अनुष्ठान करनेवाले पुरुष भिन्न-भिन्न जान पड़ते हैं। <br><br> अब इसके उत्तरमें कहा जाता है—कुतर्कके कारण जिनके अन्तःकरण दूषित हैं तथा जिनकी बुद्धि वेदार्थविषयक सम्प्रदायसे दूर है, ऐसे वे ये ब्राह्मणादि वर्णाधम दयाके ही पात्र हैं। सो कैसे ?—श्रोत्रादि द्वारोंसे प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेवाले शब्दादिसे ब्रह्मकी एकताका विरोध है—इस प्रकार कहनेवाले उन पुरुषोंसे यह कहना चाहिये कि क्या शब्दादिके भेदसे आकाशकी एकताका भी विरोध है ? यदि उसका |